सीकर जिले के छोटे से गांव झाड़ली की रहने वाली बेटी पूनम कंवर ने पर्वतारोहण की दुनिया में एक और नया इतिहास लिख डाला है। उन्होंने यूरोप महाद्वीप की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एल्ब्रुस को सफलतापूर्वक फतह कर लिया है। इस बड़े और जोखिम भरे अभियान की शुरुआत उन्होंने 10 अगस्त को आरपीएफ मुख्यालय से की थी। लगातार कठिन चढ़ाई और चुनौतियों का सामना करने के बाद, उन्होंने 21 अगस्त को भारतीय समयानुसार ठीक 11:45 बजे 18,510 फीट की ऊंचाई पर स्थित माउंट एल्ब्रुस के शिखर पर पहुंचकर अपना परचम लहराया। इस ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंचते ही उन्होंने वहां भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के साथ-साथ अपने विभाग आरपीएफ का आधिकारिक ध्वज भी शान से फहराया, जिससे पूरे महकमे और देश का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है।
लगातार तीन महाद्वीपों की चोटियों पर जीत
माउंट एल्ब्रुस को फतह करना पूनम कंवर के पर्वतारोहण सफर का एक और गौरवशाली अध्याय है। इससे पहले भी वे दुनिया के अन्य महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियों पर तिरंगा फहरा चुकी हैं। यदि उनके अब तक के सफर पर नजर डालें, तो उन्होंने वर्ष 2024 में अफ्रीकी महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलीमंजारो को फतह किया था, जिसकी कुल ऊंचाई 19,341 फीट है। इसके बाद वर्ष 2025 में उन्होंने ओशिनिया या ऑस्ट्रेलिया की सबसे सर्वोच्च चोटी माउंट कोजियोस्को पर सफलता हासिल की, जो 7,310 फीट ऊंची है। अब साल 2026 में यूरोप की इस विशाल चोटी पर तिरंगा फहराकर उन्होंने अपनी सफलताओं के सिलसिले को आगे बढ़ाया है। उनका यह सफर यहीं नहीं रुकता, बल्कि उनका अंतिम लक्ष्य दुनिया के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर पहुंचना है और उनका सबसे बड़ा सपना दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करना है।
11 दिनों के अभियान की रोमांचक यात्रा
जिस दृढ़ संकल्प के साथ पूनम ने इस कठिन अभियान की शुरुआत की थी, उसे तय समय में पूरा करके वह अपने वतन लौटी हैं। नई दिल्ली स्थित आरपीएफ मुख्यालय के वरिष्ठ उच्च अधिकारियों ने उन्हें 10 अगस्त को भारतीय तिरंगे और विभागीय ध्वज के साथ विधिवत रवाना किया था। लगभग 11 दिनों के भीतर उन्होंने अपनी इस कठिन यात्रा को सफलतापूर्वक पूरा कर दिखाया। आपको बता दें कि रूस की काकेशस पर्वत श्रृंखला में जॉर्जिया की सीमा के बेहद करीब स्थित माउंट एल्ब्रुस दुनिया के प्रसिद्ध सेवन समिट्स का एक अहम हिस्सा माना जाता है। वैश्विक स्तर पर पर्वतारोहण के क्षेत्र में इस चोटी को पार करना एक बेहद कठिन और प्रतिष्ठित उपलब्धि माना जाता है, जिसे पूनम ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर कर दिखाया।
फौजी पृष्ठभूमि और एनसीसी से जुड़ाव
पूनम कंवर की रगों में देशभक्ति और संघर्ष करने का जज्बा उन्हें विरासत में मिला है। उनके पिता रतन सिंह शेखावत एक रिटायर्ड फौजी हैं, जिनके मार्गदर्शन में उन्हें बचपन से ही विपरीत परिस्थितियों और खतरों का सामना करने की अद्भुत हिम्मत मिली। उनके पिता ने बताया कि पूनम को शुरुआती दिनों से ही खेलों और एनसीसी की गतिविधियों में गहरी रुचि रही है। अपनी लगन के बल पर वह साल 2014 में रेलवे सुरक्षा विशेष बल में चयनित हुईं। सरकारी नौकरी की व्यस्तताओं के बाद भी उन्होंने कभी अपनी फिटनेस, खेलकूद और कठोर ट्रेनिंग से समझौता नहीं किया। उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग के अलावा तीरंदाजी और घुड़सवारी का कठिन प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। इसके अलावा उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई दुर्गम पहाड़ों पर चढ़ाई कर उन्होंने पर्वतारोहण से जुड़े कई प्रमाण-पत्र भी हासिल किए हैं।
महिलाओं के लिए प्रेरणा और आदर्श व्यक्तित्व
वर्तमान में पूनम कंवर राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित 16वीं वाहिनी आरपीएसएफ में अपनी सेवाएं दे रही हैं और फिलहाल झोटवाड़ा इलाके में निवास करती हैं। उनका साफ तौर पर कहना है कि उनका मकसद केवल पहाड़ों की चोटियों पर जीत हासिल करना भर नहीं है, बल्कि इसके जरिए देश की करोड़ों महिलाओं और बेटियों को यह कड़ा संदेश देना भी है कि वे किसी भी मोर्चे पर पुरुषों से पीछे नहीं हैं। वह चाहती हैं कि महिलाएं अपने भीतर छिपे असीम आत्मविश्वास को जगाएं और बड़े से बड़े कठिन लक्ष्य को पाने का साहस रखें। पूनम कंवर ओलंपिक पदक विजेता और राजस्थान सरकार के खेल मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को अपना आदर्श मानती हैं। राठौड़ के ओलंपिक पदक जीतने के संघर्ष और सेना से जुड़े उनके प्रेरणादायक अनुभवों ने पूनम के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है। पूनम का कहना है कि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ पर्वतारोहण के इन तमाम अभियानों में उनका लगातार साथ और हौसलाफजाई करते आए हैं।



















