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अमेरिका ने बदला युद्ध का प्लान, एमक्यू-9 रीपर की जगह लेगा नया वाइल्डफायर ड्रोनतकनीक
24 अग॰ 2026, 9:57 pm (1 घंटे पहले)· 2

अमेरिका ने बदला युद्ध का प्लान, एमक्यू-9 रीपर की जगह लेगा नया वाइल्डफायर ड्रोन

अमेरिका अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए महंगे एमक्यू-9 रीपर ड्रोन की जगह कम लागत वाले वाइल्डफायर ड्रोन को शामिल करने जा रहा है। आधुनिक युद्धक्षेत्र की बदलती जरूरतों और बढ़ते जोखिमों के चलते यह कदम उठाया गया है।

अमेरिकी सैन्य रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसके तहत अमेरिका अपने पारंपरिक और महंगे सर्विलांस ड्रोन एमक्यू-9 रीपर को हटाने की तैयारी कर रहा है। कभी आसमान पर अपना दबदबा रखने वाला यह ड्रोन अब अमेरिकी रक्षा योजना के लिहाज से भारी और महंगा साबित हो रहा है। इसकी मुख्य वजह युद्ध के बदलते तौर-तरीके और आधुनिक जंग की नई वास्तविकताएं हैं, जहां दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम के आगे ऐसे महंगे उपकरणों को बचाए रखना बेहद कठिन हो गया है।

पिछले करीब दो दशकों से एमक्यू-9 रीपर अमेरिकी ड्रोन अभियानों की रीढ़ रहा है। हालांकि, मौजूदा समय में अमेरिकी सेना ऐसे भारी-भरकम और महंगे ड्रोनों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है जिन्हें हर हाल में सुरक्षित रखना जरूरी हो। इसके स्थान पर अब कम लागत वाले ऐसे ड्रोनों पर जोर दिया जा रहा है जिन्हें बड़ी संख्या में तैयार किया जा सके। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि यदि युद्ध के दौरान कुछ ड्रोन दुश्मन की कार्रवाई में नष्ट भी हो जाएं, तो भी देश की कुल सैन्य क्षमता और ताकत पर कोई बड़ा असर न पड़े।

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इसी बदलती सोच के बीच अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स ने अपने नए वाइल्डफायर ड्रोन की जानकारी सामने रखी है। इस आगामी ड्रोन को अगली पीढ़ी की तकनीक के रूप में देखा जा रहा है, जो खुफिया निगरानी से लेकर दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने जैसे कई चुनौतीपूर्ण कार्य एक साथ अंजाम दे सकेगा।

रीपर ड्रोन की उपयोगिता के रास्ते में उसकी बढ़ती हुई कीमत सबसे बड़ी बाधा बन गई है। अमेरिकी वायुसेना के अनुसार, सेंसर और अन्य आधुनिक उपकरणों से लैस एक एमक्यू-9 रीपर की कुल लागत लगभग 5 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। ऐसे अत्यधिक महंगे ड्रोन को किसी भी सैन्य संघर्ष में खोना अमेरिका के लिए भारी वित्तीय नुकसान का सौदा है। यही कारण है कि अब ऐसे विकल्पों पर काम हो रहा है जिन्हें गंवाने पर बजट पर बड़ा असर न पड़े।

जनरल एटॉमिक्स का नया वाइल्डफायर ड्रोन इसी नई अवधारणा के आधार पर विकसित किया जा रहा है। कंपनी के मुताबिक यह ड्रोन लंबी दूरी की उड़ान भरने और लंबे समय तक लगातार मिशन पर टिके रहने की क्षमता रखता है। इस नए ड्रोन की अनुमानित फेरी रेंज करीब 18 हजार किलोमीटर तक बताई गई है, जो इसे वैश्विक स्तर पर बेहद प्रभावी बनाती है।

इसके अलावा, इस ड्रोन में भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लंबी दूरी की एलआरएएसएम एंटी-शिप मिसाइल जैसे घातक हथियार शामिल करने की क्षमता भी बताई गई है। इसका मतलब यह है कि यह केवल आसमान से टोह लेने वाला माध्यम नहीं रहेगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दुश्मन के युद्धपोतों को भी नेस्तनाबूद कर सकेगा।

