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आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी के नारे पर उठा 1974 की नसबंदी नीति का सवाल, रोजगार और यूपीआई पर भी घिरीं पार्टियांउत्तर प्रदेश
20 सित॰ 2026, 7:55 am (41 मिनट पहले)· 0

आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी के नारे पर उठा 1974 की नसबंदी नीति का सवाल, रोजगार और यूपीआई पर भी घिरीं पार्टियां

सार्वजनिक चर्चा के दौरान एक नागरिक ने राहुल गांधी के संख्या बल वाले नारे को इंदिरा गांधी की परिवार नियोजन नीति से जोड़कर सवाल उठाया। साथ ही उत्तर प्रदेश शिक्षक भर्ती, किसान कर्जमाफी और यूपीआई शुल्क पर भी तीखी बहस हुई।

सार्वजनिक राजनीतिक बहसों में जब आम लोग सीधे मंच पर आकर सवाल दागते हैं, तो कई स्थापित राजनीतिक नारों की जमीनी हकीकत सामने आ जाती है। एक खुली राजनीतिक चर्चा के दौरान ऐसा ही नजारा दिखा, जहां मंच संचालक प्रतीक त्रीवेदी के सामने एक नागरिक ने कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के प्रवक्ताओं को असहज सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। इस बहस का केंद्र बिंदु राहुल गांधी का वह चर्चित राजनीतिक नारा बना, जिसमें वे बार-बार कहते रहे हैं कि 'जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी'। इस नारे की तार्किकता पर सवाल उठाते हुए नागरिक ने सीधे 1974 के उस दौर की याद दिला दी जब इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में परिवार नियोजन का व्यापक अभियान शुरू किया था।

परिवार नियोजन की नीति बनाम आबादी आधारित हिस्सेदारी का द्वंद्व

नागरिक ने तर्क दिया कि उनके पिता ने 1974 में इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा की गई परिवार नियोजन की सार्वजनिक अपील का पूरी निष्ठा से पालन किया था। उस समय सरकार का स्पष्ट संदेश 'दो बच्चे ही अच्छे' का था, जिसे मानकर अनगिनत परिवारों ने अपने परिवार का आकार सीमित रखा। अब जब देश की राजनीति में संख्या बल के अनुपात में हक और हिस्सेदारी तय करने की मांग उठाई जा रही है, तो सवाल यह पैदा होता है कि जिन नागरिकों ने राष्ट्रहित में सरकारी नीति का पालन करते हुए कम बच्चे पैदा किए, उनके अधिकारों का क्या होगा। नागरिक का कहना था कि यदि भविष्य में संसाधनों और अधिकारों का बंटवारा केवल जनसंख्या की गिनती पर तय होना है, तो जागरूक और नियमों का पालन करने वाले परिवार खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे।

संसदीय प्रतिनिधित्व और उत्तर बनाम दक्षिण भारत का विवाद

बहस केवल पारिवारिक स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका दायरा राष्ट्रीय राजनीति और चुनावी सीटों के परिसीमन तक फैल गया। नागरिक ने आगाह किया कि यदि जनसंख्या के अनुपात में ही हिस्सेदारी तय की जानी है, तो फिर लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभा सीटों के आवंटन पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इस संदर्भ में उन्होंने उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच जनसंख्या वृद्धि के भारी अंतर का स्पष्ट उल्लेख किया। उनका सीधा तर्क था कि दक्षिण भारत के राज्यों ने दशकों तक परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रमों को कड़ाई से लागू किया है। ऐसे में यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बांटी गईं, तो जनसंख्या नियंत्रित करने वाले राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट जाएगा, जो पूरी तरह से अन्यायपूर्ण होगा।

शिक्षक भर्ती और रोजगार नीति पर सत्ता पक्ष से सीधा सवाल

विपक्षी दल के नारे पर सवाल उठाने के बाद इसी सार्वजनिक मंच पर युवाओं ने सत्ता पक्ष यानी भाजपा के प्रवक्ता को भी नहीं बख्शा। एक युवक ने उत्तर प्रदेश में 69 हजार शिक्षक भर्ती का मामला जोर-शोर से उठाया। युवक ने सत्ताधारी दल से पूछा कि इतने लंबे समय के बाद भी इस शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट क्यों नहीं की जा सकी है। युवक का आरोप था कि राजनीतिक दल चुनावों के नजदीक आते ही लाखों नौकरियों और भर्तियों के लुभावने वादे करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही प्रक्रियाएं कानूनी और प्रशासनिक दांवपेचों में उलझ जाती हैं। उन्होंने सवाल किया कि युवाओं को साल-दर-साल नियमित और पारदर्शी तरीके से रोजगार के अवसर क्यों नहीं उपलब्ध कराए जाते।

