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प्राकृतिक नुस्खों से बहराइच में लहलहाई धान की फसल, कृषि सखी लालपरी ने घटाई खेती की लागतसक्सेस स्टोरी
20 सित॰ 2026, 2:55 pm (38 मिनट पहले)· 0

प्राकृतिक नुस्खों से बहराइच में लहलहाई धान की फसल, कृषि सखी लालपरी ने घटाई खेती की लागत

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की कृषि सखी लालपरी ने बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक के एक एकड़ से अधिक भूमि पर धान की शानदार पैदावार तैयार कर अन्य किसानों को नई राह दिखाई है।

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में प्राकृतिक खेती की बदौलत कृषि के तौर-तरीकों में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। जिले के एक छोटे से गांव में रहने वाली कृषि सखी लालपरी ने पूरी तरह रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से दूरी बनाकर धान की हरी-भरी फसल तैयार की है। उनका यह व्यावहारिक प्रयास दर्शाता है कि यदि पारंपरिक और जैविक तकनीकों का सही तालमेल बिठाया जाए, तो किसान अपनी जेब पर पड़ने वाले भारी बोझ को कम करते हुए पौष्टिक और भरपूर पैदावार हासिल कर सकते हैं।

खुद के खेत में पहले किया सफल प्रयोग

कृषि सखी के रूप में कार्यरत लालपरी का तरीका बेहद व्यावहारिक है। वह आसपास के किसानों को प्राकृतिक खेती के गुर सिखाने से पहले उन तरीकों को खुद अपनी जमीन पर परखती हैं। मौजूदा समय में उनके एक एकड़ से अधिक खेत में धान की फसल पूरी मजबूती के साथ खड़ी है। खेत में खड़े पौधों का विकास काफी बेहतर है और हर एक पौधे से 20 से 25 कल्ले फूट रहे हैं, जो शानदार पैदावार का स्पष्ट संकेत देते हैं।

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घनजीवामृत और ब्रह्मास्त्र का असरदार उपयोग

फसल तैयार करने की पूरी प्रक्रिया की जानकारी देते हुए लालपरी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने खेत की तैयारी के वक्त ही जैविक विकल्पों को प्राथमिकता दी। धान की रोपाई कराने से पहले खेत में घनजीवामृत डाला गया, जिसके बाद जुताई कर रोपाई पूरी की गई। रोपाई के ठीक 10 दिन बीतने पर सिंचाई के पानी के साथ जीवामृत मिलाया गया और स्प्रे मशीन की सहायता से भी इसका छिड़काव किया गया। फसलों को कीटों और रोगों के प्रकोप से सुरक्षित रखने के लिए बाजार में मिलने वाली रासायनिक दवाओं के बदले देसी नुस्खे से तैयार ब्रह्मास्त्र प्राकृतिक कीटनाशक का प्रयोग किया गया। इसके अतिरिक्त पौधों को कतारबद्ध तरीके से उचित दूरी पर रोपा गया, जिससे हर पौधे को पर्याप्त धूप, हवा और पोषण मिल सका।

खेती की लागत में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट

लागत के गणित को देखें तो प्राकृतिक खेती ने खर्च को बड़े पैमाने पर कम कर दिया है। सामान्य तौर पर एक एकड़ खेत में रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर किसानों को 8,000 से 10,000 रुपये तक खर्च करने पड़ जाते हैं। इसके विपरीत, लालपरी का कुल खर्च घटकर महज 2,000 से 3,000 रुपये रह गया। यह मामूली रकम भी केवल खेत की बुनियादी तैयारियों और मजदूरों के पारिश्रमिक में लगी, जिससे यह मॉडल लगभग शून्य बजट वाली खेती का रूप ले चुका है।

मिट्टी और सेहत दोनों की सुरक्षा

लालपरी का स्पष्ट मानना है कि जहरीले रसायनों के इस्तेमाल से उगाई गई फसलें इंसानी शरीर के लिए बीमारियों का कारण बनती हैं। उनका कहना है कि यदि उपजाया गया भोजन ही स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए, तो ऐसी खेती का कोई औचित्य नहीं रह जाता। प्राकृतिक खेती से न केवल खेतों की मिट्टी की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रहती है, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को भी सुरक्षा मिलती है। रासायनिक खाद के महंगे खर्च से परेशान किसानों के लिए यह मॉडल एक बड़ा संबल बनकर सामने आया है।

सवाल-जवाब

लालपरी किस जिले से हैं और वह किस पद पर कार्यरत हैं?
लालपरी उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की निवासी हैं और वह कृषि सखी के पद पर कार्यरत हैं।
धान की फसल में रासायनिक खाद की जगह किन प्राकृतिक चीजों का प्रयोग किया गया?
रोपाई से पहले खेत में घनजीवामृत डाला गया और रोपाई के 10 दिन बाद सिंचाई के साथ व स्प्रे से जीवामृत का छिड़काव किया गया।
फसलों को बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए किस कीटनाशक का इस्तेमाल किया गया?
फसल की सुरक्षा के लिए रासायनिक दवाओं की जगह ब्रह्मास्त्र नामक प्राकृतिक कीटनाशक का इस्तेमाल किया गया।
प्राकृतिक खेती अपनाने से लालपरी की खेती की लागत में कितनी कमी आई?
रासायनिक खेती में आने वाला 8,000 से 10,000 रुपये का खर्च प्राकृतिक खेती के जरिए घटकर मात्र 2,000 से 3,000 रुपये रह गया।
धान के पौधों में कितने कल्ले निकल रहे हैं?
प्राकृतिक विधि से तैयार धान के हर एक स्वस्थ पौधे से 20 से 25 कल्ले निकल रहे हैं।
रोपाई के समय पौधों को किस तरह लगाया गया था?
पौधों की रोपाई सही दूरी पर और कतारबद्ध तरीके से की गई थी, ताकि उन्हें भरपूर हवा और पोषण मिल सके।
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