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प्रोटीन और फाइबर से भरपूर मोठ की दाल के फायदे, पेट देर तक रहेगा भराउत्तराखंड
19 सित॰ 2026, 9:29 pm (1 घंटे पहले)· 0

प्रोटीन और फाइबर से भरपूर मोठ की दाल के फायदे, पेट देर तक रहेगा भरा

दैनिक भोजन में अरहर या मूंग के मुकाबले कम इस्तेमाल होने वाली मोठ की दाल पोषण का बेहतरीन स्रोत है। इसमें मौजूद प्रोटीन, फाइबर, आयरन और मैग्नीशियम मांसपेशियों को मजबूती देने और भूख नियंत्रित रखने में मदद करते हैं।

भारतीय थाली में दालों का नियमित रूप से उपयोग किया जाता है, जहाँ अरहर, मूंग और मसूर जैसी दालें सबसे आम हैं। हालांकि, दालों की विस्तृत सूची में मोठ की दाल एक ऐसा अनाज है जिसे अक्सर दैनिक खानपान में कम जगह मिलती है। आकार में अपेक्षाकृत काफी छोटी दिखने वाली यह दाल पोषक तत्वों के मामले में बेहद समृद्ध मानी जाती है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, प्रचुर फाइबर के साथ-साथ आयरन और मैग्नीशियम जैसे आवश्यक खनिज मौजूद होते हैं, जो समग्र शारीरिक स्वास्थ्य के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

मांसपेशियों के निर्माण और मरम्मत में प्रोटीन की भूमिका

ऋषिकेश के आयुष चिकित्सक डॉ. राजकुमार के अनुसार, मोठ की दाल में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध होता है, जो मानव शरीर के बुनियादी विकास के लिए बेहद आवश्यक माना जाता है। प्रोटीन शरीर के ऊतकों और मांसपेशियों को सुदृढ़ रखने में प्राथमिक भूमिका निभाता है। इसके अलावा, यह विभिन्न आंतरिक शारीरिक क्रियाओं को सही ढंग से संचालित करने में सहायक होता है। जो लोग अपने दैनिक भोजन में प्रोटीन का अनुपात बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए विभिन्न प्रकार की पारंपरिक दालों को अपनी थाली में शामिल करना पोषण के दृष्टिकोण से काफी लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

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भूख नियंत्रण और वजन प्रबंधन में फाइबर का असर

अक्सर कई लोगों को भोजन समाप्त करने के कुछ ही समय बाद पुनः भूख का अहसास होने लगता है, जिससे वे बार-बार खाने की आदत का शिकार हो जाते हैं। डॉ. राजकुमार स्पष्ट करते हैं कि ऐसी स्थिति में उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देना एक प्रभावी समाधान हो सकता है। मोठ की दाल में घुलनशील और अघुलनशील फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। यह फाइबर पाचन के दौरान आंतों में भोजन के अवशोषण को धीमा कर देता है, जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है। इस निरंतर तृप्ति के कारण अवांछित स्नैकिंग तथा बार-बार कुछ न कुछ खाने की तीव्र इच्छा स्वतः नियंत्रित हो जाती है।

पाचन तंत्र को सहारा और सेवन का सही तरीका

पर्याप्त मात्रा में फाइबर का सेवन आंतों की सुचारु कार्यप्रणाली और बेहतर पाचन के लिए जरूरी होता है। जब पाचन तंत्र को संतुलित फाइबर मिलता है, तो वह अपशिष्ट को बाहर निकालने और पोषक तत्वों को अवशोषित करने में अधिक दक्षता दिखाता है। यदि मोठ की दाल को अच्छी तरह उबालकर और पकाकर खाया जाए, तो यह रोजमर्रा के आहार का एक अत्यंत पौष्टिक घटक बन जाती है। हालांकि, जिन लोगों को दालों के सेवन से गैस, पेट फूलने या अपच जैसी पेट संबंधी असुविधाएं होती हैं, उन्हें शुरुआत में इसकी बहुत थोड़ी मात्रा से सेवन आरंभ करना चाहिए ताकि शरीर धीरे-धीरे इसे पचाने के अनुकूल हो सके।

