राजस्थान के कोटा शहर में जब भी दशहरा मेले की रौनक जमती है, तो मैदान में केवल रावण दहन देखने भर की भीड़ नहीं उमड़ती, बल्कि स्थानीय जायकों का आनंद लेने के लिए भी हजारों परिवार एक साथ जुटते हैं। मेले के माहौल में बच्चे झूलों का आनंद लेते हैं और खान-पान के गलियारों में लोग अपनी पसंदीदा नमकीन और तली हुई पकौड़ियों के लिए लंबी कतारों में खड़े नजर आते हैं। इस पूरे उत्सव में जो स्वाद सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है और जिसके लिए लोग पूरे बारह महीने राह देखते हैं, वह कोटा की मशहूर पन्नालाल पकौड़ी का है। मसालों की अपनी अनूठी सुगंध और पारंपरिक स्वाद के दम पर यह प्रतिष्ठान 70 साल से भी अधिक समय से अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
मेले के दौरान यह स्थिति आम देखने को मिलती है कि खरीदारी और सैर-सपाटे के लिए पहुंचने वाले परिवार सबसे पहले पन्नालाल जी की पकौड़ी चखने का मन बनाते हैं। इस प्रतिष्ठान की लोकप्रियता केवल नमकीन पकौड़ियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां तैयार की जाने वाली मटका कुल्फी भी पूरे कोटा में बेहद पसंद की जाती है। मटका कुल्फी का यह कारोबार सिर्फ मेले के दिनों का नहीं है, बल्कि शहर के लोग साल के बारहों महीने हर दिन इसका स्वाद लेने दुकान तक पहुंचते हैं। पांच पीढ़ियों की निरंतर मेहनत, गुणवत्ता के प्रति निष्ठा और ग्राहकों के विश्वास ने एक छोटे से प्रयास को हाड़ौती के सबसे जाने-माने खान-पान के पते में बदल दिया है।
कोटा दरबार के दौर से किशोरपुरा दरवाजे तक का सफर
इस कारोबार की जड़ें करीब 70 वर्ष पुरानी हैं, जब कोटा में दरबार का शासन हुआ करता था और दशहरे के अवसर पर रावण को रोंध कर मारने की ऐतिहासिक परंपरा निभाई जाती थी। उसी ऐतिहासिक दौर में श्री पन्नालाल जी ने किशोरपुरा दरवाजे के निकट पकौड़ी और मटका कुल्फी बेचने की शुरुआत की थी। शुरुआती दिनों में उनके पास काम करने के सीमित साधन थे और कोई बड़ी आर्थिक पूंजी भी मौजूद नहीं थी। उन्होंने रामपुरा बाज़ार के पास एक बेहद छोटी सी गुमटी और एक साधारण हाथ ठेले से अपनी इस उद्यम यात्रा की नींव रखी।
शुरुआती पूंजी भले ही मामूली थी, लेकिन उनके तैयार किए गए मसालों का स्वाद इतना लाजवाब था कि धीरे-धीरे स्थानीय ग्राहक उनसे जुड़ते चले गए। ग्राहकों के इस अटूट विश्वास के कारण दुकान की शोहरत पूरे शहर में फैलने लगी। समय बीतने के साथ मेले की प्रशासनिक व्यवस्थाओं और स्वरूप में भी बड़े बदलाव दर्ज किए गए। दशहरे के इस ऐतिहासिक मेले का प्रबंधन शुरुआत में नगरपालिका देखा करती थी, जो बाद में नगर परिषद और फिर नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आ गया। नागरिक प्रशासन के बदलावों के साथ मेला परिसर की दुकानों और बुनियादी सुविधाओं के नियम भी बदले, लेकिन पन्नालाल जी की इस फर्म ने बदलते समय और नई व्यवस्थाओं को पूरी सहजता से अपनाया। लगातार अपनी सेवाओं में सुधार करने का परिणाम यह रहा कि आज पूरे हाड़ौती अंचल में यह नाम हर घर में सम्मान के साथ लिया जाता है।
पांच पीढ़ियों की विरासत और आधुनिक तौर-तरीके
पन्नालाल जी द्वारा रोपा गया यह छोटा सा पौधा अब एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। परिवार में कारोबार की कमान दादाजी के बाद पिताजी ने संभाली, फिर इसे सुनील कुमार वैष्णव ने अपने हाथ में लिया और बाद में उनके भाइयों तथा भाइयों के बेटों ने मिलकर इसे विस्तार दिया। वर्तमान समय में इस पारिवारिक विरासत को पांचवीं पीढ़ी आगे बढ़ा रही है, जिसमें सुनील के पुत्र और भतीजे पूरी सक्रियता से जुड़े हुए हैं। काम का मूल स्वरूप वही पारंपरिक खान-पान का है, लेकिन संचालन के तरीकों को समय के साथ आधुनिक बनाया गया है।
नई पीढ़ी व्यवसाय में लगातार नए प्रयोग कर रही है और नए विचारों के साथ इसे आगे बढ़ाने में जुटी है, जिसे सुनील कुमार वैष्णव व्यवसाय की निरंतर प्रगति के लिए एक बड़ा और जरूरी योगदान मानते हैं। शहर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए अब इस प्रतिष्ठान के चार स्थायी आउटलेट संचालित हो रहे हैं। इसके साथ ही हर साल लगने वाले प्रसिद्ध दशहरा मेले में दो विशेष दुकानें लगाई जाती हैं, जहां परिवार पूरे शहर और बाहर से आने वाले आगंतुकों के सामने अपने पारंपरिक व्यंजनों का प्रदर्शन करता है।
गुणवत्ता, स्वच्छता और ग्राहकों से अटूट जुड़ाव
पारिवारिक व्यवसाय को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के अनुभव साझा करते हुए सुनील बताते हैं कि किसी भी खान-पान के काम या ब्रांड को कामयाबी के शिखर तक पहुंचाने के लिए सबसे जरूरी शर्त अपने काम के प्रति सच्ची ईमानदारी है। उनका मानना है कि उत्पादों के स्वाद की असली ताकत यही निष्ठा है। भोजन तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले हर कच्चे माल की गुणवत्ता, ग्राहकों के साथ निरंतर संवाद और सहज आचरण किसी भी उद्यम को नई दिशा प्रदान करते हैं।
पन्नालाल पकौड़ी वाला अपने सभी प्रतिष्ठानों पर इसी कार्यशैली का कड़ाई से पालन करता है। पकौड़ी तैयार करने में लगने वाले बेसन, तेल और खड़े मसालों की उत्तम गुणवत्ता का हर स्तर पर ध्यान रखा जाता है। साथ ही निर्माण प्रक्रिया में साफ-सफाई और स्वच्छता के नियमों का कड़ा पालन किया जाता है, ताकि ग्राहकों की सेहत के साथ कोई समझौता न हो। सात दशकों से कोटा और पूरे हाड़ौती क्षेत्र के बाशिंदों ने जिस भरोसे के साथ इस स्वाद को अपनी दिनचर्या और त्योहारों का हिस्सा बनाया है, परिवार उसी विश्वास पर खरा उतरने के लिए लगातार प्रयासरत है। एक ठेले से निकलकर चार आउटलेट्स तक का यह सफर स्थानीय उद्यमशीलता का बेहतरीन उदाहरण है।



















