बिहार के मिथिला क्षेत्र में लोकपर्व केवल पारंपरिक अनुष्ठान मात्र नहीं होते, बल्कि उनमें सामाजिक ताने-बाने, पारिवारिक आत्मीयता और लोक संस्कृति की गहरी झलक दिखाई देती है। इसी समृद्ध परंपरा का एक प्रमुख उदाहरण चौरचन पर्व है, जिसे स्थानीय स्तर पर चौठ चंद्र, चौठचंद्र अथवा चकचन्ना पर्व के नाम से भी पुकारा जाता है। सामान्य तौर पर देश के विभिन्न हिस्सों में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है, जहां इस तिथि को चंद्रमा के दर्शन करने से बचने का विधान बताया जाता है। इसके ठीक विपरीत, मिथिलांचल में इसी शाम चंद्रमा की बाकायदा विधि-विधान से पूजा की जाती है और उन्हें विभिन्न प्रकार के पकवानों, ताजे फलों, गाढ़े दही तथा मिठाइयों का अर्घ्य समर्पित किया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 14 सितंबर को मनाया जा रहा है, जब चतुर्थी तिथि सुबह के समय शुरू हो रही है।
मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और चौरचन की महत्ता
चौरचन को मिथिला की लोक संस्कृति का आधार माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पड़ने वाले इस पर्व की पूजन शैली और लोकाचार इसे अन्य क्षेत्रों की गणेश चतुर्थी से पूरी तरह अलग और विशिष्ट बनाते हैं। इस दिन घरों में उत्सव जैसा वातावरण रहता है। परिवार की महिलाएं दिनभर निर्जला या फलाहार रहकर उपवास का पालन करती हैं। शाम ढलते ही घर के खुले आंगन अथवा छत पर पूजन की व्यापक तैयारियां आरंभ हो जाती हैं। इस दौरान पूजा स्थल को मिथिला की पारंपरिक अरिपन कला से बेहद खूबसूरती के साथ सजाया जाता है। चावल के लेप और प्राकृतिक रंगों से बने अरिपन पर सभी पूजन सामग्रियां स्थापित की जाती हैं। इसके पश्चात प्रथम पूज्य भगवान गणेश और अन्य देवी-देवताओं की आराधना की जाती है, जिसके बाद चंद्रमा के उदित होने पर उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है।
पारंपरिक पकवान और पूजन अनुष्ठान का विधान
इस पर्व का सबसे आकर्षक पहलू घर की रसोई में तैयार होने वाले ठेठ पारंपरिक व्यंजन और नैवेद्य हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं और परिवार की अन्य सदस्य कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाती हैं। इनमें विशेष रूप से पकाई गई खीर, पूड़ी, विशेष मिठाइयां, विभिन्न मौसमी फल और मिट्टी के बर्तनों में जमाया गया शुद्ध दही शामिल होता है। इसके अलावा कई क्षेत्रों में चावल और गेहूं के आटे से कई तरह के पारंपरिक पकवान तैयार करने की प्रथा है। मिथिला के अनेक गांवों और नगरों में यह अनूठी परंपरा भी देखने को मिलती है कि परिवार में जितने सदस्य होते हैं, उसी संख्या के अनुसार अलग-अलग डलिया या थाल में नैवेद्य सजाया जाता है। शाम को जब चंद्रदेव आकाश में दिखाई देते हैं, तब परिवारजन हाथ में फल या पकवान लेकर चंद्रमा की दिशा में देखते हुए पारंपरिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं और अर्घ्य प्रदान करते हैं। पूजा संपन्न होने के उपरांत यह पवित्र प्रसाद परिवार के सभी सदस्यों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों में वितरित किया जाता है।
