उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भारतीय जनता पार्टी की पार्षद अमिता सिंह के आवास पर हुई सनसनीखेज डकैती के मामले में पुलिस पड़ताल के दौरान चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं। पार्षद के घर पर घरेलू रसोइए के रूप में काम कर रहे नौकर भरत थापा का पुराना आपराधिक इतिहास उजागर हुआ है। पुलिस जांच और डिजिटल रिकॉर्ड की छानबीन से यह स्पष्ट हुआ है कि आरोपी पहले भी गंभीर अपराधों में संलिप्त रहा है और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की जेल में करीब डेढ़ वर्ष का कारावास काट चुका है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस आरोपी ने पार्षद के परिवार में महज बीस दिन पहले ही काम शुरू किया था और इतने अल्प समय में ही सभी सदस्यों का विश्वास हासिल कर इस दुस्साहसिक वारदात की रूपरेखा तैयार कर ली थी।
सोची-समझी साजिश के तहत खाने में मिलाया गया नशीला पदार्थ
जांच अधिकारियों द्वारा जुटाए गए ब्योरे के अनुसार, नेपाल मूल के आरोपी भरत थापा ने पार्षद के घर में कदम रखने के साथ ही कीमती सामान, नकदी और आभूषणों के ठिकानों की टोह लेनी शुरू कर दी थी। जैसे ही उसे घर की आर्थिक स्थिति और जेवरातों की पुख्ता जानकारी मिली, उसने डकैती की साजिश को अंजाम देने के लिए अपने चार अन्य साथियों को भी सक्रिय कर दिया। योजना के मुताबिक, वारदात की रात आरोपी बाहर से नशीला पदार्थ लेकर आया और रात का भोजन तैयार करते समय चुपचाप उसमें मिला दिया। परिवार के सभी सदस्यों ने जब वह खाना खाया, तो कुछ ही देर में वे गहरी और अस्वाभाविक नींद के आगोश में चले गए। इसके तुरंत बाद आरोपी ने अपने चारों साथियों को घर के भीतर बुला लिया और अलमारियों में रखे जेवरात तथा भारी नकदी बटोर ली। इसी दौरान खटपट की आवाज सुनकर परिवार के कुछ सदस्यों की आंखें खुलीं, जिसके बाद पकड़े जाने के डर से आरोपी और उसके साथी मौके से फरार हो गए।
नफीस पोर्टल से खुली आरोपी के अतीत की पोल
देहरादून पुलिस ने जब आरोपी की पृष्ठभूमि का पता लगाने के लिए नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम यानी नफीस पोर्टल का सहारा लिया, तब उसके पिछले काले कारनामों की परतें खुलीं। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म अपराधियों के फिंगरप्रिंट, फोटो और आपराधिक मामलों का व्यापक डेटाबेस रखता है, जिससे देशभर की पुलिस किसी भी संदिग्ध की तत्काल पहचान कर सकती है। पोर्टल पर उपलब्ध डेटा के विश्लेषण से पता चला कि आरोपी भरत दिल्ली में आपराधिक वारदातों में लिप्त रहा था और वहां लगभग डेढ़ साल तक सलाखों के पीछे रह चुका है। देहरादून के पुलिस अधीक्षक नगर शेखर सुयाल ने पुष्टि की है कि आरोपी का पुराना आपराधिक ब्योरा सामने आ चुका है और अब दिल्ली पुलिस तथा संबंधित पक्षों के साथ समन्वय स्थापित कर उसके पिछले मामलों का पूर्ण ब्योरा जुटाया जा रहा है।
सवालों के घेरे में आई प्लेसमेंट एजेंसी की भूमिका
पड़ताल में यह बात भी स्थापित हुई है कि आरोपी भरत थापा को पार्षद अमिता सिंह की बेटी मेघा ने दिल्ली स्थित एएस प्लेसमेंट सर्विस एजेंसी के माध्यम से काम पर रखवाया था। करीब बीस दिन पहले दिल्ली से देहरादून भेजे गए इस व्यक्ति को लेकर अब सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस अब इस पहलू की बारीकी से जांच कर रही है कि एएस प्लेसमेंट सर्विस एजेंसी ने इस व्यक्ति को किसी के घर में भेजने से पहले उसके आवश्यक पहचान पत्र, स्थायी निवास प्रमाण पत्र और पूर्व चरित्र की कोई जांच की थी अथवा नहीं। सवाल यह भी उठता है कि यदि आरोपी दिल्ली में डेढ़ साल जेल काट चुका था, तो एजेंसी की पड़ताल में यह तथ्य सामने क्यों नहीं आया और क्या एजेंसी ने बिना किसी अनिवार्य पुलिस सत्यापन के ही उसे एक जनप्रतिनिधि के आवास पर भेज दिया।
