उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक ताना-बाना सिख परंपरा की महत्वपूर्ण घटनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। करीब 340 वर्ष पूर्व दून घाटी में एक ऐसा घटनाक्रम घटा था जिसने इस क्षेत्र के धार्मिक प्रशासन और इतिहास को नई दिशा दी। उस दौर में बाबा राम राय के अकाल चलाणे के उपरांत उनकी गद्दी और दरबार के प्रबंधन को लेकर एक गंभीर विवाद पैदा हो गया था। इस नाजुक मोड़ पर उनकी धर्मपत्नी माता पंजाब कौर ने पांवटा साहिब संदेश भेजकर सिख पंथ के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी महाराज से हस्तक्षेप और मार्गदर्शन का आग्रह किया था।
देहरादून नामकरण और गद्दी को लेकर उपजा ऐतिहासिक विवाद
जत्था अकाली बाबा फतेह सिंह दल से जुड़े सेवादार प्रेम सिंह के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें गुरु गद्दी से जुड़े पुराने मतभेदों तक जाती हैं। उन मतभेदों के बाद बाबा राम राय पंजाब छोड़कर दून घाटी में आकर बस गए थे। यहां पहुंचकर उन्होंने अपने संगी-साथियों और अनुयायियों के साथ विधिवत डेरा स्थापित किया। इसी डेरा डालने की ऐतिहासिक घटना के कारण आगे चलकर इस सुरम्य घाटी का नाम देहरादून पड़ा।
कालांतर में बाबा राम राय का अचानक निधन हो गया, जिसके तुरंत बाद वहां की गद्दी और दरबार की व्यवस्था पर प्रभुत्व जमाने के लिए संघर्ष छिड़ गया। दरबार के कुछ प्रभावशाली मसांद व्यवस्था पर अनैतिक रूप से कब्जा करने और नियंत्रण हथियाने के षड्यंत्र रचने लगे थे। इस संकटपूर्ण माहौल में खुद को घिरा पाकर माता पंजाब कौर ने मर्यादा और न्याय की बहाली के लिए पांवटा साहिब में विराजमान गुरु गोविंद सिंह जी को एक पत्र भेजकर तत्काल सहयोग मांगा।
पांवटा साहिब से 500 से अधिक अनुयायियों के साथ आगमन
माता पंजाब कौर का संदेश मिलते ही गुरु गोविंद सिंह जी ने तत्काल देहरादून कूच करने का निर्णय लिया। ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर बताया जाता है कि गुरु साहिब करीब 3 से 4 अक्टूबर के आसपास 500 से ज्यादा अनुयायियों और संगतों के एक बड़े काफिले के साथ देहरादून पहुंचे थे। यहां पहुंचकर उन्होंने पूरे विवाद में सीधा और निर्णायक दखल दिया।
गुरु साहिब ने दरबार में चल रहे षड्यंत्रों का पूरी तरह अंत किया, भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारा और मर्यादा की रक्षा करते हुए धर्म व न्याय की पुनर्स्थापना की। इस ऐतिहासिक हस्तक्षेप ने माता पंजाब कौर को आत्मबल और संबल प्रदान किया, जिसके बूते वह आने वाले कई वर्षों तक दरबार के प्रबंधन और सेवा कार्यों को सफलतापूर्वक संभालती रहीं। विवाद का स्थायी समाधान करने और व्यवस्थाएं चाक-चौबंद करने के उपरांत गुरु साहिब वापस पांवटा साहिब के लिए रवाना हो गए।
340 वर्ष पूरे होने पर भव्य तीन दिवसीय आयोजन
गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के देहरादून आगमन के 340 साल पूरे होने की इस पावन स्मृति में जत्था अकाली बाबा फतेह सिंह दल की ओर से पहली बार एक व्यापक स्तर का आयोजन किया जा रहा है। आगामी 2 अक्टूबर से शुरू होने वाले इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में गुरमत समागम, भव्य बाइक रैली और पारंपरिक खालसाई महल्ला का आयोजन किया जाएगा।
आयोजन से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि इस बड़े उत्सव का मुख्य ध्येय नई पीढ़ी को देहरादून के समृद्ध सिख इतिहास और दसवें पातशाह के इस पावन आगमन की ऐतिहासिक महत्ता से परिचित कराना है। इस विशेष समागम में शामिल होने के लिए उत्तराखंड के विभिन्न अंचलों के साथ-साथ अन्य राज्यों और विदेशों से भी बड़ी संख्या में संगत के पहुंचने की संभावना है।



















