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तेलंगाना-कर्नाटक की सरहद पर बना यह सफेद अजूबा दरगाह क्यों कहलाती है 'मिनी ताजमहल'यात्रा
7 सित॰ 2026, 11:36 am (1 घंटे पहले)· 2

तेलंगाना-कर्नाटक की सरहद पर बना यह सफेद अजूबा दरगाह क्यों कहलाती है 'मिनी ताजमहल'

तेलंगाना और कर्नाटक की सरहद पर बनी हजरत सैय्यद शाह मुर्तजा कादरी मुल्तानी की दरगाह अपने सफेद गुंबद और ऊंची मीनारों की वजह से 'मिनी ताजमहल' के नाम से मशहूर हो रही है, जहां मुख्य मजार महीने में सिर्फ एक खास दिन ही खुलता है.

हैदराबाद से सटे तेलंगाना और कर्नाटक की सरहद पर एक ऐसी इमारत खड़ी है जो अपनी सफेद रंगत और ऊंची मीनारों की वजह से हर किसी की निगाहें खींच लेती है. हजरत सैय्यद शाह मुर्तजा कादरी मुल्तानी (रह.) की यह दरगाह तेलंगाना के विकराबाद और तांडूर से चंद किलोमीटर दूर, कर्नाटक के कलबुर्गी-बीदर सीमा इलाके में मौजूद है और इन दिनों स्थानीय लोगों के बीच खूब चर्चा में है.

सफेद गुंबद और मीनारें, ताजमहल से मिलती-जुलती बनावट

इस दरगाह की सबसे खास बात इसकी बनावट है. संगमरमर जैसा चमकता सफेद गुंबद, चारों कोनों पर खड़ी ऊंची मीनारें और चारों तरफ सफेद चारदीवारी, यह सब मिलकर आगरा के मशहूर ताजमहल की याद दिला देते हैं. यही वजह है कि तेलंगाना और आसपास के जिलों के लोग इसे अपनेपन से 'मिनी ताजमहल' के नाम से पुकारते हैं.

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वीकेंड ट्रिप के लिए परफेक्ट जगह

हैदराबाद, विकराबाद, संगारेड्डी और तांडूर में रहने वाले लोगों के लिए यह दरगाह एक दिन की सैर या वीकेंड आउटिंग के लिहाज से बेहद अच्छी जगह मानी जाती है. बारिश के मौसम में जब तेलंगाना की पहाड़ियां और सड़कें हरियाली से भर जाती हैं, तब यहां तक का सफर किसी खूबसूरत यात्रा जैसा महसूस होता है. खेतों और वादियों के बीच दूर से चमकती यह सफेद इमारत पहली नजर में ही देखने वालों का मन मोह लेती है.

साल में सिर्फ खास दिन ही खुलता है मुख्य मजार

इस दरगाह से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसका मुख्य मजार रोजाना श्रद्धालुओं के लिए नहीं खुलता. इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से हर नए चांद की पहली तारीख, खासतौर पर नौचंदी जुमेरात यानी नए चांद के बाद आने वाले पहले गुरुवार को ही मुख्य मजार के दरवाजे आम लोगों के लिए खोले जाते हैं. बाकी दिनों में दरगाह का बाहरी परिसर खुला रहता है, लेकिन असली जियारत के लिए लोग इसी खास दिन का इंतजार करते हैं. इसी वजह से हर महीने तेलंगाना से हजारों श्रद्धालु मुख्य मजार के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं.

गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

दक्कन का यह इलाका शुरू से ही अलग-अलग समुदायों की साझा संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है. तेलंगाना और कर्नाटक की सीमा पर बसे होने की वजह से यहां दोनों राज्यों की मिली-जुली परंपराएं और आपसी भाईचारा साफ नजर आता है. इस दरगाह में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग पूरी अकीदत के साथ अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं. जो लोग तेलंगाना के आसपास किसी शांत, खूबसूरत और रूहानी जगह की तलाश में हैं, उनके लिए सरहद पर बसा यह सफेद अजूबा एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है.

सवाल-जवाब

यह दरगाह कहां स्थित है?
यह तेलंगाना के विकराबाद और तांडूर से कुछ ही दूरी पर, कर्नाटक के कलबुर्गी-बीदर सीमा क्षेत्र में स्थित है.
इस दरगाह को मिनी ताजमहल क्यों कहा जाता है?
सफेद संगमरमर जैसे चमकते गुंबद, चारों कोनों पर ऊंची मीनारों और सफेद चारदीवारी की वजह से यह हूबहू आगरा के ताजमहल जैसी दिखती है.
यह दरगाह किसकी है?
यह हजरत सैय्यद शाह मुर्तजा कादरी मुल्तानी (रह.) की दरगाह है.
मुख्य मजार कब खुलता है?
हर नए चांद की पहली तारीख, खासकर नौचंदी जुमेरात यानी नए चांद के बाद पहले गुरुवार को मुख्य मजार खोला जाता है.
क्या बाकी दिनों में दरगाह बंद रहती है?
नहीं, बाहरी परिसर रोजाना खुला रहता है, सिर्फ मुख्य मजार खास दिन ही खुलता है.
यहां से नजदीक कौन-कौन से शहर हैं?
हैदराबाद, विकराबाद, संगारेड्डी और तांडूर से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है.
यहां दर्शन के लिए कौन-कौन आते हैं?
हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग पूरी अकीदत के साथ यहां आते हैं.
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