हर साल 7 अगस्त को पूरे भारत में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। इस विशेष अवसर का मुख्य उद्देश्य देश की समृद्ध बुनाई परंपरा को बढ़ावा देना और हथकरघा कारीगरों के योगदान को सम्मानित करना है। हथकरघा एक ऐसी पारंपरिक तकनीक है, जिसके तहत लकड़ी के चरखों, प्लेटों और घरेलू फ्रेम की मदद से सदियों पुराने पहनावे और कपड़े तैयार किए जाते हैं। इनमें साड़ी, ब्लाउज, पर्दे और बेडशीट जैसे परिधान प्रमुखता से शामिल हैं। आज के इस आधुनिक युग में जहां कपड़ा उद्योग में अत्याधुनिक मशीनों का बोलबाला है और बाजार में नए-नए डिजाइन के कपड़े उतारे जा रहे हैं, वहीं हाथों से तैयार किए गए पारंपरिक कपड़ों का आकर्षण पहले की तरह बना हुआ है। बिहार के सबसे बड़े जिले पश्चिम चंपारण में थारू जनजाति की महिलाओं द्वारा संचालित हथकरघा केंद्र इसका बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। इन महिलाओं के चरखे से तैयार कपड़ों की मांग अब देश की राजधानी दिल्ली से लेकर आर्थिक राजधानी मुंबई तक पहुंच चुकी है।
थारू समुदाय और पारंपरिक हथकरघा कला का इतिहास
क्षेत्रफल के लिहाज से बिहार के सबसे विशाल जिले पश्चिम चंपारण के कुछ विशेष प्रखंडों जैसे बगहा 02, रामनगर और गौनाहा में थारू जनजाति के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं। इस समुदाय में आजीविका और पारिवारिक पालन-पोषण का विभाजन पारंपरिक तौर पर देखा जाता है। घर के पुरुष सदस्य मुख्य रूप से खेती बाड़ी और पशुपालन जैसे कार्यों में संलग्न रहते हैं और परिवार का आर्थिक आधार संभालते हैं। दूसरी ओर, घर की महिलाएं सदियों से चली आ रही बुनाई कला को संभालती हैं। ये महिलाएं लकड़ी के फ्रेम और चरखे की सहायता से कलात्मक कपड़े बुनने का कार्य करती हैं। कई पीढ़ियों से चली आ रही यह हुनरमंद कला जब कपड़ों पर उकेरी जाती है, तो परिधानों की मजबूती और खूबसूरती देखने लायक होती है। हाथों से की गई यह मजबूत बुनाई इन कपड़ों को टिकाऊ बनाती है।
मिश्रौली केंद्र की कार्यप्रणाली और दैनिक उत्पादन
पश्चिम चंपारण जिले के बगहा 02 प्रखंड के अंतर्गत आने वाले मिश्रौली गांव में संचालित हथकरघा केंद्र इस पारंपरिक उद्योग का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। इस केंद्र की संचालक और लीडर रुक्मणी देवी के मार्गदर्शन में कुल 30 थारू महिलाएं हर दिन संगठित होकर कार्य करती हैं। सुबह से ही ये महिलाएं चरखे की सहायता से सूती और ऊनी धागों की उलझनों को सुलझाने में जुट जाती हैं। धागे तैयार होने के बाद लकड़ी के बने ढांचों और फ्रेम पर शॉल, गमछा, चादर, पिलो कवर और स्वेटर जैसे विभिन्न उपयोगी उत्पादों की सिलाई और बुनाई की जाती है। यदि दैनिक उत्पादन आंकड़ों की बात करें तो एक महिला प्रतिदिन औसतन लगभग 15 शॉल, 8 गमछा, 5 बेडशीट और 10 पिलो कवर आसानी से तैयार कर लेती है।
कीमत, गुणवत्ता और राष्ट्रीय बाजारों में मांग
हाथों से निर्मित इन परिधानों और कपड़ों की कीमत उन पर की गई मेहनत, बुनाई की सघनता और बनाई गई सुंदर कलाकृतियों के आधार पर तय की जाती है। उदाहरण के तौर पर, केंद्र में तैयार एक शॉल की कीमत 400 से लेकर 600 रुपये तक निर्धारित होती है। वहीं, दोहरे आकार यानी डबल साइज बेडशीट की कीमत 300 से लेकर 500 रुपये तक रखी जाती है। कपड़ों की मजबूत सिलाई, सदियों पुरानी पारंपरिक डिजाइन और आकर्षक रंग संयोजन के कारण ये परिधान ग्राहकों को बेहद पसंद आते हैं। इसी विशेषता के चलते बिहार के स्थानीय बाजारों के अलावा देश के बड़े राज्यों जैसे दिल्ली, मुंबई, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तर पूर्वी राज्यों में इन कपड़ों की भारी मांग लगातार बनी रहती है। वर्तमान समय में इन हथकरघा परिधानों का अपना एक अलग वफादार ग्राहक वर्ग बन चुका है।



















