सर्वोच्च न्यायालय में हिंदी को आधिकारिक कामकाजी जुबान बनाने की मांग खारिज, सीजेआई बोले यह बदलाव धीरे-धीरे होगाडीआरडीओ का स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन दुश्मन के रनवे और सैन्य ठिकानों को करेगा तबाहभारत में शुरुआती दौर के एआई स्टार्टअप्स पर लाइटस्पीड का बड़ा दांव, 250 मिलियन डॉलर का नया फंड तैयारअलवर के रामगढ़ में खाद वितरण केंद्र पर उमड़ी भीड़, डीएपी खत्म होने से निराश होकर लौटे अन्नदाताअमेरिकी डॉलर के मुकाबले यूरो की गिरावट पर लग सकता है ब्रेक, जाने प्रमुख सपोर्ट स्तर और वैश्विक करेंसी का हालगाजियाबाद हादसे के बाद अस्पताल के बिल ने तोड़ी कमर, बेटे को बचाने के लिए पिता को गिरवी रखनी पड़ी जमीनपश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक अजीत मैती गिरफ्तार, 10 साल पुराने रंगदारी मामले में पुलिस ने की कार्रवाईकम उम्र में ही दर्द से जूझ रहे बच्चे, आखिर क्यों बढ़ रही स्कूली छात्रों में रीढ़ और पीठ की गंभीर समस्याएं?शुक्र गोचर से 11 दिन तक चमकेगी इन राशियों की किस्मत, धन लाभ और तरक्की के बन रहे योगरूणिचा में आस्था का महासंगम, लोकदेवता बाबा रामदेवजी के समाधि स्थल पर हर साल क्यों उमड़ते हैं एक करोड़ से अधिक श्रद्धालु
हरिद्वार के कुशावर्त घाट पर पितरों के तर्पण की सदियों पुरानी परंपरा, भगवान राम और दत्तात्रेय से जुड़ा है इतिहासउत्तराखंड
25 सित॰ 2026, 5:02 pm (7 मिनट पहले)· 0

हरिद्वार के कुशावर्त घाट पर पितरों के तर्पण की सदियों पुरानी परंपरा, भगवान राम और दत्तात्रेय से जुड़ा है इतिहास

हरिद्वार में हर की पौड़ी के निकट स्थित कुशावर्त घाट का पितृ पक्ष के दौरान विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है, जहां त्रेतायुग में भगवान राम द्वारा पिंडदान करने की मान्यता है।

पितृ पक्ष के पावन दिनों में हरिद्वार की गंगा नगरी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने वाले श्रद्धालुओं से भर जाती है। देश के कोने-कोने से लोग अपने पुरखों की आत्मा की शांति, मोक्ष और सद्गति की कामना लेकर गंगा तट पर एकत्र होते हैं। गंगा के पवित्र जल में तर्पण और पिंडदान करने की यह परंपरा सदियों से अनवरत चली आ रही है। वैसे तो हरिद्वार के सभी गंगा तट पूजनीय हैं, लेकिन हर की पौड़ी के पास स्थित कुशावर्त घाट को पितृ कार्यों के लिए विशेष दर्जा प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस प्राचीन तट पर किया गया पिंडदान, तर्पण और पितृ हवन सीधे पूर्वजों को तृप्ति प्रदान करता है।

कुशा के घने जंगलों से मिला यह पावन नाम

कुशावर्त घाट के नामकरण और इसके अतीत की जड़ें अत्यंत प्राचीन काल से जुड़ी हुई हैं। तीर्थ पुरोहित प्रदीप झा बताते हैं कि प्राचीन समय में इस विशेष स्थान पर पवित्र कुशा घास के घने झुरमुट उगे रहते थे। सनातन परंपरा में कुशा को देव पूजन और पितृ तर्पण दोनों ही धार्मिक अनुष्ठानों में सबसे अनिवार्य और पवित्र सामग्री माना गया है। कुशा की इसी प्रचुरता के कारण इस तीर्थ स्थल का नाम कुशावर्त पड़ा। इस घाट का उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है, जिससे इसकी महत्ता और प्रमाणित होती है।

ये भी पढ़ें

भगवान राम ने किया था पिता दशरथ का श्राद्ध

इस पावन तट का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक प्रसंग त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने अपने पूज्य पिता राजा दशरथ के परलोक गमन के बाद उनका पिंडदान और तर्पण इसी कुशावर्त घाट पर संपन्न किया था। इसी पावन घटना के स्मरण में पितृ पक्ष के 16 श्राद्धों के दौरान श्रद्धालुओं का विश्वास यहां और गहरा हो जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि जिस भूमि पर स्वयं भगवान राम ने अपने पितरों को तर्पण अर्पित किया था, वहां श्राद्ध करने से उनके पूर्वजों को भी निश्चित रूप से सद्गति प्राप्त होती है।

