अंबाला के खुड्डा कलां स्थित सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल सुभाष शर्मा ने अपनी कार्यकुशलता और सेवाभाव से एक ऐसी मिसाल कायम की है, जिसने साबित कर दिया कि सही नीयत हो तो सरकारी व्यवस्था को भी पूरी तरह बदला जा सकता है। उन्होंने मात्र आठ महीनों के भीतर स्कूल की कायापलट कर दी और आज यहां पढ़ने वाले बच्चे खुद को किसी महंगे निजी संस्थान के विद्यार्थियों से कम नहीं आंकते। उनकी इस असाधारण मेहनत और शिक्षा के क्षेत्र में उनके दीर्घकालिक योगदान को देखते हुए शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर उन्हें प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह गौरवशाली सम्मान उन्हें राज्यपाल के करकमलों द्वारा प्रदान किया जाएगा। अंबाला जिले से यह प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले वह पहले प्रिंसिपल बन गए हैं। इस बड़ी घोषणा के बाद से न केवल प्रिंसिपल सुभाष शर्मा बल्कि पूरे विद्यालय परिवार, शिक्षकों और विद्यार्थियों में अभूतपूर्व उत्साह और खुशी का माहौल है। सभी के लिए यह सम्मान इसलिए भी अत्यंत खास है क्योंकि उन्होंने अपनी आंखों के सामने इस सरकारी स्कूल को बदहाली से निकलकर आधुनिक सुविधाओं से लैस होते हुए देखा है।
शुरुआती चुनौतियां और जनसहयोग से कायाकल्प
प्रिंसिपल सुभाष शर्मा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब उन्होंने लगभग आठ महीने पहले इस विद्यालय की कमान संभाली थी, तब यहां हालात बेहद दयनीय थे। बालिकाओं के लिए बने शौचालय से लेकर मिड-डे मील और विज्ञान प्रयोगशाला तक, हर एक व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई थी और भवन के कई हिस्से जर्जर होकर टूट चुके थे। इस बदहाल स्थिति को देखने के बाद उनके मन में यह विचार आया कि सरकारी स्कूलों के बच्चों को भी बेहतर और सुरक्षित माहौल क्यों नहीं मिलना चाहिए। इसके बाद उन्होंने सरकार की प्रशासनिक मदद का इंतजार करने के बजाय सामाजिक संस्थाओं और क्षेत्र के दानदाताओं से संपर्क साधना शुरू किया। धीरे-धीरे समाज के जिम्मेदार लोगों का सहयोग मिलने लगा और स्कूल के जीर्णोद्धार का कार्य आरंभ हो गया। आज वही परिसर पूरी तरह साफ-सुथरा और व्यवस्थित नजर आता है। शौचालयों की स्थिति सुधारी गई, मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था को बेहतर किया गया तथा विज्ञान प्रयोगशाला को विद्यार्थियों के प्रायोगिक कार्यों के अनुकूल बनाया गया। इसके अलावा विद्यार्थियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पूरे परिसर में सीसीटीवी कैमरे भी लगवाए गए ताकि हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके। उन्होंने स्कूल के पुराने और वर्तमान स्वरूप की तस्वीरें भी साझा की हैं, जिनमें आया बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
छात्रों के भविष्य और आर्थिक मदद के लिए विशेष प्रयास
प्रिंसिपल सुभाष शर्मा के प्रयास केवल स्कूल की चारदीवारी और भवनों के सुधार तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने बच्चों की शैक्षणिक उन्नति और आर्थिक मदद के लिए भी विशेष कदम उठाए। जब उनके स्कूल के एक मेधावी छात्र ने 98.2 प्रतिशत अंक प्राप्त किए, तो उन्होंने शासन स्तर पर पैरवी कर उसे 1.11 लाख रुपये का भारी-भरकम पुरस्कार दिलवाया। इसके अलावा, आर्थिक तंगी से जूझ रही पांच जरूरतमंद छात्राओं की पढ़ाई बीच में न छूटे, इसके लिए उन्होंने स्थानीय बैंकों से संवाद किया और सिफारिश कर उन्हें प्रति माह 5 हजार रुपये की छात्रवृत्ति दिलवाई। इन छात्राओं का यह कहना है कि इस आर्थिक सहायता के मिलने से उनकी पढ़ाई का खर्च चलाना बेहद आसान हो गया है और उन्हें अपनी शिक्षा जारी रखने में किसी प्रकार की बाधा का सामना नहीं करना पड़ रहा है।
सत्ताइस साल का लंबा सफर और प्रेरणा
अपने सेवाकाल के बारे में बताते हुए सुभाष शर्मा कहते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में उनका यह सफर करीब 27 साल का लंबा अनुभव समेटे हुए है। अपने करियर की शुरुआत में जब वह एक सुदूर ग्रामीण इलाके के स्कूल में पदस्थ हुए थे, तब वहां की स्थिति और भी बदतर थी क्योंकि लोग स्कूल परिसर के भीतर अपने पालतू पशु बांधते थे। उस समय उन्होंने स्थानीय पंचायत के सहयोग से स्कूल की चारदीवारी का निर्माण करवाया और धीरे-धीरे पूरे शैक्षणिक माहौल को सुधार दिया। यही प्रारंभिक अनुभव उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट और प्रेरणा बन गया। इसके बाद उन्हें जहां भी तैनाती मिली, उन्होंने उसी विद्यालय को बेहतर बनाने की ठान ली। कई बार ऐसा भी हुआ कि स्कूल का निर्धारित समय समाप्त होने के बाद भी वह शाम को अतिरिक्त समय निकालकर कमजोर विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा देते थे, ताकि वे भी बाकी बच्चों के साथ कदमताल कर सकें।
प्रिंसिपल के इन सकारात्मक प्रयासों का परिणाम यह निकला कि विद्यालय में छात्रों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। उनके कार्यभार संभालने के बाद स्कूल में 50 से 60 नए बच्चे जुड़े और अब कुल विद्यार्थियों का आंकड़ा 300 के पार पहुंच चुका है। उनका अगला बड़ा लक्ष्य ग्रामीण बच्चों को आधुनिक तकनीकी युग की दौड़ में आगे रखना है। उनका स्पष्ट मानना है कि वर्तमान समय AI का है, इसलिए सरकारी स्कूलों के बच्चे तकनीक के मामले में किसी से पीछे नहीं रहने चाहिए। इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने आगामी सत्र से स्कूल में रोबोटिक्स और आधुनिक तकनीकी शिक्षा शुरू करने के लिए संबंधित विभाग को पत्र लिखा है। राज्य स्तरीय पुरस्कार मिलने की खबर पर वह भावुक हो जाते हैं और बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 2024 में इस पुरस्कार के लिए अपने किए गए विकास कार्यों का पूरा विवरण भेजकर आवेदन किया था, जिसके बाद उच्चस्तरीय मूल्यांकन समिति ने उनके स्कूल का निरीक्षण कर इस सम्मान के लिए चुना। स्कूल की छात्रा कल्पना और एकता ने बताया कि प्रिंसिपल के आने के बाद से विद्यालय में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं और अब उन्हें किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता है।


















