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अमेरिका की आर्थिक घेराबंदी पर ईरान का सख्त रुख, अमेरिकी प्रतिबंधों को तेहरान ने बताया बेअसरदुनिया
25 अग॰ 2026, 6:28 pm (3 घंटे पहले)· 2

अमेरिका की आर्थिक घेराबंदी पर ईरान का सख्त रुख, अमेरिकी प्रतिबंधों को तेहरान ने बताया बेअसर

अमेरिका ने ईरान के खिलाफ व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है, लेकिन तेहरान के नेताओं का मानना है कि ये उपाय पुरानी नीतियों का ही हिस्सा हैं और इन से कोई नया असर नहीं पड़ेगा।

अमेरिकी प्रशासन द्वारा ईरान के वैश्विक वित्तीय संपर्कों को निशाना बनाते हुए एक बड़े आर्थिक अभियान की शुरुआत की घोषणा की गई है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट ने जानकारी दी है कि इन नए प्रतिबंधों के दायरे में डिजिटल एसेट्स, तकनीक, सोना, विमानन और नौवहन क्षेत्र को शामिल किया गया है। साथ ही यह भी चेतावनी दी गई है कि जो भी देश ईरान के साथ वित्तीय रूप से साझेदारी जारी रखेगा, उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर दिया जाएगा।

तेहरान में प्रतिबंधों को लेकर क्या है प्रतिक्रिया

अमेरिकी वित्त मंत्री द्वारा इस कदम को एक आर्थिक डी-डे करार दिए जाने के बावजूद, तेहरान के राजनीतिक हलकों में इसका असर काफी अलग देखा जा रहा है। घोषणा के तुरंत बाद, ईरान के अर्थव्यवस्था मंत्री अली मदनिज़ादेह ने इस पूरे घटनाक्रम को पुरानी बातें दोहराने जैसा बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है क्योंकि तेहरान को पहले से ही इस प्रकार के कदमों की पूरी उम्मीद थी और इसके लिए पुख्ता योजनाएं तैयार कर ली गई थीं। इस प्रतिक्रिया के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका के पास अब ऐसा कोई नया विकल्प बचा है जिसे उसने पहले कभी आजमाया न हो।

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प्रतिबंधों का दायरा और समुद्र तथा थल मार्ग की चुनौतियां

स्कॉट बेसेन्ट ने उन देशों, बैंकों और कंपनियों के खिलाफ भी कड़े माध्यमिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है जो ईरान के साथ लगातार व्यापारिक संबंध बनाए हुए हैं। हालांकि, यह नीति अपने मूल रूप में नई नहीं है, क्योंकि ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता आ रहा है, जिसमें विदेशी कंपनियों पर लगाए जाने वाले दंड भी शामिल हैं। तेहरान के लिए असल चिंता का विषय यह है कि क्या वॉशिंगटन इस बार इन प्रतिबंधों को पहले की तुलना में अधिक सख्ती और व्यापक पैमाने पर लागू कर पाने में सफल हो पाएगा या नहीं।

अमेरिकी नौवहन नाकाबंदी के कारण ईरान की स्थिति पर पहले ही असर पड़ चुका है। इसके चलते देश की समुद्र के रास्ते होने वाली तेल निर्यात क्षमता में कमी आई है और बाहर से आने वाले सामान तथा उपकरणों को मंगाना भी कठिन हो गया है। ईरान की सीमाएं सात अलग-अलग देशों से लंबी थल सीमाओं के जरिए जुड़ी हुई हैं और उसके पास प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए इन जमीनी रास्तों का उपयोग करने का वर्षों का अनुभव है। इसके बावजूद, जमीनी रास्ते समुद्री व्यापार खासकर तेल निर्यात की जगह पूरी तरह नहीं ले सकते हैं।

चीन की प्रतिक्रिया और भू-राजनीतिक समीकरण

यदि वॉशिंगटन उन तमाम रास्तों और माध्यमों को बंद करने में कामयाब हो जाता है जो पिछले प्रतिबंधों के दौरान भी बचे रहे थे, विशेषकर वे जो चीन और ईरान के पड़ोसी देशों से जुड़े हैं, तो यह दबाव बेहद गंभीर रूप ले सकता है। हालांकि, ऐसा करना आसान नहीं होगा। चीन के विदेश मंत्रालय ने साफ तौर पर कहा है कि वह इन प्रतिबंधों का कड़ा विरोध करता है और इन्हें पूरी तरह अवैध मानता है। यदि ये प्रतिबंध विफल साबित होते हैं, तो स्कॉट बेसेन्ट की इस घोषणा से ईरान के भीतर उन धड़ों को और अधिक मजबूती मिल सकती है जो अमेरिका के साथ किसी भी तरह के समझौते के सख्त खिलाफ हैं।

