अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी भी दो देशों के बीच सुलह कराने की जिम्मेदारी उसी राष्ट्र को मिलती है जिसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर पूरी दुनिया को भरोसा हो। इस कसौटी पर इस्लामाबाद की भूमिका हमेशा से सवालों के घेरे में रही है। एक तरफ सुबह के वक्त अमेरिका से आर्थिक मदद की गुहार लगाना, दोपहर में चीन के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करना और शाम को ईरान के साथ कूटनीतिक चर्चाएं करना इस देश की नीति का हिस्सा रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव के मामलों में अतीत में भी पाकिस्तान का कूटनीतिक प्रयास बेनतीजा साबित हुआ है। इसके बावजूद, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची को इस्लामाबाद आमंत्रित करके पाकिस्तान ने एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभाने का नया तमाशा शुरू कर दिया है। ठीक इसी दौरान अमेरिका के एक शीर्ष रक्षा विशेषज्ञ ने पाकिस्तान को खुले तौर पर धोखेबाज और गद्दार करार दिया है।
अब्बास अराघची की इस्लामाबाद यात्रा और शांतिदूत बनने का नाटक
अब्बास अराघची को इस्लामाबाद बुलाए जाने के बाद पाकिस्तानी हुक्मरानों ने वैश्विक मंच पर खुद को एक बड़ा शांतिदूत साबित करने का पुराना नाटक फिर से चालू कर दिया है। हालांकि, कूटनीति के जानकारों और अमेरिकी नीति-निर्माताओं का साफ मानना है कि पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में बेहद नाकाम, अवसरवादी और बुरी नीयत वाला देश है। अमेरिकी सेना के सेवानिवृत्त जनरल और जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ जैक कीन ने इस संबंध में स्पष्ट बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान और कतर जैसे देश ऐसे मध्यस्थ हैं जो पर्दे के पीछे से अमेरिका के हितों को नुकसान पहुंचाकर सीधे तौर पर ईरान का पक्ष लेते हैं।
अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ ने खोली पाकिस्तान की पोल
जब भी वाशिंगटन और तेहरान के बीच आपसी कड़वाहट अपने चरम पर पहुंचती है, पाकिस्तान तुरंत सक्रिय हो जाता है ताकि वैश्विक समुदाय में उसकी छवि एक शांतिदूत के रूप में स्थापित हो सके। हालांकि, अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ जनरल जैक कीन ने एक मीडिया संस्थान से चर्चा के दौरान पाकिस्तान की इस दोहरी नीति का पर्दाफाश कर दिया।
जनरल कीन ने इस बात पर जोर दिया कि पश्चिम एशिया की सभी प्रमुख खुफिया एजेंसियों और वैश्विक खिलाड़ियों को यह बात अच्छी तरह मालूम है कि पाकिस्तान और कतर की नीयत पूरी तरह पक्षपाती है। ये देश अमेरिका के रणनीतिक हितों की बलि देकर ईरान को लाभ पहुंचाने का काम करते हैं। उन्होंने यह गंभीर सवाल भी उठाया कि जिस देश का पूरा इतिहास ही अमेरिका को धोखा देने पर आधारित रहा है, उसे आखिर मध्यस्थ की कुर्सी पर बैठाया ही क्यों जा रहा है।
पाकिस्तान जैसे अवसरवादी राष्ट्र के माध्यम से कूटनीति चलाने के कारण वाशिंगटन को तेहरान की वास्तविक मंशा का सटीक अंदाजा नहीं मिल पाता है। इससे अमेरिका की वार्ता की स्थिति काफी कमजोर हो जाती है और उसे रणनीतिक नुकसान उठाना पड़ता है।
कूटनीतिक लाभ उठाने का पुराना हथियार
पाकिस्तान का यह पुराना इतिहास रहा है कि उसने कभी भी किसी भू-राजनीतिक विवाद को सुलझाने के लिए निष्पक्ष और ईमानदार मध्यस्थता नहीं की है। जब भी वह किन्हीं दो पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने की जिम्मेदारी लेता है, तो उसका मुख्य उद्देश्य शांति की स्थापना न होकर बहुमुखी स्वार्थ साधना होता है।
अमेरिका से वित्तीय सहायता और सैन्य साजो-सामान हासिल करना इस देश की प्राथमिकता रहती है। पाकिस्तान खुद को वाशिंगटन के लिए अनिवार्य साबित करना चाहता है ताकि उसे लड़ाकू विमानों के स्पेयर पार्ट्स, सैन्य सहायता और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक पैकेज मिल सके।
