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गर्मी में सूखता चारा बन रहा पशुओं का काल, ज्वार-बाजरे में पनप रहा जानलेवा 'साइनोसाइड' — बचाव का तरीका जान लेंउत्तर प्रदेश
13 जून 2026, 2:30 pm (45 दिन पहले)· 0

गर्मी में सूखता चारा बन रहा पशुओं का काल, ज्वार-बाजरे में पनप रहा जानलेवा 'साइनोसाइड' — बचाव का तरीका जान लें

तेज गर्मी और पानी की कमी से ज्वार-बाजरे की मुरझाई पत्तियों में 'साइनोसाइड' नाम का विषैला तत्व बन जाता है, जो दुधारू पशुओं की जान ले सकता है। कृषि विशेषज्ञ बता रहे हैं कि नियमित सिंचाई और चारे की जांच से यह खतरा कैसे टाला जा सकता है।

गर्मी का मौसम आते ही पशुपालकों के सामने हरे चारे का सवाल खड़ा हो जाता है, और इसी जरूरत को पूरा करने के लिए वे बड़े पैमाने पर ज्वार और बाजरा बोते हैं। लेकिन शाहजहांपुर के खेतों में पनप रहा एक छिपा हुआ खतरा कई पशुओं की जान ले रहा है — और सबसे चिंता की बात यह है कि अधिकतर किसान इसे पहचान ही नहीं पाते।

दरअसल, जब लू और तेज धूप के बीच इन फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो उनकी पत्तियां सिकुड़ने और पौधे सूखने लगते हैं। ज्यादातर पशुपालक इसे महज मौसमी बदलाव मानकर अनदेखा कर देते हैं और यही चूक भारी पड़ जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक ठीक इसी हालत में चारे के भीतर एक हानिकारक रसायन बन जाता है, जिसे खाकर पशु न केवल गंभीर रूप से बीमार पड़ सकते हैं, बल्कि दम भी तोड़ सकते हैं।

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आखिर यह 'धीमा जहर' बनता कैसे है

वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ डॉ. एन.पी. गुप्ता समझाते हैं कि जब तापमान बहुत ज्यादा चढ़ जाता है और लंबे समय तक बारिश नहीं होती, तो ज्वार और बाजरे के पौधों में पानी की भारी कमी हो जाती है। पानी न मिलने पर पौधे खुद को बचाने के लिए अपनी पत्तियों को सिकोड़ लेते हैं और इसी तनाव की अवस्था में उनकी कोशिकाओं के भीतर रासायनिक असंतुलन पैदा हो जाता है।

इसी असंतुलन का नतीजा होता है 'साइनोसाइड' (Cyanoside) नाम का विषैला तत्व, जिसका स्तर मुरझाए हुए पौधों में खतरनाक हद तक बढ़ जाता है। किसान अक्सर इसे सिर्फ धूप की मार समझते हैं, जबकि असल में यह चारा पशुओं के लिए धीमे जहर में बदल चुका होता है।

पशु के शरीर में जाकर क्या करता है यह तत्व

डॉ. गुप्ता के अनुसार, अगर पशुपालक इस सूखे या सिकुड़े चारे को अपने मवेशियों को खिला देते हैं तो यह सीधे उनके स्वास्थ्य पर वार करता है। पेट में पहुंचकर साइनोसाइड साइनाइड जैसी जहरीली गैस में बदल जाता है, जो पशु के तंत्रिका तंत्र और श्वसन प्रणाली पर हमला बोल देती है।

इसका असर इतना तेज होता है कि पशु को सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगती है, उसके मुंह से झाग आने लगता है और वह छटपटाने लगता है। कई बार तो पशुपालक यह समझ ही नहीं पाते कि कुछ देर पहले तक भला-चंगा दिख रहा उनका पशु अचानक इतनी बुरी हालत में कैसे पहुंच गया, और देखते ही देखते वह दम तोड़ देता है। समय पर इलाज न मिलना इन मौतों की बड़ी वजह बनता है।

सबसे आसान बचाव — समय पर सिंचाई

विशेषज्ञ बताते हैं कि इस खतरे से निपटने का सबसे सरल और कारगर उपाय खेतों को समय पर पानी देना है। गर्मियों में फसल को बहुत लंबे समय तक सूखा छोड़ना सही नहीं है। ज्वार और बाजरे की फसल में हर 7 से 10 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई जरूर करते रहना चाहिए।

नियमित पानी मिलने से पौधों में नमी बनी रहती है, जिससे साइनोसाइड बन ही नहीं पाता और चारा पशुओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित रहता है।

चारा काटने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

पशुपालकों को सलाह है कि खेत से चारा काटते वक्त पौधों को बारीकी से देख लें। अगर किसी हिस्से में पत्तियां मुड़ी हुई, पीली या सूखी नजर आएं, तो उस चारे को पशुओं के सामने डालने से बचें। बेहतर यही है कि पहले खेत में अच्छी तरह पानी लगाएं और जब पौधे दोबारा हरे-भरे और सामान्य दिखने लगें, तभी उनकी कटाई करें।

थोड़ी-सी जागरूकता और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर किसान न सिर्फ अपने पशुओं को इस गंभीर खतरे से बचा सकते हैं, बल्कि दूध उत्पादन पर पड़ने वाले असर को भी रोक सकते हैं।

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