भारतीय शेयर बाजार में सक्रिय विदेशी फंड्स और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIF) की पारदर्शिता तथा उनके नियमन को लेकर दायर जनहित याचिका पर देश की शीर्ष अदालत में गहन बहस देखने को मिली। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा दाखिल इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले याचिकाकर्ता की कानूनी स्थिति और सीधे न्यायपालिका का रुख करने के औचित्य पर कड़े सवाल उठाए। अदालत का कहना था कि देश के नीतिगत विषयों पर चर्चा के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों के पास संसद से बड़ा कोई मंच नहीं होता, ऐसे में एक सांसद का सीधे जनहित याचिका के जरिए कोर्ट आना कई सवाल पैदा करता है।
संसद के मंच को छोड़कर कोर्ट आने पर शीर्ष अदालत के तीखे सवाल
सुनवाई की शुरुआत में ही पीठ ने सांसद के तौर पर जनहित याचिका दाखिल करने की जरूरत पर आपत्ति जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि वित्तीय नियमों या नीतिगत मामलों में कोई कमी है या व्यापक विमर्श की जरूरत है, तो संसद का पटल ही सबसे उपयुक्त और प्राथमिक स्थान है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय की गुहार लगाने के मामले में एक सामान्य नागरिक और जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि के दायरे में साफ अंतर होता है। आम जनता के पास अपनी आवाज उठाने के साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन एक संसद सदस्य के पास नीतिगत असंतोष जताने, कानून बनवाने और व्यवस्था पर सवाल खड़े करने के कई लोकतांत्रिक माध्यम उपलब्ध रहते हैं।
प्रशांत भूषण का पक्ष, सांसद होने से नागरिक अधिकार खत्म नहीं होते
पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अदालत के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि संसद सदस्य होने के बावजूद याचिकाकर्ता देश की नागरिक हैं और उनके मौलिक अधिकार खत्म नहीं हो जाते। भूषण ने दलील दी कि महुआ मोइत्रा पूर्व में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय क्षेत्र में सेवाएं दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें जटिल वित्तीय नियमों, विदेशी प्रवाह और निवेश के तकनीकी पहलुओं की गहरी समझ है।
वरिष्ठ वकील ने बाजार के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारतीय पूंजी बाजार में अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIF) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का संयुक्त निवेश लगभग 100 लाख करोड़ रुपये के विशाल स्तर पर पहुंच चुका है। इतनी बड़ी राशि देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी होने के कारण इन फंडों के वास्तविक लाभार्थियों और अंतिम मालिकों (बेनिफिशियल ओनर्स) की पहचान सार्वजनिक होना अनिवार्य है। भूषण ने दलील दी कि पूर्व में अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में निवेश करने वाले कुछ विदेशी फंड्स के वास्तविक मालिकों की पड़ताल करने में पूंजी बाजार नियामक सेबी (SEBI) को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। उन्होंने जोर दिया कि इस कानूनी पहल का असली मकसद देश के करोड़ों छोटे और खुदरा निवेशकों के पैसों की हिफाजत करना है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का पलटवार और निजी निवेश का पेंच
दूसरी तरफ केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया और पूरी याचिका को विशुद्ध राजनीतिक बयानबाजी करार दिया। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को याद दिलाया कि विदेशी फंड्स और उनके नियमन से जुड़े इन सभी पहलुओं पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की गई एक विशेष विशेषज्ञ समिति विस्तार से विचार कर चुकी है, इसलिए इसी मुद्दे को बार-बार जनहित के नाम पर उठाना उचित नहीं है।
बहस के दौरान जब पीठ ने पूछा कि जिन खुदरा निवेशकों के हितों की रक्षा की दुहाई दी जा रही है, वे खुद अपनी शिकायत लेकर अदालत क्यों नहीं आए, तो वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ता महुआ मोइत्रा स्वयं भी शेयर बाजार में एक निवेशक हैं। इस बयान पर सॉलिसिटर जनरल ने तुरंत कानूनी एतराज जताया। तुषार मेहता ने तर्क दिया कि यदि कोई व्यक्ति अपने निजी निवेश या व्यक्तिगत हितों को ध्यान में रखकर अदालत पहुंच रहा है, तो उस मामले को किसी भी स्थिति में जनहित याचिका (PIL) के दायरे में नहीं रखा जा सकता। इस तीखी नोकझोंक के बाद अब बाजार के जानकारों और कानूनी विशेषज्ञों की नजरें इस याचिका के भविष्य और कोर्ट के अगले रुख पर टिकी हैं।



