गिरावट की कगार पर पहुंच चुकी अपनी अर्थव्यवस्था और आतंकवाद की शरणस्थली के रूप में कुख्यात हो चुकी अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने के लिए भी वह इस तरह के ड्रामे करता है। मध्यस्थ की भूमिका निभाकर वह वैश्विक पटल पर खुद को एक जिम्मेदार देश के रूप में दिखाने का प्रयास करता है।
अपनी घरेलू सीमा में पल रहे जैश-अल-अदल जैसे चरमपंथी संगठनों से दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए भी वह इस तरह के कूटनीतिक पैंतरे अपनाता है। इसके अलावा देश के भीतर सुलग रही शिया-सुन्नी हिंसा से भी वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान हटाना चाहता है।
दोहरे रवैये और विफल वार्ताओं का लंबा इतिहास
अफगानिस्तान के घटनाक्रम गवाह हैं कि किस प्रकार पाकिस्तान ने दोहरी भूमिका अदा की थी। जब अमेरिका तालेबान के साथ अफगान शांति समझौते के लिए प्रयासरत था, तब पाकिस्तान ने मुख्य मध्यस्थ की भूमिका अपने हाथों में ली थी। हालांकि, पर्दे के पीछे उसने अमेरिका से अरबों डॉलर की वित्तीय सहायता तो ली, लेकिन दूसरी तरफ तालेबान के आतंकवादियों को अपनी सीमा के भीतर सुरक्षित पनाहगाह मुहैया कराई। इसका परिणाम यह निकला कि अमेरिका को अंततः अफगानिस्तान से अपमानजनक स्थिति में पीछे हटना पड़ा।
ईरान के साथ उसके संबंध भी इसी दोहरेपन का शिकार रहे हैं। एक तरफ जहां पाकिस्तान ईरान के साथ गैस पाइपलाइन और व्यापारिक संबंधों की बातें करता है, वहीं दूसरी तरफ वह सऊदी अरब और अमेरिका के मंचों पर ईरान के खिलाफ बोलने से भी नहीं हिचकिचाता है। कुछ समय पहले जब ईरान ने पाकिस्तान के भीतर लक्षित हमला किया था, तब दोनों देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए थे। जो राष्ट्र अपने पड़ोसी देश के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को संभालने में नाकाम रहा हो, वह दुनिया के दो कट्टर दुश्मनों के बीच सुलह कैसे करा सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप के रुख के बाद इस्लामाबाद की सक्रियता
हाल ही के दिनों में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सीधे सैन्य हमले के विकल्प को टालते हुए कूटनीतिक मार्ग अपनाने का संकेत दिया, तो पाकिस्तान ने बिना देर किए अपनी सक्रियता बढ़ा दी। उसने तुरंत प्रभाव से ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची को इस्लामाबाद तलब कर लिया। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने यह दिखाने का भरसक प्रयास किया कि पश्चिम एशिया में संभावित तीसरे विश्व युद्ध को रोकने का जिम्मा केवल उन्हीं के कंधों पर है।
वास्तविकता यह है कि न तो वाशिंगटन इस्लामाबाद की बातों को कोई तवज्जो देता है और न ही तेहरान को पाकिस्तान की नीयत पर जरा भी भरोसा है। अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठानों में अब इस बात पर गंभीर बहस छिड़ चुकी है कि पाकिस्तान जैसे अविश्वसनीय देश को बातचीत के केंद्र में रखना सीधे तौर पर अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के साथ खिलवाड़ करने के समान है।
इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम में केवल पाकिस्तान की भूमिका ही संदेहास्पद नहीं है, बल्कि सऊदी अरब का रवैया भी विश्लेषकों की नजरों में है। अमेरिकी रणनीतिकारों के अनुसार, रियाद एक तरफ अमेरिका से अपनी सुरक्षा की गारंटी की उम्मीद रखता है, लेकिन जब तेहरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की बात आती है, तो वह अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इनकार कर देता है। सऊदी अरब चाहता है कि अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान की ताकत को सीमित करें, लेकिन वह खुद किसी भी प्रकार का भू-राजनीतिक जोखिम उठाने से बचता है। इस अनिश्चित और ढुलमुल नीति का सबसे अधिक लाभ पाकिस्तान उठा रहा है, जो रियाद और वाशिंगटन के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए एकमात्र मुस्लिम मध्यस्थ बनने का ढोंग कर रहा है.



















