गंगा की अविरल धारा, हिमालय की तलहटी में बसा शांत वातावरण और योग व आध्यात्मिकता की सदियों पुरानी पहचान वाले ऋषिकेश का स्वरूप आज गंभीर बदलाव के दौर से गुजर रहा है। दुनिया भर से लाखों लोग मानसिक शांति और सुकून की तलाश में इस पावन धरा पर कदम रखते हैं, लेकिन सैलानियों की भारी आवक अब यहां के बाशिंदों के लिए विकट संकट बन चुकी है। सड़कों पर वाहनों की अंतहीन कतारें, घाटों पर बिखरा प्लास्टिक कचरा, तेज आवाज में दौड़ती गाड़ियां और सार्वजनिक स्थानों पर उद्दंड व्यवहार ने शहर के बुनियादी ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया है। स्थानीय समुदाय का स्पष्ट मत है कि आर्थिकी को गति देने वाला पर्यटन अत्यंत आवश्यक है, परंतु यह शहर के उस मूल शांत स्वरूप और सामाजिक मर्यादा को कुचलकर नहीं होना चाहिए जिसने इस स्थान को वैश्विक मानचित्र पर विशिष्ट स्थान दिलाया है।
खुलेआम नशाखोरी और उपद्रव से सहमे रिहायशी इलाके
तीर्थनगरी के घरेलू परिवेश में बढ़ रही अशांति पर चिंता प्रकट करते हुए स्थानीय निवासी सुनील स्थिति की गंभीरता सामने रखते हैं। उनका कहना है कि दूरदराज से आने वाले अधिकांश लोग निसंदेह शांति और प्रकृति के दर्शन के उद्देश्य से यात्रा करते हैं, किंतु कुछ उपद्रवी तत्व पूरी नगरी की शांति को तार-तार कर देते हैं। कई मौकों पर पर्यटक खुलेआम शराब पीते नजर आते हैं और रिहायशी बस्तियों तथा सड़कों के किनारे हुड़दंग मचाते हैं। यह हंगामा केवल शोर-शराबे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई बार स्थानीय लोगों के साथ गाली-गलौज और हाथापाई जैसी अप्रिय घटनाओं में तब्दील हो जाता है।
सुनील के अनुसार, इस प्रकार के असभ्य और उच्छृंखल आचरण के कारण कॉलोनियों में रहने वाले परिवारों और महिलाओं के भीतर असुरक्षा व असहजता का गहरा माहौल बन जाता है। उनका दृढ़ता से कहना है कि पर्यटन या मौज-मस्ती के नाम पर ऐसा अशोभनीय व्यवहार किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं होना चाहिए। बाहर से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह बात स्मरण रखनी होगी कि जिस स्थान पर वे कुछ दिनों के मनोरंजन और अवकाश के लिए पहुंचे हैं, वह वहां के मूल निवासियों का स्थायी आशियाना है और स्थानीय परंपराओं, परिवारों की गरिमा तथा सामाजिक सीमाओं का आदर करना अनिवार्य कर्तव्य है।
पावन घाटों पर कचरे का अंबार और संकरी सड़कों पर तेज रफ्तार
नदी तटों की स्वच्छता और सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दे पर स्थानीय नागरिक गगन ने गहरी वेदना व्यक्त की है। उनका कहना है कि जिस पतित-पावनी गंगा के दर्शन, आचमन और निर्मल जल के स्पर्श की लालसा लिए लोग हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हैं, उसी पावन नदी के घाटों पर बैठकर खान-पान करने के उपरांत भारी मात्रा में जूठन और कूड़ा वहीं छोड़ दिया जाता है। प्लास्टिक की खाली बोतलें, चिप्स के रैपर, डिब्बे और खाद्य अवशेष घाटों की दिव्यता और पर्यावरणीय पवित्रता को निरंतर मैला कर रहे हैं। प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताने वाले पर्यटकों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि गंगा तट को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
इसके साथ ही, नगर के पहाड़ी और अत्यंत संकरे मार्गों पर वाहनों की बेलगाम रफ्तार ने पैदल चलने वालों का जीना मुहाल कर दिया है। गगन बताते हैं कि इन घुमावदार रास्तों पर स्थानीय निवासियों, वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों की लगातार आवाजाही रहती है। ऐसे में कई पर्यटक संकरे मोड़ों पर भी तेज गति से गाड़ियां दौड़ाते हैं, जिससे हर पल गंभीर सड़क हादसे की आशंका बनी रहती है। उनका आग्रह है कि पर्यटन की बढ़ती व्यापकता के समानांतर पर्यटकों के भीतर नागरिक कर्तव्यों और यातायात अनुशासन की समझ भी उसी गति से विकसित होनी चाहिए।
डिजिटल नक्शों की अंधी राह और रिहायशी गलियों में लगा जाम
नगर में विकराल होते जा रहे ट्रैफिक संकट पर स्थानीय नागरिक रमन प्रकाश डालते हैं कि किस तरह सड़कों की भीड़ ने दैनिक दिनचर्या को बंधक बना लिया है। बाहर से अपनी निजी गाड़ियां लेकर आने वाले चालक मोबाइल नेविगेशन मैप पर पूरी तरह निर्भर होकर बिना सोचे-समझे शहर की उन तंग व संकरी गलियों में चारपहिया वाहन घुसा देते हैं, जहां से दोपहिया का निकलना भी कठिन होता है। जैसे ही कोई बड़ी गाड़ी किसी गली के मोड़ पर फंसती है, देखते ही देखते उसके पीछे सैकड़ों वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतार लग जाती है।
