उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में दलहन की खेती करने वाले काश्तकारों के सामने इस बार गंभीर संकट खड़ा हो गया है। बड़ा गांव ब्लॉक क्षेत्र के किसानों ने सरकारी कृषि गोदाम से मिले उर्द के बीज की विश्वसनीयता और गुणवत्ता को लेकर खुला मोर्चा खोल दिया है। किसानों का सीधा आरोप है कि जिस बीज को बेहतर पैदावार का भरोसा देकर उन्हें सौंपा गया था, उसने खेतों में निराशा के अलावा कुछ नहीं दिया। फसल जब पककर तैयार होने की स्थिति में पहुंची, तो पौधों में फलियां न के बराबर निकलीं। अपनी गाढ़ी कमाई और महीनों का पसीना बहाने वाले इन किसानों को अब भारी आर्थिक तबाही का डर सता रहा है।
दावे 70 से 80 फलियों के, खेतों में दिखीं सिर्फ दो से पांच
पीड़ित काश्तकारों के अनुसार, उन्होंने बड़ा गांव ब्लॉक स्थित गोदाम से लगभग ढाई क्विंटल उर्द का बीज खरीदा था। खरीद के दौरान कृषि केंद्र पर मौजूद कर्मचारियों और प्रचारकों ने यह भरोसा दिलाया था कि यह उन्नत किस्म का बीज है और इससे बंपर पैदावार हासिल होगी। किसानों को बताया गया था कि प्रत्येक पौधे में औसतन 70 से 80 फलियां निकलेंगी। इसी भरोसे के दम पर किसानों ने अपने खेतों की जुताई कराई, खाद-पानी का इंतजाम किया और पूरे मनोयोग से बुवाई पूरी की।
महीनों की कड़ी मेहनत के बाद जब पौधों में फलियां आने का समय आया, तो हकीकत दावों के बिल्कुल उलट निकली। खेतों में खड़े पौधों में 70 से 80 फलियों की जगह किसी पौधे पर दो, किसी पर चार तो कहीं बमुश्किल पांच फलियां ही दिखाई दे रही हैं। अधिकांश पौधे बिना फलियों के सिर्फ पत्तों के सहारे खड़े हैं। इतनी कम फलियां आने से समूचे क्षेत्र में फसल की उपज बुरी तरह प्रभावित हो गई है, जिससे किसानों की लागत भी निकलना नामुमकिन लग रहा है।
लागत और मेहनत डूबने से आर्थिक तबाही के कगार पर काश्तकार
कृषि कार्य में किसी भी किसान की सफलता सिर्फ मौसम या सिंचाई पर नहीं, बल्कि बीज की मूल गुणवत्ता पर सबसे ज्यादा टिकी होती है। बीज के चयन से लेकर खेत तैयार करने, समय पर बुवाई करने, कीटनाशकों के छिड़काव और दिन-रात रखवाली में किसानों का भारी पूंजीगत खर्च और श्रम लगता है। इस पूरी प्रक्रिया में समय के साथ-साथ परिवार का संचित धन भी खप जाता है।
जब सारी कोशिशों के बावजूद फसल में फलियां ही न आएं, तो किसान के सामने सीधा आर्थिक संकट आ खड़ा होता है। बड़ा गांव के किसानों का कहना है कि उन्होंने कर्ज और अपनी जमा पूंजी लगाकर इस उम्मीद से उर्द बोई थी कि अच्छी फसल से मुनाफा होगा और परिवार की जरूरतें पूरी होंगी। मगर अब हालत यह है कि बीज खरीदने और खेत की तैयारी में लगाई गई लागत की भरपाई होना भी संभव नहीं दिख रहा है।
दोषी कौन? बीज की प्रयोगशाला जांच कराने की तेज हुई मांग
फसल की यह बदहाली देखने के बाद इलाके के किसानों ने वितरण तंत्र के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। किसानों ने मांग की है कि बड़ा गांव ब्लॉक गोदाम से बांटे गए उर्द के बीज के बैच की तुरंत आधिकारिक और निष्पक्ष जांच कराई जाए। हालांकि कृषि विज्ञान के जानकारों का यह भी मानना है कि केवल फलियां कम आने के आधार पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता, इसके लिए बीज के प्रमाणीकरण के साथ-साथ मौसम और खेत की परिस्थितियों का समग्र तकनीकी आकलन जरूरी होता है।
फिलहाल इस पूरे प्रकरण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं, जिनका समाधान किसान तलाश रहे हैं
- गोदाम में वितरण से पहले संबंधित उर्द बीज की अंकुरण क्षमता और आनुवंशिक शुद्धता की जांच किन मानकों पर की गई थी?
- किसानों को प्रति पौधा 70 से 80 फलियां निकलने का तकनीकी दावा किस प्रामाणिक परीक्षण के आधार पर किया गया था?
- यदि मौसम और देखरेख सामान्य रही, तो पौधों में फलियां न बनने अथवा दो से पांच फलियों तक सिमट जाने का मुख्य तकनीकी कारण क्या है?
प्रशासनिक जवाबदेही और मुआवजे की प्रतीक्षा
किसानों के इस गंभीर आरोप पर कृषि विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों का आधिकारिक रुख सामने आना बेहद जरूरी हो गया है। जब तक गोदाम से वितरित बीज के नमूनों की प्रयोगशाला जांच नहीं होती और संबंधित अधिकारी अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपते, तब तक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकेगी। किसान अब यह जानना चाहते हैं कि इस विफलता का वास्तविक कारण क्या रहा, ताकि उनकी मेहनत, समय और लागत की बर्बादी के लिए जवाबदेही तय की जा सके।