अमेरिका की इस नवीनतम रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण और दिलचस्प पहलू ड्रोन स्वॉर्म यानी ड्रोनों का झुंड है। कल्पना कीजिए कि जब दुश्मन के सामने इक्का-दुक्का महंगे ड्रोन के बजाय एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन पहुंच जाएंगे, तो मुकाबला करना कितना मुश्किल होगा। यदि विरोधी देश इनमें से कुछ को मार गिरा भी लेता है, तब भी बाकी ड्रोन अपने निर्धारित मिशन को पूरा करने में सक्षम रहेंगे। यही एट्रिटेबल मास यानी ऐसी भारी संख्या वाली क्षमता है जिसे नुकसान उठाने के जोखिम के साथ मैदान में उतारा जा सकता है।

यूक्रेन और मध्य पूर्व के मौजूदा संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि छोटे और कम खर्चीले ड्रोन भी अत्यधिक घातक साबित हो सकते हैं। कम कीमत वाले इन ड्रोनों की बड़ी खेप भेजकर दुश्मन की बेहद महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों को आसानी से खर्च कराया जा सकता है। कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ लाख डॉलर मूल्य के ड्रोन को रोकने के लिए लाखों डॉलर की मिसाइलें बर्बाद करनी पड़ती हैं। अमेरिका अब इसी बदलते वॉर मॉडल के अनुरूप खुद को ढालने की कोशिश कर रहा है।

हालांकि, इसका यह बिल्कुल अर्थ नहीं है कि एमक्यू-9 रीपर को तुरंत प्रभाव से युद्ध के मैदान से पूरी तरह हटा दिया जाएगा। रीपर आज भी खुफिया जानकारी जुटाने और लंबी दूरी के अभियानों के लिए काफी उपयोगी साबित होता है। अमेरिकी सेना इसकी कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए इसमें नए ईंधन विकल्प और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम जोड़ रही है, साथ ही लंबी दूरी के हथियार भी इसमें शामिल किए जा रहे हैं। मुख्य समस्या केवल यह है कि दुश्मन के उन्नत एयर डिफेंस वाले क्षेत्रों में रीपर को भेजना अब लगातार जोखिम भरा और खर्चीला होता जा रहा है।

इतिहास पर नजर डालें तो एमक्यू-9 रीपर ने इराक और अफगानिस्तान जैसे बड़े युद्धों में अमेरिका को रणनीतिक बढ़त दिलाई थी। यह लंबे वक्त तक आसमान में मंडराने, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर सटीक मिसाइल हमले करने में माहिर रहा है।

लेकिन अब वक्त बदल चुका है और युद्ध का मैदान भी पूरी तरह नया रूप ले चुका है।

ईरान और हूती जैसे विरोधियों के पास अब ऐसे आधुनिक हथियार मौजूद हैं जो इन ड्रोनों को आसानी से आसमान में ढेर कर सकते हैं। ईरान के साथ संघर्ष के दौरान अमेरिका के कम से कम 45 रीपर ड्रोन पूरी तरह तबाह हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, एक और बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि रीपर का उत्पादन पहले ही बंद किया जा चुका है। इसका मतलब यह हुआ कि जंग में नष्ट होने वाले ड्रोनों की भरपाई उतनी तेजी से करना अब संभव नहीं बचा है।

सवाल-जवाब

अमेरिका एमक्यू-9 रीपर ड्रोन को क्यों बदल रहा है?
रीपर ड्रोन की उच्च लागत (करीब 5 करोड़ डॉलर प्रति यूनिट) और दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम के आगे बढ़ते जोखिम के कारण अमेरिका इसे बदल रहा है।
नया वाइल्डफायर ड्रोन कौन बना रहा है?
अमेरिकी रक्षा कंपनी जनरल Atomics नए वाइल्डफायर ड्रोन को विकसित कर रही है।
वाइल्डफायर ड्रोन की अनुमानित फेरी रेंज कितनी है?
इस नए ड्रोन की अनुमानित फेरी रेंज लगभग 18,000 किलोमीटर बताई गई है।
ईरान संघर्ष के दौरान कितने रीपर ड्रोन तबाह हुए?
ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका के कम से कम 45 रीपर ड्रोन तबाह हो चुके हैं।
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