वैश्विक व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सुरक्षा का संकट लगातार गहराता जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह चरमराने की कगार पर पहुंच गई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते राजनयिक और सैन्य तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य पहले से ही बेहद अशांत बना हुआ है, और अब एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर संकट खड़ा हो गया है। यमन के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य पर हूती विद्रोहियों ने अपना नियंत्रण बेहद मजबूत कर लिया है। मध्य पूर्व के इस बेहद संकरे समुद्री मार्ग पर हूती विद्रोहियों के बढ़ते प्रभाव ने भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई व्यापारिक देशों की नींद उड़ा दी है। एशिया से यूरोप के देशों की ओर जाने वाले तमाम मालवाहक जहाजों के लिए अब लाल सागर और स्वेज नहर से होकर गुजरने वाला सबसे छोटा और सुरक्षित रास्ता बंद होता दिखाई दे रहा है। ऐसी विषम परिस्थिति में, शिपिंग कंपनियों के पास अफ्रीका महाद्वीप का एक लंबा चक्कर लगाकर जाने के अलावा और कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है। लेकिन केप ऑफ गुड होप का यह वैकल्पिक समुद्री रास्ता दूरी के मामले में सामान्य मार्ग से लगभग दोगुना लंबा है, जिसके कारण माल पहुंचने की अवधि बहुत बढ़ गई है और वैश्विक स्तर पर माल ढुलाई की लागत में भी भारी बढ़ोतरी हो गई है।
मोखा शहर पर कब्जा और हूती विद्रोहियों का यमन में बढ़ता प्रभाव
यमन में बीते कई सालों से चल रहे हिंसक गृहयुद्ध में अब हूती विद्रोही लगातार मजबूत होते जा रहे हैं। वे वहां की सऊदी अरब समर्थित सरकार की सेनाओं को पीछे धकेलते हुए एक के बाद एक महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित कर रहे हैं। हाल ही में हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के तट पर स्थित बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह शहर मोखा पर पूरी तरह से नियंत्रण हासिल कर लिया है। मोखा शहर भौगोलिक रूप से सीधे बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित है, जिसके कारण इस पर कब्जा होने से विद्रोहियों को दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग को नियंत्रित करने की ताकत मिल गई है। हूती विद्रोहियों की इस सैन्य आक्रामकता ने इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। अतीत में इस विद्रोही संगठन पर सऊदी अरब के मक्का जैसे बेहद संवेदनशील धार्मिक स्थलों को निशाना बनाकर हमले करने के भी गंभीर आरोप लग चुके हैं। मोखा बंदरगाह पर कब्जा होने से अब भारत और चीन जैसे उन तमाम एशियाई देशों के व्यापार पर सीधा संकट आ गया है, जो यूरोप के देशों के साथ अपना अरबों डॉलर का आयात-निर्यात इसी लाल सागर के रास्ते से करते हैं।
केप ऑफ गुड होप का लंबा रास्ता: अफ्रीका महाद्वीप की थका देने वाली यात्रा
बाब अल-मन्दब मार्ग पर हूती विद्रोहियों द्वारा व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाए जाने के बाद, अब जहाजों को बचाने के लिए केप ऑफ गुड होप के मार्ग का सहारा लिया जा रहा है। हालांकि, यह मार्ग जहाजों के लिए एक बेहद लंबी और थका देने वाली समुद्री यात्रा साबित हो रहा है। इसे समझने के लिए यूरोप से भारत तक के नए समुद्री मार्ग के सफर पर नजर डालनी होगी। उदाहरण के लिए, यदि किसी जहाज को फ्रांस या इटली से सामान लेकर भारत आना हो, तो उसे सबसे पहले भूमध्य सागर को पार करना होगा। इसके बाद, वह स्पेन और मोरक्को के बीच स्थित जिब्राल्टर जलडमरूमध्य से होते हुए सीधे अटलांटिक महासागर के खुले पानी में प्रवेश करेगा। अटलांटिक महासागर में आने के बाद उस जहाज को करीब 8,000 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करते हुए पूरे अफ्रीका महाद्वीप के पश्चिमी तट के समानांतर दक्षिण की ओर बढ़ना होगा। इसके बाद ही जहाज अफ्रीका महाद्वीप के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित केप ऑफ गुड होप तक पहुंच पाएगा। इस ऐतिहासिक और दुर्गम बिंदु को पार करने के बाद ही जहाज हिंद महासागर में प्रवेश कर सकेगा और वहां से उत्तर की ओर बढ़ते हुए अरब सागर के जरिए भारतीय बंदरगाहों पर लंगर डाल सकेगा।
