चार दशक पहले हुई एक डकैती का मुकदमा आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंचा, लेकिन फैसले ने पूरी कहानी ही पलट दी. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर जिले के एक गांव में साल 1984 में हुई सशस्त्र डकैती के मामले में दो आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा को तो बरकरार रखा, मगर उन्हें जेल भेजने के बजाय प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दे दिया. अदालत ने इसके पीछे तीन बड़ी वजहें गिनाईं, दोनों की बढ़ती उम्र, उनके खिलाफ कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड न होना और अपील का फैसला आने में लगे पूरे 39 साल. साथ ही पीड़ितों को 75 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया गया.
न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने 23 जून को यह आदेश सुनाया. अदालत ने कहा कि यह आपराधिक अपील साल 1986 से लंबित पड़ी थी और आरोपी पिछले चार दशकों से इसी अधर में अपनी जिंदगी काट रहे थे. इस समय दोनों आरोपियों की उम्र 60 साल से ऊपर है और इन सालों में उनके खिलाफ कोई दूसरा आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ. पीठ ने माना कि धुन्ना और शिवभूषण प्रथम अपराधी हैं, आदतन अपराधी नहीं, इसलिए उन्हें सुधरने का एक मौका मिलना चाहिए.
आधी रात गांव में क्या हुआ था
अभियोजन के मुताबिक, यह वारदात 23 और 24 दिसंबर 1984 की दरमियानी रात की है. फतेहपुर के हुसैनगंज थाना क्षेत्र के काजी का पुरवा गांव में चित्तन नाम का एक शख्स अपने घर के बाहर चौपाल पर सो रहा था, जबकि उसके परिवार के बाकी लोग घर के भीतर थे. रात करीब 12 बजे चार बदमाश वहां आ धमके. इनमें से तीन ने चित्तन को पीटना शुरू कर दिया और उस पर घर का दरवाजा खुलवाने का दबाव बनाने लगे. वहीं चौथा आरोपी बंदूक थामे घर की छत पर चढ़ गया.
जब दरवाजा नहीं खुला तो बदमाशों ने उसे तोड़ने की कोशिश की. इसी हड़बड़ी में चित्तन की पत्नी और बेटी ने जोर-जोर से शोर मचाया और आखिरकार दरवाजा खोल दिया. आरोप है कि इसके बाद बदमाश घर में घुस गए और दोनों महिलाओं के साथ भी मारपीट की.
गांववालों ने मौके पर पकड़े तीन बदमाश
घर के अंदर और बाहर मची चीख-पुकार सुनकर गांववाले सतर्क हो गए. लोग लाठियां और टॉर्च लेकर मौके की तरफ दौड़ पड़े. भीड़ को आता देख बदमाश भागने लगे. उनके पास बंदूक, तमंचा, कुल्हाड़ी और टॉर्च मौजूद थीं और डकैती के बाद वे फरार होने की फिराक में थे. लेकिन ग्रामीणों ने तीन आरोपियों को वहीं दबोच लिया. पकड़े गए इन लोगों ने अपने नाम धुन्ना, मइयादीन और शिवभूषण बताए, जबकि इनका एक साथी बंदूक लेकर भागने में कामयाब रहा. इस पूरी घटना में कई ग्रामीण भी घायल हुए थे.
ट्रायल कोर्ट से मिली थी 7 साल की सजा
निचली अदालत में मुकदमा चला और 18 सितंबर 1986 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फतेहपुर ने तीनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 394 और 397 के तहत दोषी ठहराते हुए 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई. इसके अलावा शिवभूषण को शस्त्र अधिनियम की धारा 25 के तहत एक साल की अतिरिक्त सजा भी दी गई. इसी सजा के खिलाफ अपील हाईकोर्ट में दायर हुई, लेकिन यह अपील जब लंबित ही थी, तभी आरोपी मइयादीन की मौत हो गई.
हाईकोर्ट में आरोपियों की दलील
हाईकोर्ट में आरोपियों के अधिवक्ताओं ने कहा कि उनके मुवक्किलों को झूठा फंसाया गया है और उन्होंने कोई डकैती नहीं की. वकीलों ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने की दलील भी दी. उनका यह भी कहना था कि दोनों आरोपी अब वरिष्ठ नागरिक हो चुके हैं और 1986 से अपील लटके रहने की वजह से उन्हें प्रोबेशन का लाभ मिलना चाहिए.
हालांकि अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए साफ कहा कि एफआईआर में पूरी तरह दर्ज है कि चार बदमाश डकैती के इरादे से ही पहुंचे थे और उन्होंने शिकायतकर्ता समेत दूसरे लोगों को चोटें पहुंचाईं. अदालत ने अपने फैसले में कई अहम बातों पर मुहर लगाई:
- एफआईआर और तहरीर में डकैती और मारपीट की पूरी घटना साफ-साफ दर्ज है.
- हथियारों और सामान की बरामदगी अभियोजन ने साबित कर दी.
- घटना में आरोपियों की भूमिका और उनकी मौजूदगी सिद्ध हुई.
- सभी आरोपी एक साझा मंशा (कॉमन इंटेंशन) के साथ डकैती को अंजाम दे रहे थे.
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा.
फिर भी जेल क्यों नहीं
दोषसिद्धि बनाए रखने के बावजूद अदालत ने माना कि आरोपी प्रथम अपराधी हैं और उनके खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. दोनों की उम्र अब 60 साल पार कर चुकी है और अपील का फैसला आने में करीब 39 साल लग गए. इन्हीं खास हालातों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें जेल भेजने के बजाय प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया और पीड़ित पक्ष को 75 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया.