आयरन और मैग्नीशियम से मिलने वाला पोषण

मैक्रोन्यूट्रिएंट्स के अलावा, मोठ की दाल सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे आयरन और मैग्नीशियम का भी एक बढ़िया माध्यम है। मानव शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए आयरन की मौजूदगी अनिवार्य होती है, जो रक्त में ऑक्सीजन के परिवहन को संभव बनाता है। वहीं, दूसरी ओर मैग्नीशियम शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रियाओं, तंत्रिका तंत्र की गतिविधियों और ऊर्जा उत्पादन के कई कार्यों में अनिवार्य सहभागिता निभाता है। इस तरह यह छोटी सी दाल संपूर्ण स्वास्थ्य की दृष्टि से थाली का एक संतुलित और उपयोगी हिस्सा साबित होती है।

सवाल-जवाब

मोठ की दाल में कौन-कौन से मुख्य पोषक तत्व पाए जाते हैं?
मोठ की दाल में प्रोटीन, प्रचुर फाइबर, आयरन, मैग्नीशियम और कई अन्य आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं।
बार-बार भूख लगने की समस्या में मोठ की दाल कैसे मदद करती है?
इसमें मौजूद फाइबर पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस कराता है, जिससे बार-बार खाने की इच्छा नियंत्रित होती है।
शरीर में प्रोटीन और आयरन का क्या मुख्य कार्य है?
प्रोटीन मांसपेशियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है, जबकि आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए जरूरी होता है।
यदि दाल खाने से गैस या अपच की शिकायत हो तो क्या करना चाहिए?
ऐसे लोगों को मोठ की दाल अच्छी तरह पकाकर खानी चाहिए और शुरुआत बहुत कम मात्रा से करनी चाहिए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·14 मिनट पहले

यह स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी जानकारी मुख्यधारा के मनोरंजन और लाइफस्टाइल ट्रेंड्स में तेजी से जगह बना रही है। फिटनेस और वेलनेस अब सेलिब्रिटी संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुके हैं, ऐसे में इस तरह की खानपान संबंधी रिपोर्ट्स पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही हैं। आने वाले समय में खानपान और सस्टेनेबल डाइट पर आधारित कंटेंट का दायरा और बढ़ेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·34 मिनट पहले

मोठ की दाल पर यह स्वास्थ्य रिपोर्ट पारंपरिक अनाजों और कृषि उत्पादों के प्रति उपभोक्ता प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत देती है। वर्तमान में जब शहरी उपभोक्ता सुपरफूड्स और उच्च प्रोटीन विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब इस प्रकार की कम उपयोग होने वाली फसलों का दैनिक आहार में आना खाद्य अर्थव्यवस्था और कृषि दोनों के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यह रुझान भविष्य में प्रीमियम और पारंपरिक कृषि उपज की मांग को नया आकार दे सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·33 मिनट पहले

रविकेश गुप्ता के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह देखना महत्वपूर्ण है कि कैसे पारंपरिक फसलों का यह पुनरुत्थान ग्रामीण अर्थव्यवस्था और फसल विविधीकरण को सीधे प्रभावित करता है। जब उपभोक्ता पोषण और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए ऐसी उपेक्षित किस्मों को अपनाते हैं, तो कृषि बाजारों में इनकी मांग बढ़ती है। यह बदलाव किसानों को जलवायु-अनुकूल और कम पानी की खपत वाली फसलों की ओर प्रेरित कर सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला दोनों मजबूत होती हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·37 मिनट पहले

यह स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ा आलेख खानपान में विविधता के महत्व को रेखांकित करता है। यद्यपि यह सीधे तौर पर अपराध या अदालत से संबंधित नहीं है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में मिलावटखोरी और खाद्य सुरक्षा जैसे कानूनी मामलों से इसका अप्रत्यक्ष जुड़ाव बनता है। भविष्य में ऐसे लेखों के साथ खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े विधिक पहलुओं को शामिल करना और अधिक प्रासंगिक होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·37 मिनट पहले

यह आलेख खानपान के पारंपरिक विकल्पों से आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में पोषण सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य की नीति पर गहराई से विचार करने की मांग करता है। राज्य के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में कुपोषण से निपटने के लिए ऐसी पौष्टिक दालों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और मिड-डे मील जैसी योजनाओं से जोड़ना एक दूरदर्शी कदम होगा। नीति निर्धारकों को यह देखना होगा कि स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली इन फसलों को उचित बाजार मिले और उपभोक्ताओं तक इनकी पहुँच आसान हो, ताकि खाद्य सुरक्षा का दायरा केवल अनाज तक सीमित न रहकर पोषण तक पहुँचे।

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