स्यमंतक मणि और जंगल में प्रसेन की मृत्यु का प्रसंग
चौरचन पर्व और इस दिन चंद्रमा की पूजा का संबंध द्वापर युग की एक बेहद रोचक और शिक्षाप्रद पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, सत्राजीत नाम के एक प्रतापी व्यक्ति ने भगवान सूर्यदेव की अत्यंत कठिन तपस्या की थी। सत्राजीत की निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें स्यमंतक मणि भेंट स्वरूप प्रदान की। इस दिव्य मणि के बारे में यह मान्यता प्रचलित थी कि यह हर रोज प्रचुर मात्रा में स्वर्ण उत्पन्न करती थी, जिससे चारों ओर समृद्धि बनी रहती थी। सत्राजीत ने उस अनमोल मणि को अपने भाई प्रसेन को सौंप दिया।
एक दिन प्रसेन उस बहुमूल्य स्यमंतक मणि को अपने गले में धारण कर आखेट के लिए घने जंगल की ओर प्रस्थान कर गए। दुर्भाग्यवश, जंगल में शिकार के दौरान एक बलशाली सिंह ने प्रसेन पर घातक हमला बोल दिया। उस संघर्ष में प्रसेन की मृत्यु हो गई और वह सिंह स्यमंतक मणि को अपने साथ उठाकर ले गया। कुछ समय बाद उस जंगल में विचरण कर रहे रीछराज जाम्बवान की दृष्टि उस सिंह पर पड़ी। जाम्बवान ने तत्काल सिंह को मार गिराया और वह दिव्य मणि अपने अधिकार में ले ली। जाम्बवान उस मणि को लेकर अपने निवास स्थान पहुंचे और वहां उन्होंने वह मणि अपने छोटे पुत्र सुकुमार को खेलने के लिए दे दी।
द्वारका में संदेह और श्रीकृष्ण पर लगे गंभीर आरोप
इधर जब प्रसेन जंगल से लौटकर द्वारका नहीं आए, तो सत्राजीत के मन में गहरा संदेह उत्पन्न हुआ। सत्राजीत ने बिना किसी ठोस प्रमाण के सीधे भगवान श्रीकृष्ण पर यह मिथ्या आरोप मढ़ दिया कि उन्होंने स्यमंतक मणि के लोभ में आकर प्रसेन की हत्या करवा दी है और मणि हड़प ली है। द्वारका की प्रजा और समाज के बीच यह आरोप श्रीकृष्ण के लिए बेहद गंभीर और मानहानिकारक था। उन्होंने तुरंत इस झूठे कलंक को धोने और सत्य को सबके सामने उजागर करने का संकल्प लिया।
सत्य की खोज में श्रीकृष्ण अपने साथ कुछ विश्वस्त नागरिकों को लेकर उस जंगल में पहुंचे जहां प्रसेन शिकार खेलने गए थे। गहन खोजबीन के पश्चात उन्हें प्रसेन का मृत शरीर पड़ा मिला। उस स्थान पर पास में ही एक हिंसक सिंह के पैरों के स्पष्ट निशान दिखाई दिए। श्रीकृष्ण उन पदचिह्नों का पीछा करते हुए आगे बढ़े, तो कुछ ही दूरी पर उन्हें वह सिंह भी मृत अवस्था में मिला। सिंह के शव के निकट से विशाल जाम्बवान के पैरों के निशान आगे की ओर जा रहे थे। श्रीकृष्ण बड़ी सावधानी से उन निशानों के सहारे घने जंगल के भीतर स्थित एक विशाल और अंधियारी गुफा तक जा पहुंचे।
गुफा में 21 दिनों का भीषण युद्ध और जाम्बवान का बोध
जब श्रीकृष्ण गुफा के भीतर प्रविष्ट हुए, तो उन्होंने देखा कि दिव्य स्यमंतक मणि वहां जाम्बवान के बालक सुकुमार के पास रखी हुई थी। वहां मौजूद एक दाई उस शिशु की देखभाल कर रही थी और बच्चे को बहलाने के लिए उस मणि से जुड़ी बातें बता रही थी। जैसे ही श्रीकृष्ण आगे बढ़े, जाम्बवान वहां प्रकट हो गए और अनजान व्यक्ति को गुफा में देखकर अत्यंत क्रोधित हो उठे। इसके उपरांत श्रीकृष्ण और जाम्बवान के मध्य एक अत्यंत भीषण और ऐतिहासिक मल्लयुद्ध छिड़ गया।
