उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में विगत तीन दिनों से लगातार जारी मूसलाधार बारिश ने नदी-नालों के प्रवाह और स्वरूप को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। जो छोटे गधेरे और नदियां ग्रीष्म काल के दौरान पूरी तरह सूख जाते थे, वे आजकल जल के तीव्र वेग के साथ बहते दिखाई दे रहे हैं। इसी क्रम में नैनीताल जिले की प्रसिद्ध उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी भी इन दिनों पूरे उफान पर है। कैंची धाम आश्रम के समीप शिप्रा नदी का यह रौद्र और विशाल रूप सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है। नदी की गरजती धारा और तेज बहाव को देखकर स्थानीय निवासी और दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु पूरी तरह स्तब्ध हैं।
कैंची धाम के समीप जलस्तर और सुरक्षा की स्थिति
पहाड़ों पर हुई व्यापक वर्षा के कारण शिप्रा नदी के जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है। कैंची धाम क्षेत्र में नदी के उफान को देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक और पर्यटक एकत्रित हो रहे हैं। यद्यपि नदी का वेग अत्यंत तीव्र है, फिर भी राहत की बात यह है कि फिलहाल कैंची धाम तथा इसके आसपास की बस्तियों में किसी भी प्रकार के जान-माल के नुकसान की सूचना प्राप्त नहीं हुई है। कैंची धाम का प्रसिद्ध मंदिर परिसर पूरी तरह सुरक्षित है। आमतौर पर शांत और सीमित जलधारा के रूप में बहने वाली इस नदी के अचानक विकराल रूप धारण कर लेने से लोगों में कौतूहल और आश्चर्य का वातावरण बना हुआ है। सुरक्षा के दृष्टिकोण से स्थानीय प्रशासन भी तटीय इलाकों पर नजर बनाए हुए है।
भवाली से उद्गम और 'उत्तरवाहिनी' शिप्रा का भौगोलिक महत्व
नैनीताल शहर से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भवाली क्षेत्र से शिप्रा नदी का निकास होता है। इस नदी की सबसे अनूठी और मुख्य भौगोलिक विशेषता इसका 'उत्तरवाहिनी' होना है। सामान्यतः भारतीय उपमहाद्वीप की अधिकांश नदियां उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की ओर अथवा पूर्व व पश्चिम की तरफ प्रवाहित होती हैं। इसके विपरीत, शिप्रा नदी दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बहती है, जिसके कारण धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इसका महत्व काफी बढ़ जाता है। इस नदी का मुख्य उद्गम स्थल भवाली के समीप स्थित गागर के सघन जंगलों में माना जाता है। पहाड़ियों से निकलने वाली छोटी-छोटी प्राकृतिक जलधाराएं आपस में मिलकर शिप्रा नदी का आकार ग्रहण करती हैं। भवाली से प्रवाहित होते हुए यह नदी सुप्रसिद्ध कैंची धाम आश्रम के बगल से गुजरती है और आगे चलकर खैरना नामक स्थान पर कोसी नदी में विलीन हो जाती है।
1916 की खोज, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजस्व रिकॉर्ड की स्थिति
स्थानीय निवासियों और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार शिप्रा नदी का इतिहास अत्यंत समृद्ध और प्राचीन रहा है। भवाली नगरपालिका के पूर्व चेयरमैन संजय वर्मा के अनुसार, इस नदी की आधिकारिक खोज का उल्लेख वर्ष 1916 के ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है। यद्यपि उनका यह भी कहना है कि वर्तमान सरकारी राजस्व नक्शों में शिप्रा नदी की स्पष्ट स्थिति और सीमाओं को लेकर कुछ अस्पष्टता बनी हुई है। नक्शों में विसंगतियों के बावजूद, यह नदी सदियों से भवाली नगर, कैंची धाम और आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए मुख्य जीवनदायिनी के रूप में जल आपूर्ति का कार्य करती रही है।
