ग्रामीण युवाओं के बीच खेती को लेकर अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि इसमें मुनाफा कम और जोखिम अधिक है। लेकिन बिहार के सीतामढ़ी जिले में स्थित बाजिदपुर गांव के किसान वृजनंदन मुखिया ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। वह पिछले 25 से 30 वर्षों से लगातार हरी सब्जियों की खेती कर रहे हैं। मात्र 3 बीघा जमीन पर योजनाबद्ध तरीके से काम करके वह हर साल ₹4 लाख से ₹4.50 लाख तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी यह सफलता साबित करती है कि अगर सही मेहनत और देखभाल की जाए, तो सब्जियों की खेती परिवार की आजीविका का एक बेहद मजबूत आधार बन सकती है।
नौकरी की मजबूरी से आगे बढ़कर खेती को बनाया आधार
वृजनंदन मुखिया बताते हैं कि उन्होंने स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की थी, जिसके कारण उनके लिए बाहर जाकर नौकरी हासिल करना बेहद कठिन था। ऐसी स्थिति में उन्होंने दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपने पूर्वजों के पारंपरिक काम को आगे बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने पूरी लगन के साथ सब्जियों की खेती की शुरुआत की। आज इसी काम से घर का राशन-पानी, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और परिवार की तमाम दैनिक जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं।
लगभग 10 साल पहले खेती से इतनी अधिक कमाई नहीं होती थी। लेकिन बीते एक दशक में परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है। सब्जियों की मांग बढ़ने और बेहतर देखभाल से उत्पादन सुधरने के कारण उनकी आमदनी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। आज उनकी यह पहल न केवल उनके परिवार को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना चुकी है, बल्कि गांव के अन्य लोगों के लिए भी प्रेरणा बनी है।
3 बीघा खेत में मौसमी सब्जियों का बेहतरीन प्रबंधन
सीमित जमीन से अधिकतम मुनाफा कमाने के लिए फसलों का सही चुनाव बहुत जरूरी होता है। वृजनंदन मुखिया अपनी 3 बीघा जमीन पर पूरे साल विविध प्रकार की मौसमी सब्जियां उगाते हैं। उनके खेतों में मुख्य रूप से गोभी, मूली, बैंगन, आलू और भिंडी जैसी रोजाना मांग वाली फसलें लहलहाती हैं।
विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाने से उन्हें हर मौसम में बाजार से लगातार नकद आमदनी मिलती रहती है। यदि किसी एक फसल का दाम बाजार में कम भी मिलता है, तो दूसरी फसल से उसकी भरपाई हो जाती है। यह विविधता उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाती है और पूरे साल आय का जरिया बनाए रखती है।
दिन-रात की मेहनत और खेती के मुख्य चरण
खेती से बेहतर पैदावार हासिल करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए बुवाई से लेकर कटाई तक लगातार देखभाल की जरूरत होती है। फसल चक्र की शुरुआत खेत की जुताई और तैयारी से होती है, ताकि मिट्टी उपजाऊ और बीजों के अनुकूल बन सके।
बीज रोपने के बाद समय पर सिंचाई करना, आवश्यक खाद डालना और कीटनाशक दवाओं का संतुलित छिड़काव करना बेहद जरूरी होता है। वृजनंदन मुखिया के अनुसार, हर फसल पर बारीकी से नजर रखनी पड़ती है। सही समय पर पानी और पोषण न मिलने से पैदावार की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर बाजार में मिलने वाले दामों और कुल मुनाफे पर पड़ता है।
युवाओं के लिए प्रेरणा और आत्मनिर्भरता का संदेश
वार्षिक ₹4.50 लाख तक का शुद्ध लाभ यह दर्शाता है कि छोटे स्तर पर की जाने वाली खेती भी एक व्यावसायिक रूप ले सकती है। वृजनंदन मुखिया का 25 से 30 सालों का समृद्ध अनुभव आज के उन युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है जो रोजगार की तलाश में शहरों की ओर भागते हैं।
उनका मानना है कि यदि पारंपरिक खेती के तरीकों में निष्ठा, मेहनत और सही समय प्रबंधन को जोड़ा जाए, तो जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी व्यक्ति को आर्थिक रूप से पूरी तरह सशक्त और आत्मनिर्भर बना सकता है।



