पौराणिक कथाओं में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यह मल्ल युद्ध लगातार 21 दिनों तक बिना रुके चलता रहा। लगातार इक्कीस दिन तक युद्ध करने के बाद अंततः जाम्बवान के शरीर की शक्ति क्षीण होने लगी और उन्हें गहरा विस्मय हुआ कि तीनों लोकों में ऐसा कौन सा बलशाली योद्धा है जो उन्हें टक्कर दे रहा है। उसी क्षण जाम्बवान को आत्मिक बोध हुआ कि उनके सम्मुख युद्ध कर रहे श्रीकृष्ण कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि वही परमेश्वर हैं जिनकी उन्होंने त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम के रूप में सेवा की थी। इस सत्य का साक्षात्कार होते ही जाम्बवान ने शस्त्र त्याग दिए और हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की। उन्होंने ससम्मान स्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को अर्पित की और साथ ही अपनी गुणवती पुत्री जाम्बवती का पाणिग्रहण भी श्रीकृष्ण के साथ करा दिया।
सत्राजीत की भूल और चंद्रमा के दर्शन का रहस्य
श्रीकृष्ण जब स्यमंतक मणि और जाम्बवती के साथ द्वारका नगरी लौटे, तो उन्होंने राजसभा में सभी गणमान्य नागरिकों के समक्ष पूरी सच्चाई विस्तारपूर्वक रखी। इसके बाद उन्होंने वह स्यमंतक मणि सत्राजीत को वापस सौंप दी। भरी सभा में जब सच्चाई सामने आई, तो सत्राजीत को अपनी भारी भूल और जल्दबाजी का गहरा पश्चाताप हुआ। उन्हें भली-भांति समझ आ गया कि श्रीकृष्ण पर लगाया गया चोरी और हत्या का आरोप पूरी तरह निराधार और गलत था। इस तरह श्रीकृष्ण प्रथम आरोप से सर्वथा मुक्त हो गए।
हालांकि घटनाक्रम यहीं समाप्त नहीं हुआ। कुछ समय के उपरांत सत्राजीत की किसी षड्यंत्र में हत्या कर दी गई और वह चमत्कारी स्यमंतक मणि पुनः रहस्यमय ढंग से गायब हो गई। इस दुखद घटना के बाद समाज में एक बार फिर श्रीकृष्ण की भूमिका को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई और लोगों ने उन पर दोबारा संदेह व्यक्त करना शुरू कर दिया। बाद में पूरी परिस्थितियों की पड़ताल होने के बावजूद उस समय श्रीकृष्ण को वह मणि प्राप्त नहीं हो सकी, जिससे उनके चरित्र पर फिर से लांछन और कलंक की स्थिति बन गई।
इन्हीं विषम परिस्थितियों के बीच कथा में देवर्षि नारद का प्रवेश होता है, जो चौरचन के मूल रहस्य को उजागर करते हैं। मान्यता के अनुसार, जब श्रीकृष्ण इस अकारण मिथ्या कलंक से व्यथित थे, तब देवर्षि नारद ने उन्हें इस रहस्य से अवगत कराया। नारद जी ने स्पष्ट किया कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को अनजाने में चंद्रमा के दर्शन कर लेने के कारण ही उन पर यह घोर मिथ्या कलंक लगा है। तब श्रीकृष्ण ने विस्मित होकर देवर्षि नारद से यह प्रश्न किया कि आखिर इस विशिष्ट तिथि को चंद्रमा को देखने मात्र से ऐसा दोष और अपयश क्यों लगता है। इसी पौराणिक प्रसंग के उपरांत मिथिला क्षेत्र में इस दिन चंद्रमा की विशेष अर्चना कर दोष निवारण और मिथ्या कलंक से मुक्ति पाने के लिए चौरचन पर्व मनाने की अखंड परंपरा स्थापित हुई।



















