कभी इंजीनियर बनने का सपना देखने वाले और विज्ञान विषय से अपनी अकादमिक यात्रा शुरू करने वाले अभिषेक मिश्रा आज पटना के जाने-माने चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। उनका यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जिसमें दोस्तों की एक साधारण सी बातचीत से लेकर गंभीर स्वास्थ्य संकट और लोगों के तानों तक का सामना करना पड़ा। उन्होंने तमाम मुश्किलों को पार करते हुए अपने सपनों को साकार किया और आज शहर के शीर्ष सीए में अपनी गिनती कराते हैं।
दोस्त के साथ दाखिला और सीए दुनिया में प्रवेश
शुरुआती दौर में अभिषेक मिश्रा का पूरा ध्यान विज्ञान और इंजीनियरिंग की पढ़ाई पर था। वह इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हुए थे। उस समय उनके कई मित्र कॉमर्स स्ट्रीम से थे और अक्सर सीए कोर्स की चर्चा किया करते थे। यही वह दौर था जब उनके मन में इस पेशे को लेकर पहली बार जिज्ञासा जागी। एक दिन जब उनका एक साथी सीए फाउंडेशन में रजिस्ट्रेशन कराने जा रहा था, तो अभिषेक भी उसके साथ चले गए। वहां उन्होंने शिक्षकों और अन्य छात्रों से बातचीत की, जिससे उन्हें इस करियर की गहराई का अंदाजा हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने परिवार, सीनियर्स और रिश्तेदारों से इस बारे में सलाह ली, लेकिन ज्यादातर लोगों ने उन्हें इस कठिन राह से दूर रहने की ही सलाह दी।
तानों को बनाया प्रेरणा और मिला सकारात्मक दृष्टिकोण
अभिषेक को लोगों की तरफ से लगातार यह सुनने को मिला कि सीए की पढ़ाई अत्यंत कठिन है और इसमें सफलता मिलना बहुत मुश्किल है। चूंकि उनका अकादमिक रिकॉर्ड बहुत असाधारण नहीं था, इसलिए कुछ शुभचिंतकों ने यहां तक कह दिया कि वह इसे पूरा नहीं कर पाएंगे। हालांकि, इन नकारात्मक बातों ने उनका हौसला तोड़ने के बजाय उन्हें इस क्षेत्र को और गहराई से जानने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कुछ अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट्स से मुलाकात की और उनसे मार्गदर्शन लिया। वहां से उन्हें बिल्कुल अलग और सकारात्मक नजरिया मिला। सीनियर्स ने समझाया कि यदि कोई छात्र पूरी ईमानदारी और निरंतरता के साथ मेहनत करे, तो सफलता निश्चित रूप से मिलती है, भले ही इसमें थोड़ा अधिक समय लग जाए।
पहला पड़ाव और साइंस बैकग्राउंड का फायदा
लोगों की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए अभिषेक ने अपने दोस्तों के साथ सीए फाउंडेशन की परीक्षा में हिस्सा लिया। जब परिणाम आए, तो वह पहली ही बार में सफल हो गए, जबकि उनके साथ परीक्षा देने वाले कई अन्य दोस्त इस बाधा को पार नहीं कर सके। इस सफलता के पीछे उन्हें अपने साइंस बैकग्राउंड का बड़ा लाभ मिला। उनका मानना है कि विज्ञान की पढ़ाई के दौरान जो अनुशासन और अध्ययन की शैली उन्होंने विकसित की थी, वही आदतें सीए की कठिन परीक्षाओं की तैयारी में उनके बहुत काम आईं। इस पहली कामयाबी ने उनके आत्मविश्वास को काफी ऊंचा कर दिया।
दिल्ली का रुख और आर्टिकलशिप की शुरुआत
फाउंडेशन पास करने के बाद आगे की पढ़ाई को लेकर उनके सामने कई विकल्प थे। जानकारों और शुभचिंतकों ने उन्हें कोलकाता, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में जाने का सुझाव दिया। आखिरकार उन्होंने दिल्ली जाने का निर्णय लिया और वहीं से अपनी आर्टिकलशिप के साथ-साथ सीए इंटरमीडिएट की तैयारी भी शुरू कर दी। दिल्ली में उन्होंने कोचिंग संस्थानों की कक्षाओं और अपनी स्व-अध्ययन प्रक्रिया में पूरी ताकत झोंक दी। दिन-रात की मेहनत और लगन से उन्होंने आगे की बाधाओं को पार करना शुरू किया, लेकिन उनका यह रास्ता इतना आसान नहीं रहने वाला था।
अस्पताल का बेड और डेढ़ साल का कड़ा संघर्ष
अभी सीए इंटर की पढ़ाई चल ही रही थी कि अभिषेक के जीवन में एक बेहद कठिन दौर आया। उनकी तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। गंभीर बीमारी की चपेट में आने के कारण उन्हें लगभग डेढ़ से दो साल तक अस्पताल के बिस्तर पर ही गुजारने पड़े। इस स्वास्थ्य संकट ने उनकी पढ़ाई की गति पर ब्रेक लगा दिया और सब कुछ थम सा गया। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और मानसिक रूप से अपने लक्ष्य से कभी दूर नहीं हुए। स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद उन्होंने एक बार फिर पूरी ताकत के साथ अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया।
संकल्प की शक्ति और वर्ष 2012 में सफलता
इस पूरी यात्रा में अभिषेक की सबसे बड़ी ताकत उनका अटूट संकल्प था। बीमारी और पढ़ाई में हुए लंबे अंतराल के बावजूद उन्होंने अपने उद्देश्य से कभी समझौता नहीं किया। इस दौरान उनकी सोशल लाइफ लगभग शून्य हो गई थी और उनका सारा समय केवल किताबों और काम के बीच ही बीतता था। उनका मानना है कि शुरुआती दौर की यह तमाम मुश्किलें इंसान को जीवन का असली सबक सिखाती हैं। अंततः तमाम बाधाओं को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बीच ही पांच साल की लंबी मेहनत के बाद साल 2012 में सीए फाइनल की परीक्षा सफलतापर्वक पास कर ली।
नौकरी के बजाय चुनी स्वतंत्र प्रैक्टिस और फर्म की शुरुआत
चार्टर्ड अकाउंटेंट की डिग्री हासिल करने के बाद अभिषेक ने किसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी में नौकरी करने का सुरक्षित रास्ता नहीं चुना। उन्होंने अपनी खुद की प्रैक्टिस शुरू करने का फैसला किया और अपने पांच साथियों के साथ मिलकर अपनी फर्म की नींव रखी। आज वह पटना में एक सफल सीए के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और उनके पार्टनर्स के साथ मिलकर उनकी फर्म का दायरा पटना से आगे कई अन्य शहरों तक फैल चुका है। उनकी यह मेहनत और संघर्ष आज उन युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सपनों को सच करना चाहते हैं।



