प्रदूषण का संकट: जब जीवनदायिनी तब्दील हो गई गंदे नाले में
वर्तमान में बारिश के बाद उफान मारकर बहती शिप्रा नदी को देखकर कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि कुछ वर्ष पूर्व यह नदी अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर संकट से गुजर रही थी। अनियंत्रित शहरीकरण, कचरा फेंकने की गतिविधियों और सीवर का दूषित पानी सीधे नदी में गिरने के कारण इसका स्वरूप एक गंदे नाले जैसा होने लगा था। भवाली शहर में समुचित सीवर ट्रीटमेंट व्यवस्था न होने के कारण लंबे समय तक रिहायशी मकानों का दूषित पानी सीधे शिप्रा में बहता रहा। इससे नदी का जल अत्यंत दूषित हो गया था और गर्मी के दिनों में इसमें केवल गंदगी ही दिखाई देती थी।
शिप्रा कल्याण समिति का गठन और 7 प्रमुख जल रिचार्ज जोन
वर्ष 2017 में नदी की इस शोचनीय दशा को देखते हुए स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने एकजुट होकर शिप्रा कल्याण समिति का गठन किया। समिति के अध्यक्ष जगदीश नेगी बताते हैं कि नदी को पुनर्जीवित करने के लिए इसके जलागम क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के दौरान शिप्रा नदी के कुल 7 प्रमुख जल रिचार्ज जोन चिह्नित किए गए। इन रिचार्ज क्षेत्रों से निकलने वाली छोटी-छोटी प्राकृतिक धाराएं ही शिप्रा को वर्ष भर जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
1000 खालों का निर्माण और एएनआर विधि से वनीकरण
शिप्रा कल्याण समिति और वन विभाग के संयुक्त प्रयासों से नदी के रिचार्ज जोन से जुड़े पहाड़ी जंगलों में लगभग 1000 खाल तैयार किए गए। ये खाल बरसात के पानी को बहकर बेकार होने से रोकते हैं और जल को जमीन के भीतर गहराई तक पहुंचाकर प्राकृतिक जलस्रोतों को रिचार्ज करते हैं। इसके अतिरिक्त, जंगलों को आग से सुरक्षित रखकर ANR (Assisted Natural Regeneration) तकनीक का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया। इस विधि के तहत नए पौधे रोपने के बजाय जंगलों को मानवीय हस्तक्षेप और दावानल से बचाया जाता है, जिससे दशकों पूर्व काटे गए वृक्षों के ठूंठों और जड़ों से स्वाभाविक रूप से नई कोपलें फूटने लगती हैं। इस अनूठी तकनीक के माध्यम से बांज, काफल, बुरांश, अयार और मेहल जैसी पारंपरिक पहाड़ी प्रजातियों के लगभग 40 हजार पेड़ों को प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित करने में सफलता मिली है।
20 किलोमीटर का सफर, 3 किलोमीटर का सूखा और 13.45 करोड़ की योजना
उद्गम स्थल गागर के जंगलों से लेकर खैरना में कोसी नदी के संगम तक शिप्रा नदी की कुल लंबाई लगभग 20 किलोमीटर है। हालांकि, जल संरक्षण की चुनौतियों के कारण मानसून के कुछ महीने बीतते ही उद्गम क्षेत्र से लेकर शुरुआती 3 किलोमीटर का हिस्सा पूरी तरह सूख जाता है। यही कारण है कि शिप्रा कई स्थानों पर केवल बरसाती नदी बनकर रह जाती है। इस संकट से निपटने के लिए वर्ष 2018 में उत्तराखंड सरकार द्वारा शिप्रा के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए लगभग 13 करोड़ 45 लाख रुपये की एक व्यापक योजना स्वीकृत की गई थी। उस दौरान वन विभाग तथा अन्य सहयोगी विभागों की ओर से लगभग 2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च करके सेनेटोरियम और कुलेठी के जंगलों में जल संरक्षण के अनेक कार्य संपन्न कराए गए थे।