किसानों की कर्जमाफी और चुनावी राजनीति का चक्रव्यूह

मंच पर किसानों की बदहाली और कृषि ऋण का मुद्दा भी प्रमुखता से गूंजा। सवाल पूछने वाले व्यक्ति ने राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई जाने वाली कर्जमाफी की परिपाटी की कड़ी आलोचना की। उन्होंने व्यवस्था पर आरोप लगाते हुए कहा कि पहले ऐसी नीतियां बनाई जाती हैं जिनसे किसान लगातार कर्ज के जाल में फंसता चला जाता है। इसके बाद जब चुनाव आते हैं, तो विभिन्न पार्टियां वोट बटोरने के लिए कर्जमाफी की घोषणाएं करने लगती हैं। उन्होंने पूछा कि आखिर देश के अन्नदाता को बार-बार ऐसे संकट और मजबूरी की स्थिति में क्यों धकेला जाता है, जहां उन्हें राजनीतिक दलों की दया और कर्जमाफी के वादों पर निर्भर रहना पड़े।

यूपीआई लेनदेन और एमडीआर शुल्क पर भी तकरार

कार्यक्रम के अंत में एक छात्र ने डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय नीतियों से जुड़ा एक अत्यंत व्यावहारिक सवाल उठाया। छात्र ने सीधे तौर पर यूपीआई यानी एकीकृत भुगतान इंटरफेस और व्यापारियों से वसूले जाने वाले एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट के मुद्दे को उठाया। छात्र का कहना था कि जब सरकारें विभिन्न कल्याणकारी और मुफ्त योजनाओं पर भारी भरकम सरकारी खजाना खर्च कर सकती हैं, तो फिर आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों के लिए डिजिटल भुगतान प्रणाली पर शुल्क लगाने की बात क्यों की जाती है। इस बहस में डिजिटल लेनदेन की मुफ्त उपलब्धता और उस पर लगने वाले संभावित शुल्कों को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।

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सवाल-जवाब

सार्वजनिक बहस में राहुल गांधी के किस नारे पर सवाल उठाया गया?
नागरिक ने राहुल गांधी के 'जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी' वाले नारे पर सवाल उठाया।
नागरिक ने 1974 की किस नीति का संदर्भ दिया?
उन्होंने 1974 में इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा शुरू किए गए 'दो बच्चे ही अच्छे' परिवार नियोजन अभियान का हवाला दिया।
जनसंख्या और संसदीय सीटों को लेकर क्या आपत्ति दर्ज की गई?
तर्क दिया गया कि जनसंख्या नियंत्रण अपनाने वाले राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व कम नहीं होना चाहिए।
युवक ने उत्तर प्रदेश की किस भर्ती प्रक्रिया पर सवाल पूछा?
युवक ने उत्तर प्रदेश की 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में देरी और स्थिति स्पष्ट न होने पर सवाल किया।
डिजिटल भुगतान को लेकर छात्र ने क्या मुद्दा उठाया?
छात्र ने पूछा कि जब सरकार मुफ्त योजनाएं चला सकती है तो यूपीआई और एमडीआर पर शुल्क की बात क्यों की जाती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·12 मिनट पहले

यह वैचारिक टकराव उत्तर भारत की राजनीति में एक नए ध्रुवीकरण की शुरुआत है। यदि 'संख्या बल' ही अधिकार का पैमाना बनेगा, तो 1970 के दशक से परिवार नियोजन के राष्ट्रीय आह्वान का पालन करने वाले जागरूक नागरिक खुद को ठगा हुआ पाएंगे। यही फॉर्मूला आगामी परिसीमन में उत्तर और दक्षिण के राजनीतिक संतुलन को भी हिला सकता है, जिससे क्षेत्रीय असंतोष और बढ़ेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·12 मिनट पहले

यह वैचारिक बहस केवल नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी कानूनी और प्रशासनिक परिणाम होंगे। जब न्याय व्यवस्था और सार्वजनिक नीति में आबादी को मुख्य आधार बनाया जाएगा, तो यह उन संवैधानिक प्रावधानों और प्रशासनिक सिद्धांतों के सामने चुनौती खड़ी कर देगा जो योग्यता, समता और दूरदर्शी राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हैं। आगे चलकर यह मुद्दा अदालती मुकदमों और गंभीर नीतिगत गतिरोध का रूप ले सकता है, जिससे शासन प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा।

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