कट्टरपंथी यह तर्क दे सकते हैं कि वॉशिंगटन को एक बार फिर आर्थिक दबाव का सहारा इसलिए लेना पड़ा है क्योंकि उसके पास अन्य विकल्प बहुत सीमित बचे हैं। दूसरी ओर एक नया सैन्य अभियान चलाना भारी जोखिम भरा साबित हो सकता है, जबकि वर्षों से चले आ रहे प्रतिबंध भी ईरान को अमेरिकी शर्तों के आगे झुकने पर मजबूर करने में असफल रहे हैं। इसके अलावा वॉशिंगटन ने कूटनीति के लिए भी बहुत कम गुंजाइश छोड़ी है। हालांकि पाकिस्तान और अन्य मध्यस्थ देश अभी भी बातचीत को दोबारा शुरू कराने के प्रयास में जुटे हुए हैं, लेकिन अमेरिका ने भविष्य में किसी भी सैन्य कार्रवाई से इंकार नहीं किया है। इस तरह के लगातार मिल रहे खतरों से उन ईरानी अधिकारियों की स्थिति कमजोर हो सकती है जो अमेरिका के साथ किसी समझौते के पक्ष में हैं।

युद्ध और प्रतिबंधों के बीच आम नागरिकों का संघर्ष

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही गंभीर संकट के दौर से गुजर रही थी, जहां महंगाई आसमान छू रही थी और राष्ट्रीय मुद्रा तेजी से गिर रही थी। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हवाई हमलों के साथ शुरू हुए संघर्ष के बाद हालात और ज्यादा बदतर हो चुके हैं। ईरानी मुद्रा रियाल में आई भारी गिरावट का असर देश के आम नागरिकों के जीवन पर बहुत गहराई से पड़ रहा है। आयातित वस्तुएं बेहद महंगी हो गई हैं, कारोबारियों के लिए भविष्य की योजना बनाना कठिन हो गया है और लोगों की जीवनभर की बचत का मूल्य लगातार घट रहा है। तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों के कारण सरकार की विदेशी मुद्रा तक पहुंच भी काफी सीमित हो गई है।

अपनी असली पहचान जाहिर न करने की शर्त पर नेगिन नाम की एक 34 वर्षीय महिला ने बताया कि उनकी मासिक आय अब करीब 100 डॉलर (लगभग 73 पाउंड) रह गई है। उन्होंने बातचीत में कहा कि वह न तो सिनेमा, थिएटर या संगीत कार्यक्रमों में जाती हैं, न ही किसी को उपहार देती हैं और न ही जन्मदिन की पार्टियों में शामिल होती हैं। उन्होंने कहा कि वह केवल सरकारी सब्सिडी वाउचर के सहारे ही मांस खरीद पा रही हैं, अन्यथा उनके लिए इसे खरीदना भी संभव नहीं होता।

दो बच्चों की एक गृहिणी मोना का कहना है कि युद्ध की शुरुआत से ही उनके पति बेरोजगार बैठे हैं। उन्होंने बताया कि इस बात से पूरा परिवार बेहद डरा हुआ है, खासकर कल से शुरू हुए नए प्रतिबंधों के बाद से। उनके पति पहले जहाजों पर काम किया करते थे, लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से वे काम पर नहीं लौट पाए हैं। मोना ने आगे कहा कि वे लोग अपने खर्चों को किसी तरह नियंत्रित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने सभी अतिरिक्त खर्चों और छोटे-छोटे सुखों में अनिवार्य रूप से कटौती करनी पड़ी है।

डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति और समय का खेल

ईरान का यह आकलन हो सकता है कि समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ काम कर रहा है। होर्मुज जलडममध्य में यदि आगे भी व्यवधान जारी रहता है, तो इससे कच्चे तेल और पेट्रोल की कीमतें ऊपर जा सकती हैं, अमेरिका में महंगाई बढ़ सकती है और नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। इससे तेहरान के पास नजर रखने के लिए एक स्पष्ट तारीख मिल जाती है, लेकिन अमेरिकी चुनावों के भरोसे बैठना एक बहुत बड़ा जोखिम भी साबित हो सकता है।

तब तक ईरान की अर्थव्यवस्था और भी अधिक कमजोर हो सकती है। इसके अलावा मध्यावधि चुनावों के बाद एक और बड़ी चुनौती सामने होगी। चूंकि डोनाल्ड ट्रंप 2028 में दोबारा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, इसलिए उनका यह निवर्तमान प्रशासन यह महसूस कर सकता है कि ईरान के साथ टकराव को जारी रखने और इसके वित्तीय तथा अन्य खर्चों को उठाने के मामले में उसके पास कहीं अधिक स्वतंत्रता है।

ईरान के सामने कठिन विकल्प और अनिश्चित भविष्य

ईरान के सामने इस समय दो मोर्चों पर मुश्किलें हैं। एक राजनीतिक मोर्चा वॉशिंगटन में चल रहा है और दूसरा आर्थिक मोर्चा ईरान के भीतर चल रहा है। तेल निर्यात में गिरावट, बाधित व्यापार और रियाल पर लगातार बढ़ते दबाव का हर एक महीना युद्ध समाप्त करने वाले किसी समझौते के लिए इंतजार करने को और अधिक महंगा बना देता है। इसी वजह से ईरानी नेतृत्व के सामने एक बेहद कठिन विकल्प खड़ा हो गया है।

इस समय किसी भी तरह की रियायत देना ऐसा प्रतीत हो सकता है जैसे दबाव के आगे आत्मसमर्पण कर दिया गया हो, जिससे उन कट्टरपंथियों को और बल मिलेगा जो यह दावा करते हैं कि वॉशिंगटन केवल और अधिक मांगे ही रखता जाएगा। दूसरी तरफ, यदि ईरान इंतजार करता है तो हो सकता है कि ट्रंप की रणनीति को राजनीतिक या आर्थिक मोर्चों पर कठिनाइयों का सामना करना पड़े और तेहरान की स्थिति बेहतर हो जाए। लेकिन यह भी आशंका है कि तेहरान खुद को एक बेहद कमजोर अर्थव्यवस्था के साथ बातचीत की मेज पर पाए।

फिलहाल बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि ईरान की सीमाओं के बाहर क्या कुछ घटित होता है। यदि चीनी बैंक, क्षेत्रीय व्यापारिक साझेदार और विभिन्न कंपनियां यह मानकर पीछे हटने लगती हैं कि वॉशिंगटन उन्हें दंडित करेगा, तो बेसेन्ट का यह अभियान तेहरान के पूरे समीकरण को बदल सकता है। इसके विपरीत, यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका उल्टा परिणाम भी सामने आ सकता है। जो ईरानी धड़े समझौते का विरोध कर रहे हैं, वे यह दलील देंगे कि वॉशिंगटन ने एक बार फिर से एक तथाकथित निर्णायक पत्ता चल दिया है बिना किसी बड़े बदलाव के, और ईरान को अपनी इस नीति पर डटे रहना चाहिए या प्रतिरोध जारी रखना चाहिए।

सवाल-जवाब

अमेरिका ने ईरान के खिलाफ हाल ही में क्या कदम उठाया है?
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट ने ईरान के वैश्विक वित्तीय संबंधों को निशाना बनाते हुए डिजिटल एसेट्स, तकनीक, सोना, विमानन और नौवहन क्षेत्रों पर नए व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है।
ईरान की ओर से इन प्रतिबंधों पर क्या प्रतिक्रिया आई है?
ईरान के अर्थव्यवस्था मंत्री अली मदनिज़ादेह ने अमेरिकी घोषणा को पुरानी बातें करार देते हुए कहा कि तेहरान किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
वर्तमान में ईरान की अर्थव्यवस्था पर किस बात का असर पड़ रहा है?
28 फरवरी को शुरू हुए हवाई हमलों के बाद से ईरान में महंगाई बढ़ गई है, मुद्रा रियाल तेजी से गिर रहा है और तेल निर्यात सीमित होने के कारण सरकार की विदेशी मुद्रा तक पहुंच घट गई है।
ईरान के आम नागरिकों पर इस संकट का क्या प्रभाव पड़ा है?
बढ़ती महंगाई और कमजोर मुद्रा के कारण आयात महंगे हो गए हैं, लोगों की बचत का मूल्य घट गया है और नागरिकों को अपने दैनिक खर्चों तथा अतिरिक्त सुख-सुविधाओं में भारी कटौती करनी पड़ रही है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह भू-राजनीतिक संघर्ष अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय अपराध, अवैध व्यापार नेटवर्क और प्रतिबंधों की चोरी जैसे गंभीर पहलू शामिल हो रहे हैं। अमेरिका द्वारा डिजिटल एसेट्स और तकनीक को निशाना बनाने से सीमा पार होने वाले वित्तीय अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग के नए रास्ते खुलने की आशंका बढ़ गई है। यदि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच यह टकराव और गहराता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा, जिससे अपराध सिंडिकेट्स और हवाला नेटवर्क को फायदा मिलने की पूरी संभावना है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

यह स्पष्ट है कि अमेरिका की इस आर्थिक घेराबंदी का असर केवल सरकारी नीतियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह ईरान के आम नागरिकों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर भारी पड़ेगा। जब तेल निर्यात और समुद्री व्यापार प्रभावित होते हैं, तो मुद्रास्फीति और आवश्यक वस्तुओं की कमी का सीधा बोझ जनता पर पड़ता है। भू-राजनीतिक खींचतान के इस दौर में तेहरान का ज़मीनी रास्तों पर निर्भर रहना और बीजिंग का कड़ा रुख यह संकेत देता है कि यह टकराव लंबी अवधि तक खिंच सकता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला दोनों के लिए गंभीर चुनौतियाँ पैदा होंगी।

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