आर्थिक तंगी जब किसी परिवार पर अचानक हावी होती है, तो संभलने का रास्ता ढूंढना आसान नहीं होता। हैदराबाद की रहने वाली गंगा के सामने भी कुछ ऐसा ही दौर आया, जब उनके पति के व्यापार में बड़ा नुकसान हो गया और साथ ही चिटफंड के जरिए परिवार के लगभग 5 लाख रुपये डूब गए। घर की माली हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी और उस समय उनकी गोद में महज तीन साल का मासूम बेटा था। बच्चे की परवरिश और देखभाल की जिम्मेदारी के कारण गंगा कहीं बाहर जाकर नियमित नौकरी भी नहीं कर सकती थीं। लाचारी में वक्त बिताने के बजाय उन्होंने खुद अपने दम पर छोटा उद्यम शुरू करने का फैसला किया और अपनी लगन से पूरे परिवार की तकदीर बदल दी।
स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर तैयार की कारोबारी योजना
गंगा ने देखा कि सुबह की सैर पर निकलने वाले लोग अपने स्वास्थ्य और खान-पान को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। इसी जरूरत को भांपते हुए उन्होंने पौष्टिक और पारंपरिक पेय पदार्थों का काम शुरू करने की रूपरेखा बनाई। चेन्नई की पारपंरिक खान-पान शैली से प्रेरणा लेकर उन्होंने घर में ही नारियल का ताजा दूध तैयार करने का विचार बनाया। इसके बाद उन्होंने अपने छोटे बेटे के नाम पर रणबीर कोकोनट मिल्क नाम से एक छोटा सा स्टॉल स्थापित किया। इस काम की शुरुआत सड़क के किनारे केवल एक साधारण सी मेज रखकर की गई थी, जहां वह लोगों को शुद्ध व पौष्टिक ड्रिंक्स परोसती थीं।
पूरे परिवार ने मिलकर संभाला तैयारी का मोर्चा
सड़क किनारे स्टॉल लगाना सुनने में भले सीधा लगे, लेकिन इसके पीछे की शारीरिक मेहनत काफी कठिन होती है। नारियल को छीलना, उसके रेशे अलग करना और तोड़ना आसान नहीं होता। गंगा के इस संघर्ष में उनके मायके और ससुराल दोनों पक्षों का भरपूर सहयोग मिला। उनकी मां और भाई रात के समय ही सारे नारियल छीलकर और तोड़कर तैयार रख देते हैं, ताकि सुबह का काम समय पर पूरा हो सके।
भोर में चार बजे से शुरू होती है दिनचर्या
गंगा और उनके पति हर रोज तड़के 4 बजे बिस्तर छोड़ देते हैं। इसके बाद दोनों मिलकर नारियल का ताजा दूध निकालते हैं और गरम-गरम रागी जावा तैयार करते हैं। काम का बंटवारा भी बेहद अनुशासित तरीके से किया गया है। जहां पति तीन साल के बेटे को संभालते हैं और उसे स्कूल भेजने की तैयारी पूरी करते हैं, वहीं गंगा सुबह साढ़े छह बजे तक हर हाल में अपना स्टॉल खोल देती हैं। धीरे-धीरे उनके मेन्यू में नारियल के दूध के अलावा रागी जावा, मिलेट जावा और अंकुरित अनाज भी जुड़ गए।
शुरुआती नुकसान और समाज के तानों का किया सामना
शुरुआती दिनों में स्टॉल पर इक्का-दुक्का ग्राहक ही आते थे और बहुत सा पौष्टिक सामान बिना बिके बच जाता था। गंगा ने इस घाटे की चिंता किए बिना बचे हुए पेय को फेंकने के बजाय आसपास ड्यूटी कर रहे चौकीदारों और नगर निगम के सफाई कर्मचारियों को मुफ्त पिलाना शुरू कर दिया। सड़क किनारे दुकान लगाने पर रिश्तेदारों और आसपास के कुछ लोगों ने तरह-तरह के ताने भी मारे, लेकिन गंगा ने नकारात्मक टिप्पणियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। आज सुबह की सैर करने वाले तमाम स्थानीय लोग उनके स्टॉल पर सेहतमंद पेय पीने नियमित रूप से पहुंचते हैं, जिससे उनके परिवार को मजबूत आर्थिक आधार मिला है।





