घोड़ाखाल जलागम में हालिया कार्य और स्थायी समाधान की आवश्यकता
शिप्रा के संरक्षण की दिशा में चालू वर्ष के दौरान भी महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। शिप्रा कल्याण समिति की पहल पर सिंचाई विभाग के उच्च अधिकारियों ने शिप्रा के सबसे बड़े जलग्रहण क्षेत्र घोड़ाखाल का स्थलीय निरीक्षण किया। इस निरीक्षण के पश्चात घोड़ाखाल क्षेत्र में लगभग 10 लाख रुपये की लागत से विभिन्न जल संरक्षण कार्य स्वीकृत किए गए, जिनमें चेक डैम का निर्माण और नए खालों की खुदाई शामिल है। हालांकि, समिति के अध्यक्ष जगदीश नेगी का मानना है कि केवल जल संरक्षण संरचनाएं बनाने से नदी पूरी तरह नहीं बचेगी। जब तक भवाली नगर में ठोस सीवर ट्रीटमेंट व्यवस्था लागू नहीं की जाती और दूषित जल का नदी में गिरना पूरी तरह बंद नहीं होता, तब तक शिप्रा का स्थायी संरक्षण अधूरा रहेगा।
बाबा नीम करौली का चमत्कार: जल से घी बनने की पौराणिक कथा
शिप्रा नदी का धार्मिक महत्व न केवल इसके उत्तरवाहिनी होने से है, बल्कि इसका गहरा संबंध कैंची धाम के संस्थापक परम पूज्य बाबा नीम करौली से भी जुड़ा हुआ है। कैंची धाम से जुड़े भुवन तिवारी इस संदर्भ में एक सुप्रसिद्ध लोक मान्यता का उल्लेख करते हैं। मान्यता के अनुसार, कैंची धाम आश्रम के वार्षिक स्थापना दिवस समारोह के दौरान विशाल भंडारे का आयोजन चल रहा था। अचानक रसोई में मालपुए तलने के लिए रखा देसी घी समाप्त हो गया। जब सेवकों ने यह बात बाबा नीम करौली को बताई, तो बाबा ने उन्हें तत्काल बर्तन लेकर नीचे बहती शिप्रा नदी से पानी भरकर लाने का आदेश दिया।
बाबा के निर्देशानुसार सेवक नदी से जल भरकर लाए और जैसे ही उस जल को कड़ाही में डाला गया, वह चमत्कारिक रूप से शुद्ध देसी घी में परिवर्तित हो गया। उस घी से भंडारे के सभी मालपुए सफलतापूर्वक बनाए गए। बाद में जब बाजार से खरीदा गया घी आश्रम पहुंचा, तो बाबा नीम करौली ने सेवकों से कहा कि माता शिप्रा से तीन कनस्तर घी उधार लिया गया था, जिसे सम्मानपूर्वक लौटाना अति आवश्यक है। इसके पश्चात बाबा के आदेश पर तीन कनस्तर देसी घी ले जाकर शिप्रा नदी की धारा में प्रवाहित कर दिया गया। यह कथा आज भी कैंची धाम आने वाले श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है।
प्रशासनिक समन्वय और शिप्रा के भविष्य का रोडमैप
वर्तमान समय में भारी बारिश ने भले ही शिप्रा नदी को उसका पुराना उफनता रूप लौटा दिया हो, लेकिन इसे सदा नीरा बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक प्रशासनिक और सामाजिक प्रयास जारी हैं। उत्तराखंड का सिंचाई विभाग, जल संस्थान, वन विभाग और स्थानीय नगर निकाय मिलकर नदी के संरक्षण की नई कार्ययोजनाओं पर काम कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर शिप्रा कल्याण समिति जैसी संस्थाएं निरंतर नदी की सफाई, प्लास्टिक कचरा हटाने और वृक्षारोपण अभियानों का संचालन कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून जल का उचित संचयन किया जाए और सीवर प्रदूषण पर पूरी तरह रोक लगे, तो उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी पूरे वर्ष अपनी पावन धारा से नैनीताल जिले को समृद्ध बनाती रहेगी।





















