घर में जब भी कोई नन्हा बच्चा कागज पर कोई चित्र उकेर कर लाता है, तो माता-पिता अक्सर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं कि वह बहुत बड़ा कलाकार बन गया है. इसी तरह स्कूल का गृहकार्य समय पर पूरा करने पर उसे बहुत होशियार या बुद्धिमान बता दिया जाता है. छोटे-छोटे प्रयासों पर शाबाशी देना अभिभावकों के लिए प्यार और स्नेह जताने का सबसे स्वाभाविक और सहज माध्यम प्रतीत होता है. हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनके बच्चे का मनोबल और आत्मविश्वास लगातार नई ऊंचाइयों को छुए. इसके बावजूद परवरिश और बाल मनोविज्ञान से जुड़े विभिन्न अध्ययन एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू की ओर ध्यान खींचते हैं, जहां प्रशंसा का तरीका बच्चे की पूरी सोच को बदल सकता है.
बच्चों की तारीफ करना या उनकी खुशियों में शरीक होना कतई अनुचित नहीं है. असल फर्क इस बुनियादी बात से तय होता है कि प्रशंसा किस विशेष पहलू की जा रही है. हर छोटी-बड़ी गतिविधि के उपरांत एक ही तरह के घिसे-पिटे शब्दों को दोहराने के बजाय यदि बच्चे की वास्तविक लगन, उसकी चुनी हुई कार्यप्रणाली और उसकी निरंतर कोशिशों पर गौर किया जाए, तो यह उसके मानसिक विकास के लिए कहीं अधिक लाभकारी साबित होता है.
पर्सन प्रेज और प्रोसेस प्रेज के बीच का अहम फासला
आमतौर पर अभिभावक अपने बच्चों का उत्साह बढ़ाने के लिए उन्हें जीनियस, सबसे बेहतर या जन्मजात प्रतिभाशाली जैसे विशेषणों से नवाजते हैं. पहली नजर में ये बातें अत्यधिक उत्साहवर्धक और सकारात्मक लगती हैं. बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ इस विषय पर बात करते हुए व्यक्ति केंद्रित प्रशंसा यानी पर्सन प्रेज और प्रक्रिया केंद्रित प्रशंसा यानी प्रोसेस प्रेज के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचते हैं.
पर्सन प्रेज का सीधा अर्थ होता है बच्चे की किसी आंतरिक क्षमता, बुद्धिमत्ता या उसके व्यक्तित्व की तारीफ करना, जैसे कि यह कहना कि वह बहुत चतुर है. इसके ठीक विपरीत प्रोसेस प्रेज में इस बात को रेखांकित किया जाता है कि बच्चे ने उस काम को अंजाम देने के लिए क्या रणनीति बनाई और कितनी मेहनत की. इसमें माता-पिता बच्चे से यह कह सकते हैं कि उसने जटिल सवाल को सुलझाने के लिए किस प्रकार बार-बार अभ्यास किया या किसी कठिन हिस्से को गहराई से समझने के लिए दोबारा ध्यान से पढ़ा.
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, बच्चों के परिश्रम और उनकी व्यावहारिक रणनीतियों की सराहना करने से उनमें विपरीत परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करने और कठिन चुनौतियों को स्वीकार करने का साहस पैदा होता है.
प्रशंसा की मात्रा नहीं बल्कि उसकी प्रासंगिकता मायने रखती है
बच्चे की हौसलाअफजाई करना अपने आप में कोई अनुचित कदम नहीं है, बल्कि मुख्य सवाल यह उठता है कि वह सराहना कितनी सटीक, संतुलित और अर्थपूर्ण है. यदि कोई बच्चा हर सामान्य बात पर भी एक ही तरह की अतिशयोक्तिपूर्ण वाहवाही सुनता रहेगा, तो धीरे-धीरे ऐसी सामान्य टिप्पणियां उसके लिए अपनी महत्ता और मार्गदर्शन करने की क्षमता खोने लगती हैं.
साल 2025 में प्रकाशित हुए एक शोध अध्ययन में विशेषज्ञों ने इस बात का विश्लेषण किया कि चार से पांच वर्ष के छोटे बच्चे भी यह भली-भांति भांपने में सक्षम होते हैं कि उन्हें मिलने वाली तारीफ उनके काम के वास्तविक स्तर से कितना मेल खाती है. इसका सीधा अर्थ यह है कि बच्चों के लिए महज अच्छे शब्द सुनना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि वे यह भी परखने लगते हैं कि वह प्रशंसा वास्तव में उनके प्रयास के बारे में क्या संदेश दे रही है. उदाहरण के तौर पर, यदि कोई बच्चा पहली मर्तबा दो पहियों वाली साइकिल पर संतुलन साधने की मशक्कत कर रहा है, तो उसे सिर्फ बहुत बढ़िया कहने के बजाय यह कहना कहीं अधिक असरदार है कि गिरने के बावजूद उसने तुरंत उठकर दोबारा पैडल मारने की हिम्मत दिखाई.
