संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की हालिया बैठक में अफगानिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य, सुरक्षा चुनौतियों, मानवीय संकटों और मानवाधिकारों के मौजूदा हालातों पर विस्तार से चर्चा की गई। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पार्वथनेनी हरीश ने इस मंच पर अपने विचार रखते हुए सबसे पहले इस महीने परिषद की अध्यक्षता संभालने के लिए फ्रांस की सराहना की और अपने संबोधन का अवसर देने के लिए आभार जताया। उन्होंने अफगानिस्तान के लिए मिशन की प्रमुख और डिप्टी एसआरएसजी (राजनीतिक) जॉर्गेट गैगनन द्वारा दी गई विस्तृत रिपोर्ट का भी उल्लेख किया और सिविल सोसाइटी की ओर से साझा की गई जानकारियों को भी महत्वपूर्ण बताया।
सीमाओं से परे है सदियों पुराना रिश्ता
पार्वथनेनी हरीश ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि एक पड़ोसी के रूप में भारतीयों और अफगानों के रिश्ते आधुनिक मानचित्रों और राजनीतिक सीमाओं के अस्तित्व में आने से भी बहुत पुराने हैं। ऐतिहासिक रूप से काबुल से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानी इलाकों तक जाने वाले मार्ग केवल व्यापारिक गलियारे नहीं थे, बल्कि वे विचारों, ज्ञान, विश्वास और आस्था के आदान-प्रदान का माध्यम भी हुआ करते थे। वक्त के साथ इन क्षेत्रों में कई बड़े साम्राज्य आए और अपनी नियति पूरी कर के मिट गए, लेकिन भारत और अफगानिस्तान के आम नागरिकों के बीच की दोस्ती और भाईचारे का धागा कभी कमजोर नहीं पड़ा। यही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भावना इस राष्ट्र के प्रति भारत की कूटनीतिक नीति की मजबूत नींव है। भारत हमेशा से एक ऐसे शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध अफगानिस्तान के पक्ष में रहा है, जो वहां के टिकाऊ विकास को सुनिश्चित कर सके। इसी सोच के तहत भारत दोहा वर्किंग ग्रुप की बैठकों में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है, मजबूत द्विपक्षीय विकास साझेदारियों को आगे बढ़ा रहा है और क्षेत्रीय स्तर पर हरसंभव प्रयास कर रहा है।
विकास और मानवीय सहायता की अटूट प्रतिबद्धता
भारतीय प्रतिनिधि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस विजन को भी दोहराया जिसके तहत एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित यूरेशिया के निर्माण का लक्ष्य अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता से गहराई से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांतों में फैली 500 से अधिक विकास साझेदारी परियोजनाओं के माध्यम से भारत वहां के निर्माण और सुधार कार्यों में लगातार योगदान दे रहा है। अफगान नागरिकों तक सहायता पहुंचाने का यह सिलसिला आगे भी पूरी प्रतिबद्धता के साथ जारी रहेगा। जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के साथ-साथ अफगान रेड क्रिसेंट सोसाइटी जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर मैदानी स्तर पर काम कर रहा है।
बीते कुछ महीनों के दौरान अफगान मंत्रियों के भारत दौरों से दोनों पक्षों के बीच आपसी सहयोग के नए रास्ते खुले हैं। इन वार्ताओं के जरिए मानवीय सहायता, विकास परियोजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य सुरक्षा, क्षमता-निर्माण, नशीले पदार्थों की रोकथाम, खेलकूद, शिक्षा, व्यापार, यात्रा और कनेक्टिविटी जैसे अहम क्षेत्रों में बातचीत को आगे बढ़ाया गया है। यह सारी कवायद कुल 4.8 करोड़ से अधिक अफगान नागरिकों के कल्याण और विकास आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की जा रही है, जो पिछले पांच वर्षों से भारी अभाव, कठिनाइयों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की उदासीनता और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।
स्वास्थ्य क्षेत्र के संकट पर भारत की विशेष नजर
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट में अफगानिस्तान की चरमराई पब्लिक हेल्थ व्यवस्था के गंभीर संकट का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप इस साल की पहली छमाही में ही 150 स्वास्थ्य केंद्र बंद होने के लिए मजबूर हो गए हैं। इस चिंताजनक स्थिति की अनदेखी नहीं की जा सकती और अफगानिस्तान को एक बड़े मानवीय संकट से बचाने के लिए वित्तीय तथा चिकित्सीय निवेश की सख्त जरूरत है। बच्चों के टीकाकरण अभियान में सहायता देने के उद्देश्य से भारत ने पिछली तिमाही में 33 टन जीवनरक्षक वैक्सीन और उससे जुड़ी चिकित्सीय सामग्री वहां भेजी थी। इसके अलावा, इस रिपोर्टिंग अवधि के दौरान भारत ने अफगान स्वास्थ्य अधिकारियों को कई प्रकार के विशेष चिकित्सा उपकरण भी मुहैया कराए हैं। इनमें नवजात शिशुओं और बच्चों की देखभाल से जुड़े उपकरण, कार्डियोग्राफ मशीन, वेंटिलेटर, पेशेंट मॉनिटर, इलेक्ट्रोकॉटरी उपकरण, प्लास्टिक सर्जरी सेट और अन्य विशेष मेडिकल किट शामिल हैं, जो इस कठिन समय में वहां की स्वास्थ्य सेवाओं को संबल दे रहे हैं।





