भगवान दत्तात्रेय की तपोस्थली का गौरव

कुशावर्त घाट केवल पितृ कर्म ही नहीं, बल्कि गहन तपस्या की भूमि भी रहा है। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, यह घाट भगवान दत्तात्रेय की पावन तपस्थली के रूप में भी पूजित है। भगवान दत्तात्रेय ने इसी गंगा तट पर घोर तपस्या की थी, जिससे इस पूरे परिक्षेत्र में दिव्य ऊर्जा का संचार हुआ। मान्यता है कि इस तपोभूमि पर जब कोई व्यक्ति अपने पितरों के निमित्त अनुष्ठान करता है, तो भगवान दत्तात्रेय की साधना के प्रभाव से पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति सुगम हो जाती है।

रानी अहिल्याबाई होल्कर ने संवारा था घाट का स्वरूप

धार्मिक आस्था के साथ-साथ कुशावर्त घाट का एक समृद्ध ऐतिहासिक पहलू भी है। जिस तरह हर की पौड़ी का इतिहास महाराज भर्तृहरि की तपस्या और स्मृति से जुड़ा माना जाता है, ठीक उसी तरह कुशावर्त घाट के ऐतिहासिक जीर्णोद्धार और भव्य सौंदर्यीकरण का श्रेय मालवा की प्रसिद्ध शासक महारानी अहिल्याबाई होल्कर को जाता है। उन्होंने इस प्राचीन घाट का पुनरुद्धार करवाकर श्रद्धालुओं के लिए पूजा-अर्चना और स्नान को सुगम बनाया था। इस ऐतिहासिक योगदान के कारण यह घाट धार्मिक आस्था के साथ एक पुरातात्विक धरोहर के रूप में भी आदरणीय है।

पिंडदान, पितृ हवन और गोसेवा का विधान

पितृ पक्ष के दौरान कुशावर्त घाट पर श्राद्ध कर्म को पूर्ण शास्त्रीय विधि-विधान के साथ संपन्न कराया जाता है। पुरोहितों के मार्गदर्शन में श्रद्धालु सबसे पहले गंगाजल से तर्पण करते हैं, उसके पश्चात जौ, तिल और चावल से बने पिंड अर्पित किए जाते हैं तथा पितृ हवन संपन्न होता है। इस पूरे अनुष्ठान के बाद गाय को हरा चारा खिलाने की विशेष अनिवार्यता बताई गई है। सनातन परंपरा के अनुसार, गोसेवा के बिना पितृ कर्म पूर्ण नहीं माना जाता। पुरोहितों का विश्वास है कि विधिपूर्वक किए गए इन कर्मों से पूर्वज तृप्त होकर अपने कुल और परिवार को सुख, शांति, समृद्धि तथा वंश वृद्धि का वरदान देते हैं।

सवाल-जवाब

हरिद्वार में कुशावर्त घाट किस धार्मिक कर्म के लिए सबसे प्रसिद्ध है?
कुशावर्त घाट पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और पितृ हवन करने के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
इस घाट का नाम कुशावर्त कैसे पड़ा?
प्राचीन काल में इस स्थान पर पूजा और पितृ कार्यों में प्रयुक्त होने वाली पवित्र कुशा घास के घने झुरमुट हुआ करते थे, जिससे इसका नाम कुशावर्त पड़ा।
कुशावर्त घाट का संबंध किस पौराणिक काल और घटना से है?
मान्यता के अनुसार त्रेतायुग में भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान और तर्पण इसी घाट पर किया था।
किस शासक ने कुशावर्त घाट का जीर्णोद्धार कराया था?
कुशावर्त घाट के ऐतिहासिक जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का श्रेय महारानी अहिल्याबाई होल्कर को जाता है।
कुशावर्त घाट किस दिव्य तपस्वी की तपोस्थली माना जाता है?
इस घाट को भगवान दत्तात्रेय की पावन तपोस्थली माना जाता है, जहां उन्होंने तपस्या की थी।
कुशावर्त घाट पर तर्पण के बाद किस कार्य का विशेष विधान है?
पिंडदान और तर्पण के बाद गाय को हरा चारा खिलाने का विशेष शास्त्रीय विधान बताया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp