यूएसएआईडी में कागजी कार्रवाई के बिना ही फैसले लेते रहे जेरेमी लेविन, एचआर रिकॉर्ड में नहीं था नामलखनऊ में वोटों की गिनती में देरी पर अखिलेश यादव ने उठाए सवाल, चुनावी पारदर्शिता को लेकर खड़े किए गंभीर मुद्देग्वांगझू ओपन में 18 साल की लिली टैगर से हारीं वीनस विलियम्स, लगातार 16वां मुकाबला गंवायाजम्मू-कश्मीर की राजनीति में उबाल, उमर अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद उठा विवादतिरुचेंदूर मंदिर के सामने 75 फीट पीछे हटा समंदर, पानी खिसकने से सामने आए सदियों पुराने अवशेषअसम में बाल विवाह के खिलाफ पुलिस का बड़ा शिकंजा, 524 लोग गिरफ्तार और 441 मामले दर्जछत्तीसगढ़ में 15 नवंबर से शुरू होगी धान खरीदी, किसानों को मिलेगा ₹3100 प्रति क्विंटल का भावकविता महतो का जज्बा और देश की उन 5 महिलाओं की मिसाल, जिन्होंने संघर्ष से लिखी सफलता की नई इबारतमूलांक 1 और 5 वाले होते हैं सबसे तेज, नई स्किल्स सीखने में कभी नहीं पीछे हटतेमेघालय के इस कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में बुनियादी सुविधाओं का अकाल, डॉक्टर और स्पेशलिस्ट भी नहीं
मेघालय के दावकी में पेड़ों की जड़ों से खुद-ब-खुद तैयार होता है यह अनोखा पुल, बनने में लग जाते हैं दशकोंयात्रा
6 सित॰ 2026, 7:47 pm (51 दिन पहले)· 2

मेघालय के दावकी में पेड़ों की जड़ों से खुद-ब-खुद तैयार होता है यह अनोखा पुल, बनने में लग जाते हैं दशकों

मेघालय के दावकी में स्थित लिविंग रूट ब्रिज लोहे या सीमेंट से नहीं, बल्कि पेड़ों की जीवित जड़ों को दशकों तक दिशा देकर तैयार किया गया है, और आज भी यह मजबूत होता जा रहा है.

मेघालय की पहाड़ियों में एक ऐसा पुल मौजूद है जिसे बनाने में न तो कोई ईंट लगी, न सीमेंट और न ही लोहे की एक छड़. दावकी में स्थित यह पुल असल में पेड़ों की जीवित जड़ों को बरसों तक एक तय दिशा में बढ़ाकर तैयार किया गया है, और यही वजह है कि यह हर साल देश-विदेश से आने वाले सैलानियों के बीच खिंचाव का बड़ा कारण बनता है.

हरे-भरे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसा यह पुल देखने में जितना असाधारण लगता है, इसके तैयार होने की प्रक्रिया उतनी ही धीमी और मेहनत भरी है.

ये भी पढ़ें

जड़ों को पुल में बदलने का तरीका

इस तरह के पुल बनाने के लिए स्थानीय लोग रबर फिग यानी फ़िकस इलास्टिका के पेड़ चुनते हैं, क्योंकि इनकी जड़ें बेहद मजबूत और लचीली होती हैं. शुरुआत में इन जड़ों को नदी या नाले के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाने के लिए बांस या लकड़ी के ढांचे का सहारा लिया जाता है. इसी ढांचे के सहारे जड़ें धीरे-धीरे तय दिशा में आगे बढ़ती रहती हैं.

समय बीतने के साथ ये जड़ें मोटी होती जाती हैं और आपस में गुंथकर एक ठोस ढांचा बना लेती हैं, जो आगे चलकर लोगों के चलने लायक मजबूत पुल का रूप ले लेता है. इस पूरी प्रक्रिया में कई-कई दशक लग जाते हैं, इसलिए इसे किसी सामान्य इंजीनियरिंग वाले पुल की तरह नहीं, बल्कि एक 'जीवित पुल' के तौर पर देखा जाता है. स्थानीय लोग इसकी देखरेख भी लगातार करते रहते हैं, ताकि जड़ें सही दिशा में बढ़ती रहें, और वक्त के साथ इनकी मजबूती और भी बढ़ती जाती है.

