आगरा को अपनी प्राचीनता और समृद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए जाना जाता है, जहाँ मुग़ल काल की सैकड़ों भव्य इमारतें मौजूद हैं। इन तमाम ऐतिहासिक धरोहरों के बीच, आगरा दिल्ली हाइवे पर अशोपा हॉस्पिटल के पास एक ऐसा अनोखा मकबरा परिसर स्थित है जहाँ एक पिता और पुत्र को एक साथ दफनाया गया है। यह स्थल सादिक खां और उनके बेटे सलाबत खां का मकबरा कहलाता है, और यह आगरा में अपनी तरह का एकमात्र ज्ञात उदाहरण है।
सादिक खां: एक कुलीन की विरासत
इतिहासकारों के अनुसार, सादिक खां जहाँगीर और शाहजहाँ दोनों बादशाहों के समय के एक प्रतिष्ठित कुलीन थे। उनका निधन सन 1633 में हुआ। पिता के सम्मान में उनके बेटे सलाबत खां ने सन 1633 से 1635 के बीच एक भव्य अष्टकोणीय मकबरे का निर्माण करवाया था। यह दो मंजिला संरचना उस दौर की वास्तुकला और एक पुत्र की श्रद्धा का बेजोड़ नमूना है।
सलाबत खां: शाही दरबार में एक दुखद अंत
सलाबत खां की अपनी पहचान और दरबार में अच्छा प्रभाव था। वे बादशाह शाहजहाँ के सगे साले थे और शाही दरबार में 'मीर बख्शी' (शाही कोषाध्यक्ष) जैसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात थे। बादशाह से उनके खास रिश्ते के कारण दरबार में उनका रुतबा काफी प्रभावशाली था। मुग़ल काल के सबसे चर्चित किस्सों में से एक उनके दुखद अंत से जुड़ा है। एक बार खुले दरबार में, सलाबत खां ने वीर अमर सिंह राठौड़ के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। क्रोधित होकर अमर सिंह राठौड़ ने भरी महफिल में अपनी कटार से सलाबत खां को मौके पर ही मौत के घाट उतार दिया था।
सलाबत खां का 'चौंसठ खंबा' मकबरा
सादिक खां के भव्य मकबरे के ठीक बगल में उनके बेटे सलाबत खां का मकबरा स्थित है, जिसे 'चौंसठ खंबा' के नाम से जाना जाता है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह आकर्षक इमारत 64 खंभों पर खड़ी है, जिन पर बेहद खूबसूरत नक्काशी की गई है और मनमोहक छतरियां बनी हुई हैं। यह मकबरा एक खुले मंडप (पवेलियन) के तौर पर बनाया गया है, जो पिता के अधिक बंद अष्टकोणीय मकबरे से एक दिलचस्प वास्तुशिल्प विपरीतता प्रस्तुत करता है।
वास्तुशिल्प विविधता और एक गहरा रहस्य
यह अनोखा मकबरा परिसर, जिसमें पिता सादिक खां का दो मंजिला अष्टकोणीय मकबरा और पुत्र सलाबत खां का 64 स्तंभों वाला खुला मंडप एक साथ मौजूद हैं, मुग़ल वास्तुकला की विविधता को दर्शाता है। इस ऐतिहासिक स्थल से जुड़ा एक रहस्य इसे और भी अनूठा बनाता है। इतिहासकारों का कहना है कि सादिक खां के मकबरे के तहखाने में कोई वास्तविक कब्र या उसके अवशेष नहीं हैं। इसके बजाय, मकबरे के बाहर एक कब्र पड़ी हुई है जिस पर उर्दू भाषा में कुछ लिखा हुआ है। इतिहास की किताबों में इस रहस्य को लेकर कोई स्पष्ट जिक्र नहीं मिलता है, जो इसे आज भी एक अनसुलझी पहेली बनाए हुए है।
भूली हुई सुंदरता और संरक्षण की पुकार
इस मकबरे की छतरियों की छतों पर मुग़ल काल की अच्छी तरह से संरक्षित फ्रेशो पेंटिंग आज भी देखी जा सकती हैं, जो उस समय की कला और शिल्प कौशल का प्रमाण हैं। इतिहासकार प्रोफेसर राजपाल सिंह इन खूबसूरत इमारतों की वर्तमान स्थिति पर दुःख व्यक्त करते हैं, उनका कहना है कि यह "पर्यटकों का इंतजार करती है।" उनके अनुसार, इसके चारों ओर हुए अवैध अतिक्रमण के कारण यह मुख्य सड़क से पूरी तरह ढक गई है और बाहर से इसे देख पाना अब लगभग असंभव है। ऐतिहासिक महत्व और बेहतरीन वास्तुकला के बावजूद, प्रोफेसर सिंह बताते हैं कि यह मकबरा ताजमहल या अकबर के मकबरे की तरह पर्यटकों के बीच लोकप्रिय नहीं है और एक तरह से गुमनामी की जिंदगी जी रहा है। वे इसके प्रचार-प्रसार और संरक्षण की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हैं ताकि यह अनमोल विरासत भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे।