इस अव्यवस्था के कारण स्थानीय बाशिंदों को घंटों तक जाम के चक्रव्यूह में घुटने पर मजबूर होना पड़ता है। नगर का सड़क ढांचा अपनी वास्तविक क्षमता से कई गुना अधिक दबाव झेल रहा है। रमन के मुताबिक, विशेष रूप से वीकेंड और सार्वजनिक अवकाश के दिनों में स्थिति इस कदर अनियंत्रित हो जाती है कि लोगों के लिए घरों से निकलकर दवा, राशन या अन्य आवश्यक सामग्री लाना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है। आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस जैसी जरूरी सेवाओं का निकलना भी इन संकरी गलियों में दूभर हो जाता है।
प्रशासन का डायवर्जन प्लान और जमीनी क्रियान्वयन की चुनौतियां
शहर को वाहनों के महाजाम से उबारने के उद्देश्य से स्थानीय प्रशासन द्वारा ट्रैफिक डायवर्जन व्यवस्था अमल में लाई जाती है। नेपाली फार्म से ऋषिकेश की सीमा में प्रवेश करने वाले वाहनों के सुचारू संचालन के लिए मूलतः दो वैकल्पिक मार्ग तय किए गए हैं। इनमें से एक मार्ग एम्स की दिशा से होकर नगर में दाखिल होता है, जबकि दूसरा वैकल्पिक मार्ग हरिद्वार रोड से होते हुए कोयल घाटी की ओर निकलता है। जब नगर के भीतरी हिस्सों में वाहनों का दबाव अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तो प्रशासन इन दोनों रास्तों को वन-वे रूट में परिवर्तित कर देता है, जिसके तहत एक तय रास्ते से वाहनों को प्रवेश दिया जाता है और दूसरे निर्धारित मार्ग से बाहर निकाला जाता है।
इसके अलावा, बाहरी क्षेत्रों से आने वाली बड़ी पर्यटक बसों को नगर के मुख्य प्रवेश बिंदुओं के निकट ही रोकने की व्यवस्था की गई है, जिसके लिए ढालवाला और आईएसबीटी के निर्धारित पार्किंग स्थलों का उपयोग किया जाता है। जब ये दोनों मुख्य पार्किंग स्थल पूरी तरह वाहनों से भर जाते हैं, तब अतिरिक्त बैकअप के तौर पर आईडीपीएल की अस्थायी पार्किंग में बसों और अन्य बड़े वाहनों को खड़ा करवाया जाता है। हालांकि, इन प्रशासनिक तैयारियों और योजनाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर जाम की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि बाहरी राज्यों से आने वाले चालक दिशा-निर्देशों और व्यवस्था को अनदेखा करते हुए मोबाइल मैप के निर्देशों पर चलते हैं और गलियों के भीतर वाहन घुसाकर पूरी ट्रैफिक योजना को पटरी से उतार देते हैं।
आर्थिकी की रीढ़ है पर्यटन, मगर स्थानीय शांति की हिफाजत भी लाजिमी
यह तथ्य पूरी तरह निर्विवाद है कि ऋषिकेश की समग्र अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन गतिविधियों पर ही आश्रित है। होटल, होमस्टे, आधुनिक खान-पान के कैफे, गंगा में साहसिक राफ्टिंग का संचालन, टैक्सी सेवाएं और स्थानीय बाजारों के छोटे-बड़े दुकानदार अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह बाहरी सैलानियों पर निर्भर करते हैं। स्थानीय समाज कभी भी पर्यटन कारोबार के विस्तार अथवा पर्यटकों के आगमन का विरोधी नहीं रहा है, परंतु उनकी एकमात्र मांग यह है कि विकास की इस होड़ में नगर के नैतिक नियमों, आध्यात्मिक शांति और बुनियादी नागरिक अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए।
स्थानीय बाशिंदों का कहना है कि बुनियादी सावधानियों के पालन से स्थिति में बड़ा सुधार आ सकता है। गंगा के पवित्र घाटों पर गंदगी न फैलाना, खुले व सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीकर उपद्रव न मचाना, नगर के संकरे मोड़ों पर संयमित गति से गाड़ी चलाना तथा पुरानी तंग रिहायशी गलियों में बड़ी गाड़ियां ले जाने से परहेज करना ऐसे कदम हैं जो पर्यटकों और स्थानीय समाज के बीच सामंजस्य बना सकते हैं। जो पर्यटक यहां आते हैं, वे कुछ दिनों का सुकून बिताकर अपने घरों को लौट जाते हैं, किंतु स्थानीय नागरिकों के लिए यह जीवन भर का आशियाना है। अतः शहर की आर्थिक उन्नति और पर्यटन के विस्तार के साथ-साथ यहां के निवासियों के शांतिपूर्ण जीवन की रक्षा करना भी नीति-निर्माताओं और पर्यटकों की साझा जिम्मेदारी है।





















