राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था में व्यापक बदलाव की मांग को लेकर एक बड़ा प्रदर्शन देखने को मिला है। इस विरोध प्रदर्शन का आयोजन 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' के बैनर तले किया गया था, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग यह थी कि सरकारी सहायता और आरक्षण का आधार जाति के बजाय पूरी तरह से आर्थिक स्थिति को बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि गरीबी कभी भी किसी की जाति देखकर नहीं आती है, इसलिए सरकारी योजनाओं, शिक्षा, छात्रवृत्ति और अन्य सुविधाओं का लाभ केवल और केवल आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को मिलना चाहिए, चाहे वे किसी भी वर्ग से ताल्लुक रखते हों।
कई संगठनों और सोशल मीडिया का मिला समर्थन
इस विरोध प्रदर्शन में अकेले एक संगठन ने हिस्सा नहीं लिया, बल्कि इसके साथ 'रिजर्वेशन रिफॉर्म आंदोलन', जनरल सेना, चाणक्य सेना और करणी सेना समेत कई अन्य संगठन भी एकजुट हुए। इस आंदोलन को सफल बनाने और देश भर के लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से भी बड़े स्तर पर समर्थन जुटाने का प्रयास किया गया था। सामने आई जानकारी के अनुसार, इस पूरे प्रदर्शन का आयोजन NEET अभ्यर्थी हर्ष दुबे के नेतृत्व में किया गया था। इसके अलावा, जाने-माने यूट्यूबर अजीत भारती सहित कई अन्य प्रमुख वक्ताओं ने भी मंच से प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया और अपनी बात रखी।
जातिगत सर्वे और गरीबी के आंकड़ों पर चर्चा
जंतर-मंतर के इस मंच से वक्ता आदित्य राज सिंह द्वारा दिए गए एक बयान ने सोशल मीडिया पर खासी चर्चा बटोरी है। उन्होंने अपने संबोधन में बिहार में हुए जातिगत सर्वे का हवाला देते हुए एक बड़ा सवाल खड़ा किया। उनका कहना था कि उस सर्वे के आंकड़े यह साफ बताते हैं कि बड़ी संख्या में भूमिहार और ब्राह्मण परिवारों के पास रहने के लिए एक इंच भी जमीन नहीं है। उन्होंने तीखा सवाल उठाया कि अगर सरकार देश से गरीबी दूर करने के मोर्चे पर आर्थिक आधार को महत्वपूर्ण मानती है, तो फिर सिर्फ जाति के आधार पर किसी गरीब व्यक्ति को सरकारी सुविधाओं और मदद के दायरे से बाहर क्यों रखा जाना चाहिए।
आदित्य राज सिंह ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बिहार सरकार ने यह कहा था कि राज्य में भूमिहीनों की संख्या काफी बढ़ गई है, इसलिए वे जातिगत सर्वे करवाएंगे और जिन-जिन लोगों के पास जमीन नहीं होगी, उन्हें भूमि दान में दी जाएगी। जब बिहार में सर्वे हुआ, तो रिपोर्ट ने यह उजागर किया कि वहां 27% भूमिहार-ब्राह्मणों के पास एक इंच जमीन भी नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब लाठी खाने की बारी आती थी, तो प्रशांत किशोर के साथ वे खुद भी सबसे आगे खड़े होते थे, लेकिन ऐतिहासिक रूप से पिछड़ों को राष्ट्रपति जितना आगे बैठाना सही बात होते हुए भी, केवल जाति देखकर फैसले लेना और आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज करना पूरी तरह गलत है।
राष्ट्रपति के बच्चों और सवर्णों की स्थिति पर तंज
अपने संबोधन में आदित्य ने मौजूदा व्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि हर्ष दुबे जैसे युवा गरीब होने के बावजूद ब्राह्मण होने के नाते अगड़े मान लिए जाते हैं। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि उनके जैसे लोग यदि गरीब हों और दिल्ली आने के लिए भले ही जेब में पैसे न हों, बैंक से लोन लेकर आना पड़े या ऑटो में बैठकर सफर करना पड़े, तब भी उन्हें समाज में संपन्न और अमीर सवर्ण मान लिया जाता है। इसके विपरीत, उन्होंने सवाल उठाया कि देश के सर्वोच्च पद पर आसीन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बच्चों को आईएएस की परीक्षा में आरक्षण का लाभ मिल रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या यह देश की व्यवस्था चल रही है या फिर किसी के साथ कोई मजाक किया जा रहा है।
आर्थिक स्थिति को आरक्षण का मुख्य आधार बनाने की मांग
इस पूरे प्रदर्शन में शामिल लोगों की सबसे प्रमुख और गूंजने वाली मांग यही रही कि सरकारी मदद का पैमाना केवल और केवल आर्थिक स्थिति को बनाया जाए। प्रदर्शनकारियों का साफ तौर पर कहना था कि किसी भी गरीब छात्र को, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग से ताल्लुक रखता हो, अच्छी शिक्षा, कोचिंग, छात्रवृत्ति, फीस में राहत और अन्य जरूरी सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके।
