अश्विन मास में देवी शक्ति की आराधना का विशेष उत्सव 11 अक्टूबर से आरंभ हो चुका है, जिसका समापन 19 अक्टूबर को होगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस आध्यात्मिक अनुष्ठान में श्रद्धालु पूरे नियम और निष्ठा के साथ उपवास रखते हैं तथा देवी दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हैं। देश भर में पूजा पंडालों, तीर्थ स्थलों और घरों में सुबह से देर रात तक आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है, जहां पारंपरिक भक्ति गीतों के जरिए देवी की महिमा का गुणगान किया जा रहा है।
पारंपरिक गीतों से भक्तिमय हुआ माहौल
इस पावन अवधि के दौरान घरों और सामूहिक स्थलों पर भजन कीर्तन का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु सुबह की पूजा और संध्या आरती के समय भक्ति रचनाओं को सुनकर अथवा गाकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। ऐसे अवसरों पर लखबीर सिंह लक्खा और अन्य प्रसिद्ध गायकों द्वारा गाए गए देवी गीत अत्यंत लोकप्रिय रहते हैं। इन भजनों में मां के अलौकिक दरबार, ऊंचे पर्वतों पर स्थित उनके भवन और भक्तों की अटूट आस्था का भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
इन गीतों में मैया के दरबार की भव्यता, उनके चरणों से बहती पावन धारा और लाल चुनरी व पुष्प मालाओं से सजे दिव्य रूप की स्तुति की जाती है। श्रद्धालु मानते हैं कि सच्चे मन और निष्कपट भाव से शीश नवाने वालों पर देवी की असीम कृपा बरसती है और वे अपने भक्तों की सूनी झोलियां खुशियों से भर देती हैं। इस कारण सामूहिक कीर्तनों में इन पारंपरिक रचनाओं का गायन निरंतर चलता रहता है।
नवदुर्गा के पावन स्वरूपों का स्मरण
नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां भगवती के अलग-अलग रूपों की पूजा का विधान है। उपासना के क्रम में प्रथम दिन नंदी बैल की सवारी करने वाली मां शैलपुत्री का ध्यान किया जाता है, जो दृढ़ता और साधना का प्रतीक मानी जाती हैं। इसके पश्चात सृष्टि की रचना करने वाली मां कूष्मांडा की अद्भुत लीलाओं और उनके तेज का स्मरण किया जाता है, जिन्हें ब्रह्मांड की आदि शक्ति कहा गया है।
साधना के अंतिम चरणों में मां कालरात्रि के रौद्र और विनाशक रूप का स्मरण होता है, जो महाप्रलय लाने वाली शक्ति के रूप में जानी जाती हैं और दुष्टों का संहार कर भक्तों को अभय प्रदान करती हैं। श्रद्धालु पूरे नौ दिन उपवास, मंत्र जप और कन्या पूजन की परंपराओं का निर्वाह करते हुए सुख, समृद्धि और आत्मिक शांति की कामना करते हैं।
























