भारत में 1960 के दशक का समय बेहद कठिन था, जब देश भयंकर अकाल और खाद्यान्न संकट की चपेट में आ गया था। उस दौर में देश की विशाल आबादी के लिए भोजन की आपूर्ति का मुख्य सहारा पश्चिमी देशों से मिलने वाली अनाज सहायता थी। भुखमरी के उस निराशाजनक माहौल में वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने अपनी दूरदर्शिता और वैज्ञानिक शोध से देश का परिदृश्य बदल दिया। उन्होंने भारतीय कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए व्यापक कदम उठाए, जिससे देश में ऐतिहासिक 'हरित क्रांति' का मार्ग प्रशस्त हुआ। उनके प्रयासों ने भारत को खाद्यान्न के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाले देश से निकालकर अनाज भंडार वाले आत्मनिर्भर राष्ट्र में परिवर्तित कर दिया।
बचपन की यादें और आईपीएस की नौकरी छोड़ने का निर्णय
एमएस स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के छोटे से शहर कुंबकोणम में हुआ था। उनका पूरा नाम मनकोम्बु सांबशिवन स्वामीनाथन था, जबकि पारिवारिक दायरों में उन्हें प्यार से एमएसएस कहकर पुकारा जाता था। किशोरावस्था के दौरान द्वितीय विश्व युद्ध के समय उन्होंने देश में पड़े भीषण अकाल की तस्वीरें देखीं। भूखे लोगों की लंबी कतारें और खाली थालियों का दृश्य उनके मानस पर गहरा प्रभाव छोड़ गया, जिसने उन्हें कृषि के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया।
कृषि विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। उनके सामने एक सम्मानजनक पुलिस अधिकारी बनने और वर्दी पहनने का सीधा रास्ता मौजूद था। इसके बावजूद, उन्होंने प्रशासनिक पद के बजाय खेतों और प्रयोगशालाओं में शोध करने का विकल्प चुना। आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) के गहन अध्ययन के लिए वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए, जहाँ उन्होंने विख्यात वैज्ञानिक सर फ्रेडरिक गौलैंड हॉपकिंस के मार्गदर्शन में शोध कार्य किया।
डॉ. बोरलॉग के साथ साझेदारी और जमीनी काम
शोध यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नॉर्मन बोरलॉग से हुई। दोनों वैज्ञानिकों ने मिलकर भारतीय कृषि परिस्थितियों के अनुकूल गेहूं और धान की अत्यधिक उपज देने वाली नई किस्मों पर काम किया। डॉ. स्वामीनाथन ने अपना समय केवल बंद प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने छोटे किसानों और तटीय क्षेत्रों के मछुआरों के बीच जाकर काम किया। उन्होंने उनकी व्यावहारिक समस्याओं को समझा, उनसे संवाद स्थापित किया और जमीनी स्तर पर उनका विश्वास अर्जित किया।
1960 का संकट और 'हरित क्रांति' का प्रभाव
जब 1960 के दशक में भारत भीषण सूखे की वजह से भुखमरी की कगार पर पहुँच गया था, तब विदेशी अनाज पर निर्भरता समाप्त करने में स्वामीनाथन के विज्ञान-आधारित समाधान निर्णायक साबित हुए। उनके नेतृत्व में शुरू हुए हरित क्रांति आंदोलन ने देश की कृषि व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। इस आंदोलन ने भारत की खाद्य सुरक्षा की नींव को मजबूत किया और किसानों को समृद्ध बनाया।
अंतरराष्ट्रीय पहचान, पुरस्कार और 'एवरग्रीन रिवोल्यूशन'
वर्ष 1980 तक आते-आते प्रोफेसर स्वामीनाथन की ख्याति वैश्विक स्तर पर फैल चुकी थी। उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक निकायों की अध्यक्षता की, जैव-विविधता संरक्षण से जुड़ी नीतियां बनाईं और उन्हें दुनिया भर के संस्थानों से 80 से अधिक मानद डॉक्टरेट की उपाधियां प्राप्त हुईं। उन्हें वर्ल्ड फूड प्राइज, रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड और पद्म विभूषण जैसे शीर्ष राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया। इतने बड़े सम्मान मिलने के बाद भी वे एक विनम्र शिक्षक, सहयोगी और जनसेवक बने रहे। उन्होंने टिकाऊ खेती, लैंगिक समानता और प्राकृतिक संरक्षण पर जोर देते हुए 'एवरग्रीन रिवोल्यूशन' (सदाबहार क्रांति) की अवधारणा प्रस्तुत की।
'बायोहैप्पीनेस' की अवधारणा, निधन और भारत रत्न
अपने जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने 'बायोहैप्पीनेस' (जैविक प्रसन्नता) का विचार प्रस्तुत किया। जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता के क्षरण और बढ़ती सामाजिक असमानता के दौर में यह विचार प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर रहने और प्राकृतिक संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग का संदेश देता है। कृषि जगत में अमूल्य बदलाव लाने वाले डॉ. एमएस स्वामीनाथन का निधन 28 सितंबर 2023 को हुआ। वर्ष 2024 में भारत सरकार ने कृषि और किसान कल्याण में उनके अभूतपूर्व योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया।



