प्रतिभा की अतिप्रशंसा से पैदा होने वाले अनचाहे दबाव
जब किसी बच्चे को लगातार उसकी कुशाग्र बुद्धि या नैसर्गिक प्रतिभा के आधार पर ही आंका और सराहा जाता है, तो उसके अवचेतन मन में यह ख्याल घर कर सकता है कि जीवन में मिलने वाली हर कामयाबी केवल उसकी किसी तयशुदा और स्थायी क्षमता की देन है. ऐसी मानसिकता का दुष्परिणाम तब सामने आता है जब वही बच्चा किसी मुश्किल इम्तिहान में बैठता है या उसके अंक उम्मीद से कम आते हैं. ऐसी स्थिति में वह यह मानने लगता है कि शायद उसके भीतर काबिलियत की ही कमी रह गई है.
स्टैनफोर्ड की जानी-मानी मनोवैज्ञानिक कैरोल ड्वेक के अनुसंधानों से स्पष्ट होता है कि बच्चों के श्रम, उनकी योजना, एकाग्रता और सतत अभ्यास की प्रशंसा करना उन्हें जटिल परिस्थितियों के समक्ष भी टिके रहने का संबल देता है. इसके उलट केवल पैदाइशी क्षमता की तारीफ बच्चों के मन में विफलता का डर भर देती है, जिससे वे नई चुनौतियों और मुश्किल कामों से कतराने लगते हैं. इसका तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं है कि माता-पिता बच्चे को समझदार या बुद्धिमान कहना पूरी तरह वर्जित कर दें, बल्कि सावधानी इस बात की रखनी है कि सफलता का पूरा श्रेय केवल आंतरिक प्रतिभा को न देकर उसकी कोशिशों को भी पूरी जगह दी जाए.
रोजमर्रा की परवरिश में तारीफ को अधिक उपयोगी बनाने के तरीके
मान लीजिए कि कोई बच्चा किसी उलझी हुई पहेली को सुलझाने में जुटा हुआ है. ऐसे में यह कहने के बजाय कि उसका दिमाग बहुत तेज है, अभिभावक यह कह सकते हैं कि कई बार गलत खांचे में टुकड़ा रखने के बाद भी उसने धैर्यपूर्वक सही जगह खोज निकाली. इस तरह की प्रतिक्रिया से बच्चे को यह गहरा अहसास होता है कि अंतिम परिणाम से कहीं ज्यादा उस तक पहुंचने की यात्रा और उसकी अपनी कोशिश मूल्यवान थी.
परीक्षा में बेहतरीन अंक हासिल होने पर केवल अंकों के प्रतिशत पर खुशी जताने की जगह बच्चे से यह संवाद किया जा सकता है कि उसने परीक्षा की तैयारी के दौरान अध्ययन का कौन सा अनूठा तरीका अपनाया था. इसी प्रकार यदि बच्चा किसी रेखाचित्र में रंग भरता है, तो केवल सुंदर कहकर बात खत्म करने के बजाय यह भी जोड़ना चाहिए कि उसने रंगों का चुनाव बहुत समझदारी से किया और रेखाओं के भीतर रहकर पूरी लगन से काम पूरा किया. इस तरह की बातें बच्चे का ध्यान परिणाम के साथ-साथ पूरी निर्माण प्रक्रिया पर केंद्रित रखती हैं.
किसी काम में गड़बड़ी या गलती हो जाने पर बच्चे को डांटने या उसकी प्रतिभा पर सवाल उठाने के बजाय सही दिशा में बात करना बेहद जरूरी है. यदि गणित का कोई सवाल गलत हो जाए, तो यह टिप्पणी करने से बचना चाहिए कि उसका गणित में हाथ तंग है. इसकी जगह यह पूछा जा सकता है कि समस्या किस कदम पर आई और क्या कोई दूसरा तरीका अपनाकर इसे फिर से हल किया जा सकता है. ऐसा रुख अपनाने से असफलता बच्चे की पहचान नहीं बनती, बल्कि सीखने का एक स्वाभाविक पड़ाव बन जाती है. विभिन्न शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रोसेस प्रेज बच्चों को कठिनाइयों के बाद भी नए सिरे से जुटने की प्रेरणा देता है.
शब्दों का यह छोटा बदलाव गढ़ेगा बेहतर भविष्य
अभिभावकों को यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि बच्चों की सराहना बंद करने की कोई आवश्यकता नहीं है. हर बच्चे को अपने माता-पिता की तरफ से यह अहसास मिलना बेहद जरूरी है कि उसके संघर्ष और परिश्रम को देखा जा रहा है और उसकी छोटी-बड़ी जीतों का सम्मान किया जा रहा है. जरूरत केवल इस बात की है कि हर मौके पर एक जैसी रूटीन शाबाशी देने के बजाय शब्दों को थोड़ा विशिष्ट और बच्चे के वास्तविक काम से जोड़ा जाए.
तुम बहुत अच्छे हो जैसे ढीले शब्दों की जगह तुमने कभी हिम्मत नहीं हारी या तुमने कठिन पैराग्राफ को बार-बार पढ़कर समझने की बेहतरीन कोशिश की जैसे वाक्य बच्चे को यह सिखाते हैं कि सीखने और जूझने की प्रक्रिया ही असली पूंजी है. परवरिश में शब्दों का यही नन्हा सा सकारात्मक बदलाव बच्चों के सोचने के नजरिए को जीवनभर के लिए सशक्त बना सकता है.



















