उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले स्थित तरबगंज विकासखंड में एक किसान की लगन ने ग्रामीण आजीविका की नई मिसाल पेश की है। उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद सरकारी और तकनीकी क्षेत्रों में सुरक्षित आजीविका मिलने के बावजूद, मिट्टी से जुड़े रहने के संकल्प ने राजेश कुमार तिवारी को एक सफल बागवान बना दिया। साल 2001 से लगातार खेती कर रहे राजेश ने पारंपरिक खेती के ढर्रे को तोड़ते हुए नकदी फसलों को प्राथमिकता दी और केले की बागवानी को अपने परिवार की आय का मुख्य आधार बना लिया। आज वह करीब 12 बीघे जमीन पर केले की सघन खेती कर रहे हैं और आने वाले दिनों में इसका दायरा और अधिक बढ़ाने की रूपरेखा तैयार कर चुके हैं।
तकनीकी शिक्षा से खेत की पगडंडियों तक का सफर
राजेश कुमार तिवारी की शैक्षिक पृष्ठभूमि आम पारंपरिक किसानों से काफी अलग रही है। उन्होंने बीएससी इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई पूरी की थी, जिसके तुरंत बाद उन्हें बैंकिंग सेक्टर में नौकरी मिल गई। कुछ समय तक बैंक में सेवाएं देने के बाद उन्होंने वह पद छोड़ दिया। इसके बाद उन्हें आईटीआई मनकापुर में भी काम करने का मौका मिला, लेकिन बंद कमरों और दफ्तरों का काम उन्हें ज्यादा दिनों तक नहीं भाया। अंततः वह अपनी नौकरी छोड़कर पैतृक गांव लौट आए और साल 2001 से पूरी तरह खेती-किसानी में जुट गए।
पारंपरिक फसलों को अलविदा कह नकदी फसल पर दांव
शुरुआती दौर में राजेश ने अपने इलाके के आम चलन के अनुसार पारंपरिक फसलों की बुआई शुरू की थी। हालांकि, पारंपरिक फसलों से मिलने वाले सीमित मुनाफे को देखकर उन्होंने किसी ऐसी नकदी फसल को अपनाने का फैसला किया जिससे सालभर नियमित और सम्मानजनक आमदनी सुनिश्चित हो सके। इसी विचार के तहत उन्होंने केले की खेती में हाथ आजमाया। उनका मानना था कि केला एक मजबूत नकदी फसल है जो किसानों को सीधा और बेहतर वित्तीय लाभ दे सकती है। प्रयोग सफल होने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे केले की खेती का क्षेत्रफल बढ़ाना शुरू कर दिया।
घाटे से नहीं हारी हिम्मत, नुकसान की पूरी भरपाई
खेती के सफर में उतार-चढ़ाव आम बात हैं और राजेश को भी इसका सामना करना पड़ा। पिछले साल प्राकृतिक कारणों या बाजार की अस्थिरता के चलते इलाके के कई किसानों को केले की खेती में भारी नुकसान उठाना पड़ा था। इसके बावजूद राजेश ने कदम पीछे नहीं खींचे और इस साल केले की बुआई का रकबा घटाने के बजाय और बढ़ा दिया। उनकी यह मेहनत रंग लाई और इस सीजन की उपज से उन्हें इतनी कमाई हुई कि पिछले साल का पूरा घाटा चुकता हो गया। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि खेती में कभी झटका लगे, तो किसानों को हौसला नहीं खोना चाहिए बल्कि दोगुने परिश्रम से काम में डटे रहना चाहिए।
लागत, मुनाफा और वैज्ञानिक देखभाल के नियम
वर्तमान में 12 बीघे में फसल लहलहा रहे राजेश केले की खेती के वित्तीय गणित और प्रबंधन को बेहद स्पष्ट तरीके से समझाते हैं। उनके अनुसार, एक बीघे में केले की फसल तैयार करने में तकरीबन 30 से 40 हजार रुपये की लागत आती है। जब फसल तैयार होकर बाजार पहुंचती है, तो प्रति बीघा 60 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक की आमदनी प्राप्त हो जाती है। हालांकि, यह अंतिम कमाई स्थानीय मौसम के मिजाज, कुल उत्पादन, फलों की गुणवत्ता और उस वक्त के मंडी भाव पर निर्भर करती है। उन्होंने बताया कि इस फसल में नियमित निगरानी, सही समय पर सिंचाई और पौधों की सतत देखभाल बेहद जरूरी होती है, जिससे उत्पादन का स्तर ऊंचा बना रहता है।



















