चारमीनार की ऐतिहासिक पहचान, मोतियों की चमक और लजीज बिरयानी के लिए पहचाने जाने वाले हैदराबाद का एक कोना ऐसा भी है, जहां पहुंचते ही माहौल पूरी तरह बदल जाता है. शहर के टोलीचौकी क्षेत्र में आने वाली पैरामाउंट कॉलोनी और सनसिटी की गलियों में कदम रखते ही किसी अफ्रीकी देश के जीवंत बाजार का अहसास होने लगता है. स्थानीय लोग अब इस पूरे दायरे को 'लिटिल अफ्रीका' के नाम से पुकारते हैं. दिन ढलने के बाद यहां की रौनक देखते ही बनती है, जहां विदेशी जीवनशैली और भारतीय माहौल का अनूठा संगम देखने को मिलता है.
परंपरा, परिधान और मसालों की खुशबू
शाम होते ही इन सड़कों पर पारंपरिक लंबे कुर्ते पहने लोग टहलते दिखाई देते हैं. चारों तरफ अरबी और अफ्रीकी भाषाओं की गूंज सुनाई देती है, जबकि स्थानीय भोजनालयों और कैफे से उठती खास मसालों की महक हवा में घुल जाती है. यहां सोमालिया, सूडान, यमन, एरिट्रिया और नाइजीरिया जैसे तमाम मुल्कों के लोग बड़ी तादाद में रह रहे हैं. इस बस्ती की अपनी एक पूरी आत्मनिर्भर दुनिया है, जहां दुकानों पर अरबी और सोमाली भाषा के साइनबोर्ड लगे हैं, खास हेयर सैलून मौजूद हैं और किराना दुकानों पर विदेशों से आने वाली विशेष सामग्रियां आसानी से मिल जाती हैं. स्थानीय खान-पान के अड्डों पर फाउल, सबायाड, अगाशी चिकन और खास मसालों से तैयार की जाने वाली सोमाली चाय के मुरीद हर शाम जुटते हैं.
सस्ती पढ़ाई और इलाज ने खींचा दायरा
हैदराबाद के इस हिस्से में अफ्रीकी समुदाय का यह जमावड़ा रातों-रात खड़ा नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे शहर के मजबूत शैक्षणिक और स्वास्थ्य संसाधन जिम्मेदार हैं. उस्मानिया यूनिवर्सिटी और इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेस यूनिवर्सिटी (EFLU) जैसे बड़े संस्थानों में अंग्रेजी माध्यम की गुणवत्तापूर्ण और किफायती उच्च शिक्षा अफ्रीकी नौजवानों को आकर्षित करती है. इसके साथ ही हैदराबाद के सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों का आधुनिक मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और वहां मिलने वाला सस्ता उपचार अफ्रीकी मुल्कों के मरीजों को मेडिकल टूरिज्म के जरिए यहां पहुंचाता है. छात्र और मरीज दोनों मिलकर इस इलाके को अपनी जरूरतों के मुताबिक ढाल चुके हैं.
निजामों के दौर से जुड़ा ऐतिहासिक नाता
हैदराबाद और अफ्रीकी महाद्वीप का यह संबंध कोई हालिया घटनाक्रम नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें इतिहास में काफी गहरी हैं. आसफ जाही रियासत के छठे निज़ाम महबूब अली पाशा ने अपने शासनकाल में अफ्रीकी सैनिकों की एक विशेष घुड़सवार टुकड़ी बनाई थी, जिसे 'अफ्रीकन कैवेलरी गार्ड्स' कहा जाता था. इसी सैन्य रेजिमेंट की याद में आज भी शहर में 'एसी गार्ड्स' नाम का इलाका आबाद है, जहां ऐतिहासिक सिद्दी समुदाय की पीढ़ियां पीढ़ियों से बसती आ रही हैं. इतिहास के उसी पुराने रिश्ते को आज टोलीचौकी का आधुनिक दायरा शिक्षा, व्यापार और चिकित्सा के दम पर एक नए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक विस्तार दे रहा है.




















