राजस्थान के सीकर जिले में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल खाटूश्याम जी जाने की तैयारी कर रहे श्रद्धालुओं के लिए मंदिर प्रशासन की ओर से एक महत्वपूर्ण सूचना सामने आई है। यदि आप आने वाले दिनों में बाबा श्याम के दरबार में हाजिरी लगाने का कार्यक्रम बना रहे हैं, तो यात्रा शुरू करने से पहले मंदिर के खुलने और बंद होने के नए समय की जानकारी अवश्य जुटा लें। मंदिर में आयोजित होने वाली पारंपरिक धार्मिक विधियों के चलते दर्शन व्यवस्था में अस्थायी बदलाव किया गया है, जिसके तहत भक्तों के लिए मुख्य कपाट करीब 19 घंटे तक बंद रखे जाएंगे।
विशेष तिलक श्रृंगार और पूजा विधान के कारण लिया गया निर्णय
श्री श्याम मंदिर कमेटी की ओर से साझा किए गए आधिकारिक विवरण के मुताबिक, तय परंपराओं के तहत विग्रह का विशेष तिलक श्रृंगार किया जाना है। इस पूरी धार्मिक प्रक्रिया को संपन्न करने में काफी समय लगता है और इसे बेहद गोपनीय तथा पारंपरिक विधि-विधान से पूरा किया जाता है। अनुष्ठान के दौरान गर्भगृह में विराजमान बाबा श्याम के शीश पर सुगंधित चंदन का लेप लगाया जाता है और पुरोहित वैदिक मंत्रोच्चार के साथ आराधना संपन्न करते हैं। इस विशिष्ट पूजा प्रक्रिया के दौरान केवल अधिकृत पुजारी और मंदिर के प्रमुख सेवादार ही अंदर मौजूद रहते हैं, आम दर्शनार्थियों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित रहता है।
कपाट बंद होने और पुनः खुलने की समय सारिणी
मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेंद्र सिंह चौहान ने समय सारिणी का ब्योरा देते हुए स्पष्ट किया कि 13 अक्टूबर की रात 10 बजे शयन आरती संपन्न होते ही मुख्य कपाट बंद कर दिए जाएंगे। इसके बाद 14 अक्टूबर को दिनभर मंदिर परिसर में बाहरी भक्तों का प्रवेश प्रतिबंधित रहेगा और अंदर श्रृंगार से जुड़े समस्त कार्य पूरे किए जाएंगे। तिलक श्रृंगार की संपूर्ण प्रक्रिया संपन्न हो जाने के बाद 14 अक्टूबर को शाम 5.00 बजे कपाट एक बार फिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। प्रशासन ने दर्शनार्थियों से आग्रह किया है कि वे इस तय समय का ध्यान रखते हुए ही अपनी यात्रा तय करें ताकि मंदिर पहुंचकर किसी भी प्रकार की असुविधा या निराशा का सामना न करना पड़े।
बर्बरीक के शीश दान और श्याम नाम मिलने की पौराणिक पृष्ठभूमि
आस्था के केंद्र बने बाबा श्याम को श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा से हारे का सहारा पुकारते हैं और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। महाभारत काल की कथा के अनुसार, महाबली भीम के पौत्र बर्बरीक जब युद्ध में शामिल होने पहुंचे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धारण करके उनसे शीश का दान मांग लिया था। बर्बरीक ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना शीश समर्पित कर दिया। उनके इस अप्रतिम त्याग और भक्ति भाव से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में उनका पूजन श्याम नाम से होगा और वे निराश व हारे हुए लोगों को संबल प्रदान करेंगे। इसी वरदान के बाद से वे घर-घर में पूजनीय बने हुए हैं।




















