संविधान द्वारा प्रत्येक वयस्क नागरिक को दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को रेखांकित करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी मर्जी के खिलाफ अपने साथ रखने के लिए अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका का सहारा नहीं ले सकते। न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने मऊ निवासी कलावती देवी की याचिका पर 28 सितंबर को सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि जब कोई व्यक्ति कानूनी रूप से वयस्क हो जाता है, तो उसे अपनी पसंद के स्थान पर रहने और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का पूरा संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
मऊ की मां ने लगाई थी बेटी को पेश करने की गुहार
इस कानूनी विवाद की शुरुआत तब हुई जब मऊ जिले की निवासी कलावती ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि उनकी 25 साल की बेटी, कुमारी पूजा, लापता है या अनुचित स्थिति में है, इसलिए उसे अदालत के समक्ष हाजिर कराया जाए। याचिका पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने 17 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासन को निर्देश जारी किया था कि उक्त युवती को तलाश कर अदालत के सामने प्रस्तुत किया जाए। न्यायिक आदेश के अनुपालन में पुलिस प्रशासन ने युवती को खोज निकाला और तय तिथि पर उच्च न्यायालय के समक्ष पेश किया।
अदालत कक्ष में युवती ने बयां की अपनी आपबीती
जब न्यायमूर्ति संदीप जैन के समक्ष 25 वर्षीय पूजा को प्रस्तुत किया गया, तो पीठ ने उससे सीधे संवाद कर स्थिति समझने की कोशिश की। युवती ने अदालत को दो टूक शब्दों में बताया कि वह किसी भी गैरकानूनी हिरासत में नहीं है, बल्कि अपनी मर्जी से दिल्ली में स्वतंत्र जीवन जी रही है। उसने अपनी मां के साथ वापस लौटने से साफ इनकार कर दिया। युवती ने अदालत को बताया कि घर में उसकी मां का बर्ताव उसके प्रति बिल्कुल भी स्नेहपूर्ण या सामान्य नहीं था। उसने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि पारिवारिक घर में रहने के दौरान उसकी मां अक्सर उसके साथ गाली-गलौज करती थीं और कई बार मारपीट भी की जाती थी। ऐसे कटु अनुभवों के चलते उसने स्वयं अपनी इच्छा से घर छोड़ा और वह किसी भी कीमत पर अपनी मां के साथ नहीं रहना चाहती।
मां का इनकार और अदालत का कड़ा रुख
युवती द्वारा लगाए गए मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोपों पर मां कलावती ने असहमति जताई। उन्होंने पीठ के समक्ष दलील दी कि आरोप बेबुनियाद हैं और बेटी का अपने माता-पिता के संरक्षण में रहना ही उसके हित में है। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह पाया कि मुख्य तथ्य यह है कि पूजा 25 वर्ष की पूर्ण वयस्क नागरिक है और उसने अपने माता-पिता के साथ रहने के प्रति स्पष्ट अनिच्छा व्यक्त की है। पीठ ने रेखांकित किया कि किसी भी वयस्क व्यक्ति के निजी जीवन से जुड़े फैसलों और उसकी स्वायत्तता का कानून की नजर में पूरा सम्मान होना चाहिए। माता-पिता होने का अर्थ यह नहीं है कि वे वयस्क संतान की स्पष्ट मर्जी के विरुद्ध जाकर उसे अपने साथ रहने के लिए विवश कर सकें। इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने 28 सितंबर को याचिका निरस्त कर दी।
वयस्क नागरिकों के निजी अधिकारों पर पहले के फैसले
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इससे पहले भी बालिगों के व्यक्तिगत अधिकारों और जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता पर इसी तरह के कड़े विचार व्यक्त किए हैं। इससे पूर्व एक अन्य मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने 18 वर्ष की एक युवती को उसके पति के साथ रहने की इजाजत दी थी। उस प्रकरण में भी माता-पिता के विरोध को दरकिनार करते हुए अदालत ने साफ कहा था कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार है और ऐसे मामलों में माता-पिता की पसंद या मर्जी वयस्क संतान पर जबरन हावी नहीं की जा सकती। ताजा फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित किया है कि कानूनी वयस्कता हासिल करने के बाद किसी भी व्यक्ति को पारिवारिक दबाव के तहत उसकी इच्छा के विरुद्ध नियंत्रित नहीं किया जा सकता।