घरेलू कामगार मुहैया कराने वाली एजेंसियों के दावों की पड़ताल
इस बड़ी वारदात के सामने आने के बाद देहरादून सहित पूरे क्षेत्र में घरेलू नौकर, रसोइए और सहायक उपलब्ध कराने वाली निजी एजेंसियों की कार्यप्रणाली कटघरे में आ गई है। राजधानी में दर्जनों एजेंसियां घरेलू सहायकों की आपूर्ति का कारोबार कर रही हैं और ग्राहकों को पूरी तरह से सत्यापित कर्मचारी देने का दावा करती हैं। निजी सुरक्षा और सर्वेंट प्रोवाइडर कंपनी चेकमेट के फील्ड ऑफिसर जगत सिंह पुंडीर के अनुसार, सामान्य प्रक्रिया के तहत किसी भी नए कर्मचारी को पंजीकृत करने से पूर्व उसके आधार कार्ड, पहचान पत्र और पते से जुड़े दस्तावेजों की गहन जांच की जाती है। इसके उपरांत स्थानीय पुलिस थाने के माध्यम से औपचारिक पुलिस सत्यापन कराया जाता है और समस्त औपचारिकताओं के निर्दोष पाए जाने पर ही उसे कार्य पर भेजा जाता है।
इसी व्यवस्था की जमीनी हकीकत परखने के लिए जब देहरादून की केएस मैनपावर सर्विस एजेंसी से एक सामान्य ग्राहक के रूप में संपर्क किया गया, तो वहां से बताया गया कि किसी घरेलू कामगार की मासिक तनख्वाह लगभग पंद्रह हजार रुपये निर्धारित होती है। एजेंसी ने एक हजार रुपये का अग्रिम पंजीकरण शुल्क जमा करने पर कर्मचारी के सत्यापन से संबंधित समस्त दस्तावेज सौंपने का भरोसा भी दिलाया। हालांकि, अमिता सिंह के घर हुई इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि कई एजेंसियां केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी करती हैं और सुरक्षा की जमीनी हकीकत बेहद लचर है।
फरार आरोपियों की धरपकड़ के लिए तीन पुलिस टीमें गठित
डकैती की इस संगीन वारदात के बाद पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद हो गया है। मामले के शीघ्र अनावरण और अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की तीन विशेष टीमें गठित की गई हैं। ये टीमें घटनास्थल के आसपास और शहर के प्रमुख चौराहों पर स्थापित सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खंगाल रही हैं, जिससे यह सुराग मिल सके कि आरोपी और उसके चार साथी किस दिशा से आए थे और वारदात के बाद किस मार्ग से भागे। इसके अलावा, पुलिस साइबर सेल की सहायता से भरत थापा के मोबाइल संपर्कों, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और स्थानीय स्तर पर उससे मिलने-जुलने वाले लोगों की निगरानी कर रही है ताकि डकैती में शामिल चारों अज्ञात साथियों की पहचान सुनिश्चित की जा सके।
सत्यापन में लापरवाही बरतने वालों पर तय होगी जवाबदेही
वर्तमान में संपूर्ण जांच का मुख्य केंद्र बिंदु सत्यापन प्रक्रिया की विफलता पर केंद्रित है। दिल्ली पुलिस से आरोपी के आपराधिक रिकॉर्ड का औपचारिक सत्यापन प्राप्त होने के पश्चात यह तय किया जाएगा कि दिल्ली की संबंधित प्लेसमेंट एजेंसी ने नियमों का कितना उल्लंघन किया है। यदि एजेंसी के स्तर पर पहचान छुपाने, बिना पुलिस वेरिफिकेशन के कर्मचारी भेजने या घोर लापरवाही बरतने का साक्ष्य मिलता है, तो एजेंसी के प्रबंधकों के विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर अनधिकृत और संदेहास्पद लोगों को घरों में काम पर लगाने वाली एजेंसियों के खिलाफ आने वाले दिनों में सख्त दिशा-निर्देश लागू किए जाएंगे।



















