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वयस्क बेटी को जबरन साथ रखने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण का इस्तेमाल नहीं कर सकते माता-पिता: इलाहाबाद उच्च न्यायालयउत्तर प्रदेश
6 अक्तू॰ 2026, 10:48 am (58 मिनट पहले)· 0

वयस्क बेटी को जबरन साथ रखने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण का इस्तेमाल नहीं कर सकते माता-पिता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मऊ की एक मां द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बालिग संतान को अपनी मर्जी से जीने की पूरी आजादी है।

संविधान द्वारा प्रत्येक वयस्क नागरिक को दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को रेखांकित करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी मर्जी के खिलाफ अपने साथ रखने के लिए अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका का सहारा नहीं ले सकते। न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने मऊ निवासी कलावती देवी की याचिका पर 28 सितंबर को सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि जब कोई व्यक्ति कानूनी रूप से वयस्क हो जाता है, तो उसे अपनी पसंद के स्थान पर रहने और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का पूरा संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।

मऊ की मां ने लगाई थी बेटी को पेश करने की गुहार

इस कानूनी विवाद की शुरुआत तब हुई जब मऊ जिले की निवासी कलावती ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि उनकी 25 साल की बेटी, कुमारी पूजा, लापता है या अनुचित स्थिति में है, इसलिए उसे अदालत के समक्ष हाजिर कराया जाए। याचिका पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने 17 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासन को निर्देश जारी किया था कि उक्त युवती को तलाश कर अदालत के सामने प्रस्तुत किया जाए। न्यायिक आदेश के अनुपालन में पुलिस प्रशासन ने युवती को खोज निकाला और तय तिथि पर उच्च न्यायालय के समक्ष पेश किया।

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अदालत कक्ष में युवती ने बयां की अपनी आपबीती

जब न्यायमूर्ति संदीप जैन के समक्ष 25 वर्षीय पूजा को प्रस्तुत किया गया, तो पीठ ने उससे सीधे संवाद कर स्थिति समझने की कोशिश की। युवती ने अदालत को दो टूक शब्दों में बताया कि वह किसी भी गैरकानूनी हिरासत में नहीं है, बल्कि अपनी मर्जी से दिल्ली में स्वतंत्र जीवन जी रही है। उसने अपनी मां के साथ वापस लौटने से साफ इनकार कर दिया। युवती ने अदालत को बताया कि घर में उसकी मां का बर्ताव उसके प्रति बिल्कुल भी स्नेहपूर्ण या सामान्य नहीं था। उसने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि पारिवारिक घर में रहने के दौरान उसकी मां अक्सर उसके साथ गाली-गलौज करती थीं और कई बार मारपीट भी की जाती थी। ऐसे कटु अनुभवों के चलते उसने स्वयं अपनी इच्छा से घर छोड़ा और वह किसी भी कीमत पर अपनी मां के साथ नहीं रहना चाहती।

मां का इनकार और अदालत का कड़ा रुख

युवती द्वारा लगाए गए मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोपों पर मां कलावती ने असहमति जताई। उन्होंने पीठ के समक्ष दलील दी कि आरोप बेबुनियाद हैं और बेटी का अपने माता-पिता के संरक्षण में रहना ही उसके हित में है। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह पाया कि मुख्य तथ्य यह है कि पूजा 25 वर्ष की पूर्ण वयस्क नागरिक है और उसने अपने माता-पिता के साथ रहने के प्रति स्पष्ट अनिच्छा व्यक्त की है। पीठ ने रेखांकित किया कि किसी भी वयस्क व्यक्ति के निजी जीवन से जुड़े फैसलों और उसकी स्वायत्तता का कानून की नजर में पूरा सम्मान होना चाहिए। माता-पिता होने का अर्थ यह नहीं है कि वे वयस्क संतान की स्पष्ट मर्जी के विरुद्ध जाकर उसे अपने साथ रहने के लिए विवश कर सकें। इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने 28 सितंबर को याचिका निरस्त कर दी।

वयस्क नागरिकों के निजी अधिकारों पर पहले के फैसले

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इससे पहले भी बालिगों के व्यक्तिगत अधिकारों और जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता पर इसी तरह के कड़े विचार व्यक्त किए हैं। इससे पूर्व एक अन्य मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने 18 वर्ष की एक युवती को उसके पति के साथ रहने की इजाजत दी थी। उस प्रकरण में भी माता-पिता के विरोध को दरकिनार करते हुए अदालत ने साफ कहा था कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार है और ऐसे मामलों में माता-पिता की पसंद या मर्जी वयस्क संतान पर जबरन हावी नहीं की जा सकती। ताजा फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित किया है कि कानूनी वयस्कता हासिल करने के बाद किसी भी व्यक्ति को पारिवारिक दबाव के तहत उसकी इच्छा के विरुद्ध नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

सवाल-जवाब

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर क्या फैसला सुनाया?
अदालत ने मऊ की एक महिला की याचिका खारिज करते हुए कहा कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को मर्जी के खिलाफ साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।
यह आदेश किस न्यायाधीश की पीठ ने और कब दिया?
यह फैसला न्यायमूर्ति संदीप जैन ने 28 सितंबर को कलावती देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।
याचिकाकर्ता की बेटी ने अदालत में क्या बयान दिया?
25 वर्षीय पूजा ने बताया कि वह अपनी मर्जी से दिल्ली में रह रही है और उसकी मां घर पर उसके साथ मारपीट व गाली-गलौज करती थीं।
क्या माता-पिता बालिग संतान को अपने साथ रखने के लिए कानूनी दबाव बना सकते हैं?
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी बालिग को केवल माता-पिता होने के आधार पर उसकी मर्जी के विरुद्ध साथ रहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 मिनट पहले

कानून अपनी जगह साफ है कि बालिग होने के बाद हर किसी को अपनी जिंदगी जीने की आज़ादी है। मां-बाप का गुस्सा अपनी जगह, पर जबरदस्ती किसी को नहीं रोका जा सकता।

Ravikash Gupta@ravikash·6 मिनट पहले

अर्जुन जी, दिल्ली में रहने वाली 25 साल की पूजा का अपनी मां के खिलाफ मारपीट का यह आरोप वाकई हैरान करने वाला है।

Rohan Verma@rohan-verma·26 मिनट पहले

अदालत का फैसला तो सही है, पर क्या पुलिस को बालिग लड़की मिलने के बाद भी मां-बाप को परेशान करने की छूट नहीं मिलनी चाहिए?

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 मिनट पहले

रोहन भाई, पुलिस ने तो बस कोर्ट का आदेश माना था, पूजा ने खुद कोर्ट में मां पर मारपीट के आरोप लगाए हैं।

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