खासी और जैंतिया समुदायों की विरासत

इस तकनीक की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें प्रकृति को बदला नहीं गया, बल्कि उसी के साथ तालमेल बिठाकर काम लिया गया. मेघालय के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में नदियां और धाराएं पार करना हमेशा से एक चुनौती रही है, और इसी जरूरत ने खासी और जैंतिया समुदायों को यह पारंपरिक तरीका विकसित करने के लिए प्रेरित किया. यह तकनीक पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही और आज भी इसे उसी सावधानी से निभाया जाता है.

कई पुराने लिविंग रूट ब्रिज आज भी सक्रिय इस्तेमाल में हैं. कुछ पुलों की उम्र तो 100 साल से भी ज्यादा बताई जाती है. हालांकि हर पुल की मजबूती और उम्र उसकी जगह, वहां की जलवायु और उसकी देखभाल पर निर्भर करती है, इसलिए हर पुल की कहानी थोड़ी अलग होती है.

उमंगोट नदी और दावकी की खूबसूरती

दावकी सिर्फ अपने लिविंग रूट ब्रिज के लिए ही नहीं, बल्कि उमंगोट नदी के साफ पानी के लिए भी जाना जाता है. चारों तरफ फैले हरे पहाड़, घने जंगल और नदी का पारदर्शी पानी इस जगह को बेहद खूबसूरत बनाते हैं. यहां आने वाले पर्यटकों को सिर्फ प्रकृति ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की परंपरा और उनके पीढ़ियों पुराने ज्ञान को भी करीब से देखने का मौका मिलता है.

दावकी के आसपास श्नोंगपडेंग और मॉलिन्नॉन्ग जैसी जगहें भी हैं, जो अपनी अलग खूबसूरती के लिए जानी जाती हैं. जो लोग दावकी घूमने आते हैं, वे अक्सर अपनी यात्रा में इन जगहों को भी शामिल कर लेते हैं.

यात्रा की योजना बनाते वक्त क्या ध्यान रखें

मेघालय में बारिश काफी ज्यादा होती है, इसलिए यहां की यात्रा की तारीख तय करते वक्त मौसम का खास ख्याल रखना जरूरी है. आमतौर पर अक्टूबर से मार्च के बीच का समय इस इलाके में घूमने के लिहाज से सबसे सुविधाजनक माना जाता है. दावकी तक पहुंचने के लिए शिलॉन्ग से सड़क मार्ग का इस्तेमाल किया जा सकता है. यात्रा पर निकलने से पहले स्थानीय पर्यटन विभाग से ताजा जानकारी और मौसम की स्थिति जरूर जांच लेनी चाहिए, ताकि रास्ते में किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े.

सवाल-जवाब

दावकी का लिविंग रूट ब्रिज किस पेड़ की जड़ों से बना है?
यह पुल रबर फिग यानी फ़िकस इलास्टिका के पेड़ों की मजबूत जड़ों से तैयार किया गया है.
इस तरह का पुल बनकर तैयार होने में कितना समय लगता है?
जड़ों को मजबूत पुल में बदलने में कई दशक लग जाते हैं.
दावकी लिविंग रूट ब्रिज किस नदी के पास स्थित है?
यह उमंगोट नदी के पास स्थित है, जो अपने साफ पानी के लिए जानी जाती है.
इस तकनीक को किन समुदायों ने विकसित किया?
मेघालय के खासी और जैंतिया समुदायों ने इस पारंपरिक तकनीक को विकसित किया.
कुछ लिविंग रूट ब्रिज कितने पुराने बताए जाते हैं?
कुछ पुलों की उम्र 100 साल से भी ज्यादा बताई जाती है.
दावकी घूमने का सबसे सही समय कौन सा है?
आमतौर पर अक्टूबर से मार्च के बीच का समय यात्रा के लिए सुविधाजनक माना जाता है.
दावकी तक कैसे पहुंचा जा सकता है?
शिलॉन्ग से सड़क मार्ग के जरिए दावकी पहुंचा जा सकता है.
दावकी के आसपास घूमने की और कौन-कौन सी जगहें हैं?
श्नोंगपडेंग और मॉलिन्नॉन्ग जैसी जगहें दावकी के पास स्थित हैं.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp