बांग्लादेशी लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता तस्लीमा नसरीन की लगभग 19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पश्चिम बंगाल वापसी हुई है। इस अवसर पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उनका आत्मीय स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य प्रशासन संविधान के मूल्यों, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तस्लीमा नसरीन को राज्य में पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन देते हुए इस बात पर बल दिया कि राज्य में बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और विचारकों को भयभीत करने या डराने-धमकाने का युग अब समाप्त हो चुका है। तस्लीमा नसरीन की यह वापसी राज्य के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में आए बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है।
लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मुख्यमंत्री का वक्तव्य
सेक्युलर मिशन द्वारा आयोजित एक संयुक्त कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के प्रति सरकार के रुख को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था के आगमन के साथ पश्चिम बंगाल में संवैधानिक मर्यादाओं, लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों को मजबूती मिली है। मुख्यमंत्री के अनुसार, "नई सरकार आने के बाद बंगाल में संविधान, लोकतंत्र, बोलने की आजादी और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हो रही है।" उन्होंने कहा कि अब कोई भी तत्व किसी लेखक, विचारक या नागरिक को डरा नहीं सकता, गिरफ्तार नहीं कर सकता और न ही उनकी आवाज़ को दबा सकता है। पूर्ववर्ती दौर की भयभीत करने वाली परिस्थितियाँ अब पूरी तरह पुरानी बात बन चुकी हैं।
तस्लीमा नसरीन के लिए सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तस्लीमा नसरीन की साहित्यिक यात्रा और उनके व्यापक पाठक वर्ग की सराहना की। उन्होंने कहा कि एक प्रख्यात लेखिका के रूप में उनकी रचनाएँ बड़े पैमाने पर पढ़ी जाती हैं और उनके विचार समाज को नई दिशा देते हैं। मुख्यमंत्री ने उल्लेख किया कि तस्लीमा नसरीन ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक एवं सामाजिक व्यवस्था में आए सकारात्मक परिवर्तनों को महसूस किया है। उन्होंने लेखिका को आश्वस्त किया कि जब भी उनका मन करे, वे बिना किसी संकोच या भय के पश्चिम बंगाल आ सकती हैं। मुख्यमंत्री ने जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि तस्लीमा नसरीन को राज्य में संपूर्ण सुरक्षा प्रदान करना मुख्यमंत्री के रूप में उनका प्राथमिक कर्तव्य है।
दो दशकों के संघर्ष के बाद कोलकाता वापसी पर तस्लीमा नसरीन की प्रतिक्रिया
लगभग दो दशकों के लंबे निर्वासन के बाद कोलकाता की धरती पर कदम रखने के बाद तस्लीमा नसरीन ने अपने उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय बाद कोलकाता लौटना इस मौलिक सत्य को सिद्ध करता है कि अन्याय की अवधि भले ही लंबी हो सकती है, लेकिन वह कभी स्थायी नहीं हो सकती। उन्होंने अपनी चर्चित टिप्पणी में कहा, "नाइंसाफी लंबी तो हो सकती है, लेकिन स्थायी नहीं।" तस्लीमा नसरीन ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को स्पष्ट करते हुए दोहराया कि उनका संपूर्ण जीवन और लेखन सदैव महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए समर्पित रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों की रक्षा की एक निष्पक्ष लड़ाई है। इससे पूर्व कोलकाता पहुँचने पर उन्होंने अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हुए कहा था कि यहाँ आकर उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे वे अपने ही देश वापस लौट आई हैं।
1994 से 2007 का घटनाक्रम: बांग्लादेश और बंगाल से निर्वासन का इतिहास
तस्लीमा नसरीन का जीवन लंबे समय से वैचारिक संघर्षों और निर्वासनों से भरा रहा है। वर्ष 1994 में अपनी बेबाक लेखनी और धर्म से जुड़े विभिन्न विषयों पर निर्भीक विचारों के कारण उन्हें कट्टरपंथी संगठनों से जान से मारने की गंभीर धमकियाँ मिली थीं। इन धमकियों और सुरक्षा संकट के चलते उन्हें अपना गृह देश बांग्लादेश छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था। तत्पश्चात वर्ष 2007 में राजनीतिक और सामाजिक दबावों के कारण उन्हें पश्चिम बंगाल भी छोड़ना पड़ा था। निर्वासित जीवन की कठिन परिस्थितियों का स्मरण करते हुए तस्लीमा नसरीन ने एक ऐसे समावेशी समाज और भविष्य की आशा व्यक्त की जहाँ किसी भी लेखक, कवि या विचारक को अपने स्वतंत्र विचार प्रकट करने की कीमत चुकाने के लिए अपने देश या निवास स्थान से विस्थापित न होना पड़े।



















