बिहार के मधुबनी जिले के कोइलख गांव के रहने वाले रमेश मंडल की जीवन यात्रा संघर्ष और बुलंद हौसले की एक ऐसी मिसाल है जो हर किसी को प्रेरित करती है। पारंपरिक रूप से कला और घरेलू हुनर से जुड़े कामों को केवल महिलाओं के दायरे में देखा जाता है। जब रमेश ने इन रूढ़ियों को तोड़ते हुए घरेलू काम, पारंपरिक लोककला और मिथिला संस्कृति से जुड़े हुनर सीखने की शुरुआत की, तो उन्हें अपने ही परिवार, रिश्तेदारों और समाज के तानों का सामना करना पड़ा। तमाम लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और हतोत्साहित करने की कोशिश की, लेकिन रमेश ने इन नकारात्मक बातों पर ध्यान देने के बजाय अपने शौक और जुनून को अपनी पहचान तथा आजीविका का साधन बनाने का दृढ़ संकल्प लिया।
अपने शुरुआती दौर को याद करते हुए रमेश बताते हैं कि उस समय समाज का माहौल ऐसा था कि गीत-संगीत, लोक नृत्य, मिथिला पेंटिंग और घरेलू कामकाजी क्षेत्रों में पुरुषों की उपस्थिति लगभग न के बराबर थी। इन गतिविधियों को पूरी तरह महिलाओं से जोड़कर देखा जाता था। इसके बावजूद रमेश की रुचि इन पारंपरिक विधाओं में बचपन से ही थी। उन्होंने हर हाल में इन्हें सीखने का फैसला किया। जब उन्होंने कदम आगे बढ़ाए, तो लोगों ने ताना कसा कि ये काम मर्दों के लिए नहीं हैं। कई लोगों ने उन्हें रोकने का प्रयास भी किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने पूरी लगन के साथ धीरे-धीरे इन सभी हुनर को आत्मसात किया और लगातार अभ्यास से अपनी कला को और अधिक परिष्कृत किया।
आज रमेश की मेहनत रंग लाई है और वह मिथिला पेंटिंग तथा लोककला के क्षेत्र से बेहतरीन कमाई कर रहे हैं। उनकी कला की मांग देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहुंच चुकी है। विदेशी ग्राहक भी विशेष तौर पर ऑर्डर देकर उनके बनाए उत्पाद खरीदते हैं। उनकी एक पेंटिंग की कीमत 30 से 35 हजार रुपये तक होती है। किसी विशेष कार्यक्रम या एक दिन की बुकिंग के लिए उन्हें करीब 15 हजार रुपये मिलते हैं, जबकि बिहार के बाहर दो दिन के कार्य के लिए वह 50 से 60 हजार रुपये तक शुल्क लेते हैं। उनकी इस सफलता ने साबित कर दिया है कि लगन सच्ची हो तो कला सरहदों की मोहताज नहीं रहती।
अपनी कला के सफर के बारे में बात करते हुए रमेश बताते हैं कि उन्हें मिथिलांचल की संस्कृति से जुड़े विविध आयामों का गहरा ज्ञान है। वह लोककला, लोक नृत्य, गायन और चित्रकारी के साथ-साथ एक कुशल मेहंदी और मेकअप आर्टिस्ट के रूप में भी अपनी सेवाएं देते हैं। उन्हें कई पारंपरिक घरेलू गतिविधियों की भी पूरी जानकारी है, जिसमें अदौरी और तिरौरी जैसी पारंपरिक चीजें तैयार करना भी शामिल है। यही वजह है कि वह मिथिलांचल की लोक संस्कृति और उसकी पुरानी परंपराओं को सहेजते हुए उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें कई मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है। वह जोश टॉक जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर भी अपनी संघर्ष गाथा साझा कर चुके हैं, जिससे उनकी कहानी अनगिनत लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है।
रमेश का सफर यहीं नहीं थमता है, बल्कि वह दूसरों को भी आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। वह अब तक 5000 से अधिक लोगों को घरेलू काम और पारंपरिक चित्रकारी का प्रशिक्षण दे चुके हैं। उनके द्वारा प्रशिक्षित किए गए कई लोग आज अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर बनकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। रमेश का स्पष्ट मानना है कि उनका उद्देश्य केवल अपनी व्यक्तिगत तरक्की तक सीमित नहीं है, बल्कि वह यह चाहते हैं कि मिथिलांचल की समृद्ध लोककला और पारंपरिक हुनर देश-दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचे। रमेश मंडल ने यह साबित कर दिखाया है कि प्रतिभा किसी एक लिंग या वर्ग की बपौती नहीं होती, बल्कि सच्ची इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम के बल पर कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में अपनी एक अलग और अनूठी पहचान स्थापित कर सकता है।



















