भारतीय समाज के एक खास वर्ग में लंबे समय से एक अनोखा चलन देखा जाता रहा है। पुराने समय के कुछ अभिजात वर्ग में यह बात बेहद सामान्य थी कि पैंसठ या सत्तर साल के बुजुर्ग भी इक्कीस या पच्चीस साल की युवतियों से विवाह कर लेते थे। उस दौर के बड़े परिवारों में इस तरह के समीकरणों को लेकर खास सवाल नहीं उठाए जाते थे। इस तरह के रिश्तों की विडंबना को देश के महान रचनाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी प्रसिद्ध कृति निर्मला में बहुत गहराई से उकेरा था। उस उपन्यास के जरिए एक ऐसी युवती की घुटन भरी भावनाओं को सामने लाया गया था, जिसे अपने से कहीं अधिक उम्र के व्यक्ति के साथ जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
लेकिन आज का दौर बदल चुका है और समाज ने उन पुरानी रूढ़ियों को पीछे छोड़ दिया है। आज के समय में किसी भी लड़की पर यह दबाव नहीं है कि वह अपनी मर्जी के खिलाफ किसी भी उम्र के व्यक्ति के साथ जीवन बांध ले। इसके बावजूद जब वर्तमान समय में इक्कीस या पच्चीस साल की युवतियां सत्तर या पचहत्तर साल के पुरुषों के साथ जीवन की नई शुरुआत करने का दावा करती हैं, तो यह सोचना लाजिमी हो जाता है कि आखिर इसे क्या कहा जाए। यह विषय हाल ही में तब और चर्चा में आ गया जब उत्तर प्रदेश के औरैया जिले से पचहत्तर साल के रामसुगर और तीस साल की रानी राजपूत की सगाई की खबरें सामने आईं। क्या इस तरह के समीकरणों को सच्चा प्रेम माना जा सकता है या फिर पचहत्तर की उम्र में अपने से आधी से भी कम उम्र की लड़की के साथ जुड़ना केवल एक दिखावा मात्र है।
इन घटनाओं के सामने आते ही सार्वजनिक मंचों और डिजिटल माध्यमों पर बहसों का दौर शुरू हो जाता है। आधुनिक समय में इस तरह की चर्चाओं की शुरुआत मुख्य रूप से मटुकनाथ और जूली के चर्चित प्रकरण से मानी जाती है। उस दौरान जब पारंपरिक संचार माध्यमों के जरिए इन मामलों को लगातार हवा मिली, तो यह प्रेम कहानी देश भर में चर्चा का केंद्र बन गई थी। उस वक्त मटुकनाथ इक्यावन साल के थे जबकि जूली की उम्र महज इक्कीस साल थी और दोनों के बीच पूरे तीस साल का फासला था। समाज के एक छोटे वर्ग ने इसे वैचारिक और आत्मिक जुड़ाव का नाम देकर सहानुभूति जताई, लेकिन आम जनता ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया।
यदि वास्तव में उनके बीच कोई गहरा आत्मिक और निस्वार्थ प्रेम होता, तो वह समाज के विरोध के आगे टिक सकता था। लेकिन कुछ ही समय बाद वह संबंध पूरी तरह बिखर गया और दोनों की राहें अलग हो गईं। जूली ने तो अपने जीवन को आगे बढ़ा लिया, लेकिन मटुकनाथ आज भी अकेलेपन और तन्हाई से भरा जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। वर्तमान समय में भी कबीर बेदी या मिलिंद सोमन जैसी हस्तियों के विवाहों को लेकर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं और इसे वैचारिक स्वतंत्रता का नाम दिया जाता है।
यदि इन सभी बेमेल रिश्तों का आकलन जैविक और वैज्ञानिक पैमानों पर किया जाए, तो यह केवल एक मजाक जैसा प्रतीत होता है। जिस पड़ाव पर शरीर को पूरी तरह से आराम और सहारे की आवश्यकता होती है, उस उम्र में इस तरह के जीवनसाथी की तलाश करना समझ से परे है। उम्र के प्राकृतिक नियमों और जैविक घड़ी की सच्चाई को नजरअंदाज करके इन संबंधों को सही ठहराना खुद से झूठ बोलने जैसा है। यह सुनने में जरूर आकर्षक लग सकता है कि सच्चे प्रेम के लिए उम्र कोई बाधा नहीं होती और प्यार में सब कुछ जायज माना जाता है।
लेकिन यह रिश्ता पूरी तरह से प्राकृतिक होना चाहिए और प्रकृति ने इसके लिए एक निश्चित उम्र भी तय की है। यदि यह संबंध पूरी तरह से शुद्ध और स्वार्थरहित है, तो इसके लिए सात फेरे लेने और विवाह के प्रमाण पत्र की क्या आवश्यकता है। प्रेम तो बिना किसी सामाजिक बंधन के भी अपनी सीमाओं को पार कर सकता है। फिर समाज की आंखों में धूल झोंककर उस युवती के जीवन को एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर क्यों धकेला जाता है, जहां भविष्य के नाम पर केवल अकेलापन और देखभाल की मजबूरी बचती है।
यहां यह सवाल भी खड़ा होता है कि विवाह जैसी संस्था का मूल उद्देश्य क्या है। धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार शादी केवल दो शरीरों का मिलन नहीं है, बल्कि यह वंश को आगे बढ़ाने और एक लंबी जीवन यात्रा को मिलकर तय करने का माध्यम है। विवाह समाज द्वारा तय किए गए कुछ निश्चित नियमों के दायरे में आता है, इसलिए यदि आप इस व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहते हैं तो आपको उन नियमों का पालन करना होगा। लेकिन जब कोई व्यक्ति इन सभी मानकों को दरकिनार करके उसी समाज के नियमों का फायदा उठाने की कोशिश करता है, तो यह उसकी भोगवादी और विकृत मानसिकता को ही दर्शाता है।
आखिरकार इस उम्र में विवाह का ढोंग रचने की क्या मजबूरी है। जिस रिश्ते की नींव ही पूरी तरह से असंतुलन पर टिकी हो, उस पर जबरन पवित्रता का मुखौटा पहनाने का क्या औचित्य है। सच्चाई तो यह है कि इस तरह के तथाकथित प्रेम संबंध केवल कल्पनाओं, यौन कुंठाओं, रसूख के प्रदर्शन या अकेलेपन से बचने के स्वार्थी तरीके बनकर रह गए हैं। इन मामलों में उम्र का यह बड़ा अंतर एक तरफ बुजुर्ग की असुरक्षा को छिपाता है, तो दूसरी तरफ यह युवा जीवन के साथ एक बहुत बड़ा मजाक है। यदि वास्तव में आपके बीच कोई उच्च कोटि का प्रेम है, तो उसे समाज के सामने साबित करने के लिए इंसानों द्वारा बनाई गई शादी की इस फंतासी में फंसने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसे एक आध्यात्मिक रिश्ता बनाकर बिना शादी के जिया जा सकता है, अन्यथा इस तरह के दिखावे केवल पाखंड के अलावा और कुछ नहीं हैं।



















