ब्रिक्स सम्मेलन के सिलसिले में भारत पहुंचे ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति भवन का दौरा किया। उनकी यह यात्रा केवल उच्च स्तरीय राजनीतिक बैठकों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उनका ध्यान राष्ट्रपति भवन के उस ऐतिहासिक हिस्से पर भी गया जिसे पहले ईरानी हॉल कहा जाता था और जो अब अशोक मंडप के नाम से जाना जाता है। इस हॉल की छत पर करीब 1810 की एक भव्य फारसी पेंटिंग आज भी सुरक्षित है। यह कलाकृति कजार वंश के शासक फतह अली शाह को शिकार करते हुए चित्रित करती है। इस स्थल पर राष्ट्रपति का जाना इस बात का प्रतीक है कि भारत और ईरान के बीच कूटनीतिक और आर्थिक चर्चाओं के अलावा सदियों पुराना गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव भी रहा है। इस प्रकार ब्रिक्स की राजनीतिक हलचल के बीच इतिहास ने भी इस दौरे पर अपनी एक अनूठी उपस्थिति दर्ज कराई।
अशोक मंडप का नामकरण और वास्तुकला
राष्ट्रपति भवन का यह प्रमुख कक्ष पहले स्टेट बॉलरूम के रूप में पहचाना जाता था, जिसका नाम बदलकर साल 2024 में अशोक मंडप कर दिया गया। हालांकि नाम बदलने के बावजूद इस कक्ष की सजावट में भारतीय और फारसी कला का अनूठा मिश्रण आज भी साफ झलकता है। इसी शानदार हॉल की छत पर फतह अली शाह की विशालकाय पेंटिंग स्थापित है। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, इस उत्कृष्ट कलाकृति को कजार दरबार के प्रख्यात चित्रकार मिहर अली ने तैयार किया था। इस पेंटिंग में ईरान के शासक को उनके 22 पुत्रों के साथ शिकार के दौरान दिखाया गया है। इस कलाकृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस बड़े कमरे के किसी भी कोने से देखने पर ऐसा आभास होता है कि शासक की निगाहें सीधे दर्शक पर टिकी हुई हैं।
1810 की फारसी पेंटिंग का राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने का सफर
इस अनूठी पेंटिंग के भारत पहुंचने का इतिहास भी बेहद दिलचस्प और रोचक है। मूल रूप से फतह अली शाह ने इस कीमती कलाकृति को ब्रिटेन के राजा जॉर्ज चतुर्थ को एक शाही तोहफे के रूप में भेंट किया था। समय के साथ यह पेंटिंग लंदन की इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी से होती हुई भारत लाई गई। वायसराय लॉर्ड इरविन के कार्यकाल के दौरान लगभग 1929 में इसे तत्कालीन वायसराय हाउस यानी मौजूदा राष्ट्रपति भवन के स्टेट बॉलरूम की छत पर लगाया गया। इसके बाद इस हॉल की भव्यता को और बढ़ाने के लिए लेडी विलिंगडन ने इतालवी कलाकार टोमासो कोलोनेलो को आमंत्रित किया। उन्होंने 12 स्थानीय भारतीय कलाकारों के सहयोग से छत और दीवारों पर जंगल तथा शिकार के दृश्यों को और विस्तार दिया। इस हॉल में फारसी भाषा के शिलालेख और शाही जुलूसों से जुड़े चित्रों को भी शामिल किया गया, जबकि यहां लगे बेल्जियम के झूमर इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं।
फतह अली शाह और कजार काल की कला
फतह अली शाह ने 1797 से 1834 तक ईरान की सत्ता संभाली थी और वे कजार राजवंश के दूसरे शाह थे। उनके शासनकाल में दरबारी संस्कृति और शाही कला को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला था। राष्ट्रपति भवन में मौजूद यह पेंटिंग उसी दौर की उत्कृष्ट कला का एक जीवंत उदाहरण पेश करती है। इस कलाकृति में शासक की भव्यता और शानो-शौकत को प्रमुखता से उभारा गया है। इसमें दिखाया गया शिकार का दृश्य केवल मनोरंजन मात्र नहीं है, बल्कि उस समय के शाही वैभव और राजनीतिक प्रभुत्व की मजबूत छवि को भी उजागर करता है। यही मुख्य कारण है कि आज यह पेंटिंग भारत और ईरान के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संपर्कों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अमूल्य निशानी मानी जाती है।
मसूद पेजेश्कियान की इस ऐतिहासिक स्थल की यात्रा का महत्व
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का अशोक मंडप का दौरा कूटनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच गहन चर्चा चल रही थी। ब्रिक्स सम्मेलन की बैठकों के दौरान मसूद पेजेश्कियान ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। इन वार्ताओं में द्विपक्षीय संबंधों के विस्तार के अलावा विभिन्न क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया कि राष्ट्रपति ने अपने दौरे के दौरान राष्ट्रपति भवन की इस फारसी कला का बारीकी से अवलोकन किया। यह यात्रा इस सच्चाई को रेखांकित करती है कि भारत और ईरान के रिश्तों की नींव केवल समकालीन जरूरतों पर नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य, कला और वास्तुकला के साझा इतिहास पर टिकी हुई है।
ब्रिक्स बैठकों के बीच इतिहास और कूटनीति का मेल
वर्तमान समय में भारत और ईरान के संबंधों में ऊर्जा सुरक्षा, आपसी व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषय अत्यधिक महत्वपूर्ण बने हुए हैं। इसमें चाबहार बंदरगाह दोनों देशों के बीच सहयोग का एक बेहतरीन उदाहरण है। हालांकि इन आधुनिक रणनीतिक रिश्तों की पृष्ठभूमि में सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध मजबूती से खड़े हैं। मसूद पेजेश्कियान का अशोक मंडप का दौरा इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है। एक तरफ जहां ब्रिक्स के मंच पर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा पर मंथन हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति भवन की छत पर सुशोभित लगभग 200 साल पुरानी फारसी कलाकृति दोनों राष्ट्रों के साझा अतीत की कहानी बयां कर रही है। यही अनूठा संयोजन इस राजकीय दौरे को एक सामान्य औपचारिक मुलाकात से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।



















