उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों वाले देहरादून शहर की गलियों में घूमते समय यदि किसी को इस सुहावने मौसम में भी स्वादिष्ट और मलाईदार मैंगो शेक पीने का मौका मिल जाए, तो खाने-पीने के शौकीनों का सफर यादगार बन जाता है। आमतौर पर देखा जाता है कि मानसूनी बारिश का दौर थमते ही पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में आम का सीजन पूरी तरह समाप्त हो जाता है, लेकिन इस खास दुकान पर फलों के राजा का स्वाद बारह महीने लगातार बना रहता है। उम्दा किस्म के सूखे मेवे और गाढ़ी मलाईदार आइसक्रीम का यह बेहतरीन मेल न केवल स्थानीय रहवासियों को बल्कि दूर-दराज से घूमने आने वाले सैलानियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। दुकान चलाने वाले श्यामलाल के अनुसार उन्होंने इस कारोबार की नींव साल 1996 में रखी थी। शुरुआती दिनों में वह केवल कटे हुए ताजे फल बेचा करते थे, लेकिन ग्राहकों की सेहत और पसंद को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने फलों के रस का काम शुरू करने का फैसला किया।
रेसिपी में बदलाव और सिग्नेचर ड्रिंक की शुरुआत
वक्त बीतने के साथ उन्होंने अपनी कला में नए प्रयोग करने शुरू किए और आम के गाढ़े पल्प में रिच आइसक्रीम तथा पौष्टिक ड्राई फ्रूट्स का मेल करना आरंभ किया। उनका यह अभिनव प्रयोग इतना कामयाब रहा कि थोड़े ही समय में यह खास मैंगो शेक उनके काउंटर की सबसे बड़ी पहचान यानी सिग्नेचर ड्रिंक बन गया। इस लोकप्रिय पेय की सबसे बड़ी खासियत इसकी बेहतरीन शुद्धता और अलग ही मिठास है जिसे बनाने में पारंपरिक चीनी के स्थान पर शुद्ध देसी शक्कर और गाढ़े दूध का उपयोग किया जाता है। जब दून घाटी और उसके आसपास के इलाकों में आम का सीजन पूरी तरह खत्म हो जाता है, तब वह खास तौर पर दक्षिण भारतीय राज्यों खासकर केरल से आम मंगवाते हैं। यही वजह है कि मौसम चाहे कड़कड़ाती ठंड का हो या मानसून की विदाई का, ग्राहकों को हमेशा यहां प्रामाणिक स्वाद मिलता है।
अन्य ताजे फल और अनूठा पकाने का तरीका
इस मशहूर मैंगो शेक के अलावा उनकी दुकान पर अनानास, अनार, सेब और मौसमी का ताजा रस भी खरीदारों के लिए हर वक्त उपलब्ध रहता है। अनानास को प्राकृतिक रूप से पकाने की उनकी तकनीक बेहद दिलचस्प और अनूठी है। वह बाजार से हरे और कच्चे अनानास खरीदकर अपनी दुकान के बाहर लटका देते हैं जो लगभग दस दिनों की अवधि में अपने आप पककर तैयार हो जाते हैं। श्यामलाल का मानना है कि इस देसी तरीके से न केवल दुकान की शोभा बढ़ती है, बल्कि ग्राहकों को किसी भी तरह के कृत्रिम रसायन के बिना पूरी तरह शुद्ध और प्राकृतिक रूप से मीठा फल खाने को मिलता है।
बढ़ती कीमतें और पर्यटकों के बीच लोकप्रियता
दुकानदार का कहना है कि साल 1996 में जब उन्होंने इसकी शुरुआत की थी तब एक गिलास की कीमत मात्र 8 से 10 रुपये हुआ करती थी, जो आज के मंहगाई भरे दौर में बढ़कर 100 से 150 रुपये तक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद इस खास ड्रिंक को चाहने वालों के उत्साह और भीड़ में कभी कोई कमी देखने को नहीं मिली है। हर रोज सुबह के वक्त ताजा तैयार किया जाने वाला यह पेय दिन ढलते-ढलते पूरी तरह बिक जाता है। मौजूदा हालात यह हैं कि देहरादून के स्थानीय नागरिक तो इसके दीवाने हैं ही, साथ ही इंदिरा मार्केट घूमने आने वाले दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के सैलानी भी जब इस शहर का रुख करते हैं तो इस मशहूर मैंगो शेक का स्वाद चखना कभी नहीं भूलते हैं।


















