पितृ पक्ष के पावन दिनों में हरिद्वार की गंगा नगरी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने वाले श्रद्धालुओं से भर जाती है। देश के कोने-कोने से लोग अपने पुरखों की आत्मा की शांति, मोक्ष और सद्गति की कामना लेकर गंगा तट पर एकत्र होते हैं। गंगा के पवित्र जल में तर्पण और पिंडदान करने की यह परंपरा सदियों से अनवरत चली आ रही है। वैसे तो हरिद्वार के सभी गंगा तट पूजनीय हैं, लेकिन हर की पौड़ी के पास स्थित कुशावर्त घाट को पितृ कार्यों के लिए विशेष दर्जा प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस प्राचीन तट पर किया गया पिंडदान, तर्पण और पितृ हवन सीधे पूर्वजों को तृप्ति प्रदान करता है।
कुशा के घने जंगलों से मिला यह पावन नाम
कुशावर्त घाट के नामकरण और इसके अतीत की जड़ें अत्यंत प्राचीन काल से जुड़ी हुई हैं। तीर्थ पुरोहित प्रदीप झा बताते हैं कि प्राचीन समय में इस विशेष स्थान पर पवित्र कुशा घास के घने झुरमुट उगे रहते थे। सनातन परंपरा में कुशा को देव पूजन और पितृ तर्पण दोनों ही धार्मिक अनुष्ठानों में सबसे अनिवार्य और पवित्र सामग्री माना गया है। कुशा की इसी प्रचुरता के कारण इस तीर्थ स्थल का नाम कुशावर्त पड़ा। इस घाट का उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है, जिससे इसकी महत्ता और प्रमाणित होती है।
भगवान राम ने किया था पिता दशरथ का श्राद्ध
इस पावन तट का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक प्रसंग त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने अपने पूज्य पिता राजा दशरथ के परलोक गमन के बाद उनका पिंडदान और तर्पण इसी कुशावर्त घाट पर संपन्न किया था। इसी पावन घटना के स्मरण में पितृ पक्ष के 16 श्राद्धों के दौरान श्रद्धालुओं का विश्वास यहां और गहरा हो जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि जिस भूमि पर स्वयं भगवान राम ने अपने पितरों को तर्पण अर्पित किया था, वहां श्राद्ध करने से उनके पूर्वजों को भी निश्चित रूप से सद्गति प्राप्त होती है।
भगवान दत्तात्रेय की तपोस्थली का गौरव
कुशावर्त घाट केवल पितृ कर्म ही नहीं, बल्कि गहन तपस्या की भूमि भी रहा है। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, यह घाट भगवान दत्तात्रेय की पावन तपस्थली के रूप में भी पूजित है। भगवान दत्तात्रेय ने इसी गंगा तट पर घोर तपस्या की थी, जिससे इस पूरे परिक्षेत्र में दिव्य ऊर्जा का संचार हुआ। मान्यता है कि इस तपोभूमि पर जब कोई व्यक्ति अपने पितरों के निमित्त अनुष्ठान करता है, तो भगवान दत्तात्रेय की साधना के प्रभाव से पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति सुगम हो जाती है।
रानी अहिल्याबाई होल्कर ने संवारा था घाट का स्वरूप
धार्मिक आस्था के साथ-साथ कुशावर्त घाट का एक समृद्ध ऐतिहासिक पहलू भी है। जिस तरह हर की पौड़ी का इतिहास महाराज भर्तृहरि की तपस्या और स्मृति से जुड़ा माना जाता है, ठीक उसी तरह कुशावर्त घाट के ऐतिहासिक जीर्णोद्धार और भव्य सौंदर्यीकरण का श्रेय मालवा की प्रसिद्ध शासक महारानी अहिल्याबाई होल्कर को जाता है। उन्होंने इस प्राचीन घाट का पुनरुद्धार करवाकर श्रद्धालुओं के लिए पूजा-अर्चना और स्नान को सुगम बनाया था। इस ऐतिहासिक योगदान के कारण यह घाट धार्मिक आस्था के साथ एक पुरातात्विक धरोहर के रूप में भी आदरणीय है।
पिंडदान, पितृ हवन और गोसेवा का विधान
पितृ पक्ष के दौरान कुशावर्त घाट पर श्राद्ध कर्म को पूर्ण शास्त्रीय विधि-विधान के साथ संपन्न कराया जाता है। पुरोहितों के मार्गदर्शन में श्रद्धालु सबसे पहले गंगाजल से तर्पण करते हैं, उसके पश्चात जौ, तिल और चावल से बने पिंड अर्पित किए जाते हैं तथा पितृ हवन संपन्न होता है। इस पूरे अनुष्ठान के बाद गाय को हरा चारा खिलाने की विशेष अनिवार्यता बताई गई है। सनातन परंपरा के अनुसार, गोसेवा के बिना पितृ कर्म पूर्ण नहीं माना जाता। पुरोहितों का विश्वास है कि विधिपूर्वक किए गए इन कर्मों से पूर्वज तृप्त होकर अपने कुल और परिवार को सुख, शांति, समृद्धि तथा वंश वृद्धि का वरदान देते हैं।



















