उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर रोजाना साइकिल पर घूम-घूमकर झालमूड़ी बेचने वाला एक 11 साल का बच्चा इन दिनों हर आने-जाने वाले का ध्यान खींच रहा है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और खेलने के लिए खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में सोनू चौहान नामक यह मासूम अपने परिवार का पेट पालने और अपनी दो बहनों का भविष्य संवारने के लिए कड़ी धूप और बारिश में मजदूरी कर रहा है। माता-पिता के साए से वंचित होने के बाद सोनू ने समय से पहले परिपक्व होकर पूरे परिवार का बोझ अपने नन्हे कंधों पर उठा लिया है।
माता-पिता के निधन के बाद बहनों का एकमात्र सहारा बना मासूम
जौनपुर के जमैथा गांव के रहने वाले सोनू चौहान की जिंदगी करीब तीन साल पहले पूरी तरह बदल गई थी, जब उनके माता-पिता का साया सिर से उठ गया। पिता और मां के निधन के बाद सोनू और उनकी दो छोटी बहनों के सिर पर आजीविका का संकट खड़ा हो गया। सोनू की बहनों की उम्र करीब 8 वर्ष और 12 वर्ष है। अनाथ होने के बाद तीनों बच्चों को उनके नाना लल्लू लाल चौहान ने अपने घर जमैथा में आश्रय दिया। हालांकि, नाना के घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद दयनीय है। परिवार में गरीबी का आलम यह है कि कई बार एक वक्त का भोजन मिल पाता है तो दूसरे वक्त के चूल्हे के लिए राशन का इंतजाम नहीं हो पाता।
साइकिल पर झालमूड़ी बेचने की चुनौती और आर्थिक तंगी
घर के बिगड़ते हालात को देखते हुए सोनू चौहान ने करीब डेढ़ महीने पहले साइकिल पर झालमूड़ी बेचना शुरू किया। वह रोजाना कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के इलाकों में साइकिल लेकर निकलते हैं। साधारण दिनों में झालमूड़ी बेचकर वे दिनभर में 100 रुपये, 200 रुपये या कभी-कभी 250 रुपये तक कमा लेते हैं। लेकिन हाल के दिनों में हुई बारिश के कारण ग्राहकों की संख्या काफी घट गई है, जिससे उनकी रोजाना की आमदनी पर बुरा असर पड़ा है। इसके अलावा जिस साइकिल और ट्रॉली के जरिए सोनू सामान बेचते हैं, वह भी पूरी तरह खराब हो चुकी है। तंगी के कारण सोनू के पास अपनी साइकिल और ट्रॉली की मरम्मत कराने तक के पैसे नहीं हैं।
सोनू की दैनिक जिंदगी अत्यधिक कठिनाइयों से भरी है। कई बार उन्हें अपनी बहनों का पेट भरने के लिए खुद भूखे पेट रहना पड़ता है। हाल ही में एक दिन सुबह से शाम तक सोनू ने भोजन का एक दाना तक नहीं खाया था। घर में केवल थोड़ा सा आटा बचा था, जिससे सोनू ने शाम को रोटी तैयार की और अपनी बहन को खिलाई ताकि वह भूखी न सोए। एक तरफ बहनों के स्कूल की फीस और पढ़ाई का खर्च है, तो दूसरी तरफ रोजमर्रा के भोजन का इंतजाम करना सोनू के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
बड़ा अधिकारी बनाने की चाह और प्रशासनिक बाधाएं
तमाम दुखों और अभावों के बावजूद सोनू के हौसले पस्त नहीं हुए हैं। उनका सबसे बड़ा सपना अपनी दोनों बहनों को शिक्षित करना है। सोनू चाहते हैं कि उनकी बहनें पढ़-लिखकर आगे बढ़ें और समाज में बड़ी अधिकारी बनें। सोनू का कहना है कि सरकार 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी बड़ी-बड़ी कल्याणकारी योजनाएं चला रही है, लेकिन उनके जैसे अत्यंत जरूरतमंद बच्चों तक इन योजनाओं की मदद नहीं पहुंच पा रही है। वे चाहते हैं कि सरकार उनकी बहनों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाए ताकि उनका भविष्य अंधकारमय न हो।
सरकारी योजनाओं का लाभ न मिल पाने के पीछे एक बड़ी प्रशासनिक अड़चन पहचान पत्रों की अनुपलब्धता है। सोनू ने बताया कि उनका और उनकी दोनों बहनों का आधार कार्ड अभी तक नहीं बन पाया है। आधार कार्ड बनवाने की प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों द्वारा जन्म प्रमाण पत्र की मांग की जाती है। चूंकि बच्चों के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, इसलिए आधार कार्ड बनने की प्रक्रिया रुकी हुई है। आधार कार्ड न होने की वजह से वे किसी भी सरकारी मदद या छात्रवृत्ति के पात्र नहीं बन पा रहे हैं। इस समस्या को लेकर सोनू ने जौनपुर के जिलाधिकारी से मदद की भावुक गुहार लगाई है। उन्होंने मांग की है कि प्रशासन पहल करके उनके और उनकी बहनों के जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड बनवाए, जिससे उन्हें योजनाओं का लाभ मिल सके।
मासूमियत पर भारी पड़ती जिम्मेदारियां और समाज के सामने सवाल
सोनू चौहान की यह कहानी केवल एक परिवार की आर्थिक तंगी की दास्तान नहीं है, बल्कि उस खोए हुए बचपन की त्रासदी है जो वक्त से पहले जिम्मेदारियों के दबाव में पिस गया है। जिस उम्र में बच्चे बेफिक्र होकर पढ़ाई करते हैं और सपने बुनते हैं, उस उम्र में सोनू कलेक्ट्रेट के चक्कर काटकर झालमूड़ी की पुड़िया बेच रहे हैं। उनके नन्हे चेहरे पर थकान साफ झलकती है, लेकिन अपनी बहनों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा अधिकारी बनाने का उनका जज्बा आज भी पूरी तरह जिंदा है। सोनू का यह संघर्ष स्थानीय प्रशासन और समाज के समक्ष यह गंभीर प्रश्न छोड़ता है कि क्या इस बच्चे के हाथों से झालमूड़ी का सामान हटाकर उन्हें फिर से कलम और किताबें सौंपी जा सकेंगी।



















