राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंट आबू से लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित अचलगढ़ क्षेत्र सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि भक्ति कालीन इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय के लिए भी जाना जाता है। कृष्ण भक्ति की अप्रतिम साधिका मीराबाई का इस पावन पहाड़ी से गहरा आत्मिक जुड़ाव रहा है। यहां अचलगढ़ किले के नजदीक एक पहाड़ी पर आज भी वह झोपड़ी मौजूद है, जहां रहकर उन्होंने कई वर्षों तक प्रभु श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति और कठोर तपस्या की थी।
राजसी ऐश्वर्य छोड़ चुनी थी एकांत कुटिया
इतिहास के पन्नों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मीराबाई ने इस एकांत स्थान पर पूरे बारह वर्षों तक साधना की थी। स्थानीय निवासी दिलीप भाई इस बारे में बताते हैं कि निकट ही मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा कुम्भा का राजमहल मौजूद था। मीराबाई का वैवाहिक संबंध भी कुम्भा के पड़पोते से ही हुआ था। इतना वैभवशाली राजपरिवार होने और पास में ही महल की सुख सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद उन्होंने महलों की चकाचौंध को पूरी तरह ठुकरा दिया था। उन्होंने इस साधारण सी कुटिया में एकांतवास करते हुए प्रभु के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण आज भी इस जगह को मीराबाई की झोपड़ी के नाम से पुकारा जाता है।
सावन भादो कुंड और लोक परंपराओं में दर्द की गूंज
अचलगढ़ की इस पहाड़ी पर स्थित सावन भादो कुंड को लेकर भी एक बेहद भावुक लोककथा प्रचलित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब मीराबाई भगवान श्री कृष्ण के विरह में व्याकुल होकर अश्रु बहाती थीं, तो उनके उन्हीं आंसुओं से इस कुंड का स्वरूप बना था। सिरोही और अचलगढ़ की लोकसंस्कृति तथा मारवाड़ी लोकगीतों में मीराबाई की इस निष्काम तपस्या का सुंदर चित्रण मिलता है। ‘आंकड़े री झोपड़ी छोड़ो मीराबाई हो’ जैसे प्रसिद्ध लोकभजन आज भी क्षेत्र में गाए जाते हैं। ये भजन दर्शाते हैं कि कैसे एक रानी ने शाही ठाठ-बाट को त्यागकर वैराग्य और भक्ति का कांटों भरा रास्ता अपनाया था।
धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक धरोहर का अनूठा संगम
अचलगढ़ की यह झोपड़ी आज के दौर में न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए एक अहम पड़ाव है, बल्कि इसका धार्मिक महत्व भी काफी बढ़ चुका है। वर्तमान समय में इस झोपड़ी के भीतर मीराबाई की एक प्रतिमा स्थापित की गई है, जहां श्रद्धालु श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। इस कुटिया के आसपास अचलगढ़ दुर्ग के प्राचीन अवशेष मौजूद हैं। साथ ही पास में मां चामुंडा माता और मां काली के ऐतिहासिक मंदिर भी स्थित हैं। देश के कोने-कोने से माउंट आबू आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु इस पवित्र झोपड़ी के दर्शन करने अचलगढ़ की पहाड़ियों तक जरूर पहुंचते हैं।



















