ढाई दशक पहले उत्तराखंड राज्य के गठन के समय पर्वतीय अंचलों में एक ऐतिहासिक गूंज सुनाई देती थी कि आज दो, अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो। यह सिर्फ एक नारा भर नहीं था बल्कि अपनी पहचान, अपने अधिकारों और एक बेहतर कल को हासिल करने की जिद थी। आज राज्य को बने हुए पूरे 25 साल बीत चुके हैं, लेकिन उसी पहाड़ की नई पीढ़ी एक बार फिर सड़कों पर उतरने को मजबूर हो चुकी है। इस बार उनकी यह लड़ाई किसी अलग भौगोलिक राज्य के लिए नहीं बल्कि स्कूल में शिक्षकों की मांग को लेकर है।
नैनीताल जिले के बेतालघाट क्षेत्र में स्थित राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की छात्राओं का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे ये छात्राएं अपने हाथों में किताबें थामे हुए शिक्षक दो, आज दो, अभी दो जैसे नारे बुलंद कर रही हैं। इन बच्चियों का साफ कहना है कि विद्यालय में अध्यापकों का भारी अभाव है, जिसकी सीधी मार उनकी पढ़ाई के साथ-साथ उनके सुनहरे भविष्य पर भी पड़ रही है।
उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो इस विद्यालय में इंटरमीडिएट स्तर पर प्रवक्ताओं के कुल 9 पद स्वीकृत किए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक भी पद पर अभी तक नियुक्ति नहीं हुई है यानी उच्च माध्यमिक स्तर के सभी 9 पद पूरी तरह खाली हैं। इसके अलावा स्नातक स्तर पर भी शिक्षकों के 10 पद स्वीकृत हैं जिनमें से 5 पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं। इस तरह इस स्कूल के कुल 19 स्वीकृत पदों में से 14 पद खाली पड़े हुए हैं। ऐसे में इन छात्राओं का यह वाजिब सवाल है कि जब बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक ही मौजूद नहीं होंगे तो वे अपनी बोर्ड परीक्षाएं कैसे पास करेंगी और प्रतियोगी मुकाबलों के लिए खुद को कैसे तैयार करेंगी।
आज के इस दौर में पलने वाली पीढ़ी को तकनीक और आधुनिकता के साथ जोड़ा जा रहा है। यह वह पीढ़ी है जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल लर्निंग और ऑनलाइन माध्यमों के बीच बड़ी हो रही है। दुनिया भर में बच्चों को भविष्य की आधुनिक नौकरियों के लिए तैयार करने की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। लेकिन बेतालघाट की इन बेटियों के सामने तो सबसे बुनियादी और बड़ा सवाल यही खड़ा है कि आखिर उन्हें पढ़ाने वाला कौन है। एक तरफ सरकारें आधुनिक शिक्षा और नए डिजिटल संसाधनों की बड़ी डींगें हांकती हैं, तो दूसरी तरफ पर्वतीय इलाकों के सरकारी स्कूलों में मूल पद खाली पड़े रहते हैं।
यह अकेली तस्वीर सिर्फ बेतालघाट की नहीं है बल्कि पूरे उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों की पुरानी और गंभीर समस्या है। राज्य के सुदूर इलाकों में बने 1149 प्राथमिक विद्यालयों में तो एक भी शिक्षक तैनात नहीं मिला था। अध्यापकों की इस भारी कमी का सीधा असर बच्चों की शिक्षा के स्तर और उनके रोजगार के अवसरों पर पड़ रहा है।
उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत की तरफ से हमेशा से ही शिक्षा व्यवस्था को सुधारने और स्कूलों में पर्याप्त स्टाफ मुहैया कराने के दावे किए जाते रहे हैं। सरकार हर मंच से आधुनिक स्टडी मॉडल की बात करती है। लेकिन बेतालघाट की इन छात्राओं का यह विरोध प्रदर्शन उन तमाम दावों की पोल खोलकर रख देता है। सुगम और दुर्गम इलाकों के बीच तबादलों की नीति और शिक्षकों की कमी का यह संकट बहुत पुराना है।
अब इन छात्राओं ने इस मुद्दे को लेकर आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी सीधी मांग है कि विद्यालय में सभी रिक्त पदों को तुरंत भरा जाए। पच्चीस साल पहले जो आवाज राज्य गठन के लिए उठी थी, आज वही बेटियां अपने हक के लिए उठ रही हैं। नारे भले ही बदल गए हों, लेकिन सवाल आज भी वही पुराना है कि क्या पहाड़ के बच्चों को उनके हिस्से की बुनियादी शिक्षा कभी मिल पाएगी।























