दीपावली की जगमगाहट से ठीक एक रात पहले पश्चिम बंगाल के परिवारों में एक अनूठी और गहरी सांस्कृतिक परंपरा निभाई जाती है. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर पड़ने वाले इस पर्व को लोकजीवन में भूत चतुर्दशी के नाम से पहचाना जाता है. पहली नजर में भले ही यह नाम किसी डरावने प्रसंग का अहसास कराए, लेकिन इस दिन के रीति-रिवाज असल में अपने दिवंगत पुरखों के प्रति अगाध आदर, प्रेम और बदलते मौसम में स्वास्थ्य रक्षा से जुड़े हुए हैं.
पुरखों की स्मृतियों और आत्माओं के सत्कार का पर्व
भूत चतुर्दशी का सरोकार किसी खौफ या भूत-प्रेत की आशंका से बिल्कुल नहीं है. बंगाली समाज में सदियों से यह आस्था चली आ रही है कि कार्तिक मास की इस विशेष चतुर्दशी की रात पितरों और पूर्वजों की पवित्र आत्माएं अपने सगे-संबंधियों से मिलने धरती पर लौटती हैं. इस दिन परिवार के लोग अपने उन प्रियजनों को शिद्दत से याद करते हैं जो अब इस संसार में मौजूद नहीं हैं. यही कारण है कि यह पूरा उत्सव पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके स्वागत के लिए बेहद आत्मीय माहौल में मनाया जाता है.
चौदह मिट्टी के दीपकों से रोशन होते हैं घर के कोने
इस पावन तिथि की शाम होते ही घरों में दीपक जलाने की विशेष रस्म शुरू हो जाती है. परंपरा के मुताबिक, घर के भीतर और बाहर कुल 14 मिट्टी के दीये प्रज्वलित किए जाते हैं. इन दीपकों को उन सभी स्थानों पर सावधानी से रखा जाता है जहाँ सामान्य तौर पर अंधेरा पसरा रहता है. घर की मुख्य दहलीज, चौखट, खिड़कियों की मुंडेर, रसोई घर और तुलसी के चबूतरे पर तेल या घी के ये चौदह दीपक सजाए जाते हैं.
इन दीपकों को प्रज्वलित करने के पीछे एक मार्मिक और सुंदर भावना छिपी है. मान्यता के अनुसार, यह रोशनी हमारे पूर्वजों की आत्माओं को अंधकार में भटके बिना सीधे अपने घर तक सुरक्षित पहुँचने का मार्ग दिखाती है. इसके साथ ही यह दृढ़ विश्वास भी जुड़ा है कि चौदह दीपकों की पावन लौ घर-आंगन से हर तरह की नकारात्मक ऊर्जा, अमंगल और बुरी शक्तियों को बाहर निकाल फेंकती है.
चौदह किस्म के साग खाने का पारंपरिक नियम
भूत चतुर्दशी के अनुष्ठान केवल दीपदान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इस दिन का खानपान भी उतना ही अनूठा है. बंगाली घरों में इस दिन 'चोउद्द शाक' यानी चौदह प्रकार के अलग-अलग साग पकाने और ग्रहण करने की अनिवार्य प्रथा है. इस अवसर पर सुबह से ही लोग बाजारों में जाकर या अपने आसपास से 14 तरह की हरी पत्तेदार सब्जियों और साग की पत्तियां चुनकर लाते हैं, जिन्हें दोपहर के भोजन में विशेष विधि से तैयार किया जाता है.
इस खानपान परंपरा का एक बहुत ठोस वैज्ञानिक और मौसमी आधार भी है. कार्तिक महीने में मौसम तेजी से करवट लेता है और दीपावली के आसपास वातावरण में हल्की ठंडक घुलने लगती है. बदलते मौसम के इस दौर में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी को सुदृढ़ बनाए रखना बेहद आवश्यक होता है. आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार, विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों और हरी पत्तेदार पत्तियों का सेवन पाचन क्रिया को संतुलित रखता है, पेट के विकारों को दूर करता है और शरीर को भीतर से नई ऊर्जा व शक्ति प्रदान करता है.
सफाई अभियान और सकारात्मक ऊर्जा का संचार
भूत चतुर्दशी की सुबह की शुरुआत घर की सघन सफाई के साथ होती है. परिवार के सभी सदस्य मिलकर घर के हर कोने, छत, कोठरी और अलमारियों को साफ करते हैं. दीवारों पर लगे जाले हटाए जाते हैं और लंबे समय से पड़े अनुपयोगी व टूटे-फूटे सामान को घर से बाहर निकाल दिया जाता है. लोक मान्यता है कि जिस घर में पूर्ण स्वच्छता और पवित्रता होती है, वहां सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और पूर्वज प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.



