आंदोलन में शामिल एक प्रदर्शनकारी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि दूर-दराज के गांवों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले बच्चों को बेहतर शिक्षा के समान अवसर मिलने बेहद जरूरी हैं, ताकि वे बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य प्रतिष्ठित पेशेवर बन सकें। प्रदर्शनकारियों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि देश की सरकार 'विकसित भारत' का बड़ा लक्ष्य सामने रखकर आगे बढ़ रही है, तो देश की प्रतिभा और वास्तविक आर्थिक जरूरत के बीच एक सही संतुलन बिठाना भी उतना ही आवश्यक है। प्रदर्शन के दौरान 'गरीबों को आरक्षण, जाति को नहीं' जैसे नारे भी जोर-शोर से लगाए गए, जिनका उद्देश्य यही जताना था कि सरकारी सहायता बिना किसी भेदभाव के सीधे जरूरतमंद तक पहुंचे।
कोटा के अंदर कोटा और क्रीमी लेयर की उठी बात
प्रदर्शनकारियों ने सिर्फ आर्थिक आधार की बात नहीं की, बल्कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की पूरी समीक्षा किए जाने की पुरजोर मांग भी उठाई। उनका तर्क था कि इस बात की गंभीरता से जांच होनी चाहिए कि आरक्षण का वास्तविक और जमीनी लाभ समाज के सबसे पिछड़े तथा जरूरतमंद लोगों तक पहुंच भी रहा है या नहीं। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए मंच से 'कोटा के अंदर कोटा' यानी उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर जैसे सख्त प्रावधानों पर भी गंभीर चर्चा की गई।
प्रदर्शनकारियों का मानना था कि आरक्षण के फायदों का सही और समान वितरण सुनिश्चित करने के लिए सरकार को पूरे सिस्टम की नए सिरे से समीक्षा करनी चाहिए। इसके अलावा, कुछ प्रदर्शनकारियों ने यह मांग भी रखी कि सरकार को मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर एक 'श्वेत पत्र' जारी करना चाहिए। उनका कहना था कि पिछले कई दशकों के दौरान आरक्षण के जरिए आखिरकार किन-किन वर्गों को कितना फायदा मिला है और कौन-कौन से समुदाय आज भी विकास की दौड़ में पीछे छूटे हुए हैं, इन सबका एक विस्तृत और स्पष्ट आंकलन जनता के सामने सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
EWS वर्ग के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की मांग
प्रदर्शन के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए भी अधिक सुविधाएं और रियायतें दिए जाने की जोरदार मांग उठाई गई। प्रदर्शनकारियों ने सवालिया लहजे में कहा कि यदि सरकार किसी खास वर्ग को आधिकारिक रूप से आर्थिक रूप से कमजोर मानती है, तो कागजी दर्जे के बजाय उसे जमीन पर वास्तविक राहत भी मिलनी चाहिए।
इस सिलसिले में प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि EWS श्रेणी के छात्रों के लिए विभिन्न परीक्षाओं के आवेदन शुल्क, कॉलेज के हॉस्टल की फीस और कोर्स की ट्यूशन फीस में भारी रियायत जैसी सुविधाएं बढ़ाई जानी चाहिए। उनका तर्क था कि केवल EWS का एक प्रमाण पत्र थमा देने से आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की समस्याएं हल नहीं होने वाली हैं, बल्कि उन्हें शिक्षा के हर स्तर पर ठोस वित्तीय और व्यावहारिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
IIT और IIM में न्यूनतम अंकों की वकालत
उच्च शिक्षा के संस्थानों में दाखिले को लेकर भी इस प्रदर्शन में खासी आवाज उठाई गई। यूट्यूबर अजीत भारती ने देश के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे IIT और IIM में दाखिला पाने के लिए न्यूनतम अंकों की एक निश्चित व्यवस्था बनाए रखने की मांग रखी। उनका तर्क था कि देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने के सफर में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और शैक्षणिक योग्यता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों का यह भी कहना था कि आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की हरसंभव मदद जरूर की जानी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही देश की शिक्षा की गुणवत्ता और आपसी प्रतिस्पर्धा के स्तर को भी उच्च बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
SC-ST एक्ट और UGC नियमों पर भी जताया विरोध
आरक्षण और आर्थिक मुद्दों के अलावा, इस प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून यानी SC-ST एक्ट और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी UGC के इक्विटी नियमों को लेकर भी अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। उनका यह आरोप था कि देश के इन कानूनों और नियमों का किसी भी स्थिति में गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हालांकि, इन चुनिंदा मांगों को लेकर प्रदर्शन में शामिल लोगों के बीच अलग-अलग और बंटी हुई राय भी सामने आई, जिसके बाद पूरा आंदोलन मुख्य रूप से आर्थिक आधार और आरक्षण सुधारों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहा।


