दूरी और समय का नया गणित: दोगुनी हुई दूरी और हफ्तों की देरी
वैकल्पिक मार्ग के इस्तेमाल के कारण दूरी और समय में जो इजाफा हुआ है, उसके आंकड़े वाकई चौंकाने वाले हैं। जब कोई व्यापारिक जहाज भारत से रवाना होकर बाब अल-मन्दब और स्वेज नहर के रास्ते फ्रांस पहुंचता था, तो यह कुल समुद्री दूरी लगभग 11,000 किलोमीटर होती थी। इसके विपरीत, अब उसी जहाज को केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाकर फ्रांस भेजने पर यह दूरी बढ़कर लगभग 22,000 किलोमीटर हो जाती है, जो कि बिल्कुल दोगुनी है। इस भारी-भरकम दूरी के कारण एशिया और मध्य पूर्व से यूरोप जाने वाले जहाजों को अपने गंतव्य तक पहुंचने में कम से कम 10 से लेकर 30 दिन तक का अतिरिक्त समय लग रहा है। इस गंभीर व्यवधान को सऊदी अरब के यानबू बंदरगाह से ताइवान के बीच होने वाले शिपिंग रूट के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। सामान्य दिनों में बाब अल-मन्दब के रास्ते यह यात्रा केवल 19 दिनों में पूरी हो जाती थी, लेकिन अब अफ्रीका का पूरा चक्कर लगाने के कारण इसी सफर को पूरा करने में लगभग 48 दिन का समय लग रहा है। यानी करीब एक महीने का अतिरिक्त समय लग रहा है, जिससे जहाजों का ईंधन खर्च और परिचालन लागत अत्यधिक बढ़ गई है।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंधों पर मंडराता खतरा
समुद्री मार्ग में आए इस बड़े संकट का सीधा और प्रतिकूल प्रभाव भारत तथा यूरोपीय संघ के बीच होने वाले आपसी व्यापार पर पड़ने की पूरी आशंका है। काउंसिल ऑफ द यूरोपियन यूनियन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य 136.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा था, जो भारतीय मुद्रा में बदलने पर लगभग 13.09 लाख करोड़ रुपये बैठता है। इस बड़े व्यापारिक आंकड़े का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि यूरोपीय संघ ने भारत से लगभग 75.8 बिलियन डॉलर के सामान का आयात किया था, जबकि इसके बदले भारत को लगभग 60.7 बिलियन डॉलर मूल्य के सामान का निर्यात किया था। हूती विद्रोहियों के ड्रोन हमलों और समुद्री घेराबंदी के डर से बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों की संख्या में करीब 88 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि हूती विद्रोही बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि वे केवल सऊदी अरब के मालिकाना हक वाले जहाजों को ही निशाना बना रहे हैं, लेकिन बढ़ते हुए सुरक्षा जोखिमों के कारण अन्य देशों के जहाज भी इस मार्ग से गुजरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
वैश्विक व्यापार का मुख्य हिस्सा और जिबूती के सैन्य ठिकानों से निकटता
सामान्य दिनों में दुनिया का लगभग 12 प्रतिशत समुद्री व्यापार इसी संकरे बाब अल-मन्दब मार्ग से होकर संपन्न होता है। हूती विद्रोहियों ने अब लाल सागर के अहम तटीय इलाकों के साथ-साथ इस जलडमरूमध्य के पास स्थित कई छोटे द्वीपों पर भी अपनी सैन्य चौकियां बना ली हैं। इसके परिणामस्वरूप, वे अब पूर्वी अफ्रीका के छोटे लेकिन सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण देश जिबूती से महज 32 किलोमीटर की दूरी पर आ गए हैं। जिबूती अपनी खास भौगोलिक स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक प्रमुख केंद्र है, जहां अमेरिका और कई अन्य शक्तिशाली देशों के महत्वपूर्ण सैन्य अड्डे बने हुए हैं। हूती विद्रोहियों की इन अंतरराष्ट्रीय सैन्य ठिकानों से इतनी कम दूरी ने इस पूरे क्षेत्र में सैन्य टकराव की आशंकाओं को बहुत बढ़ा दिया है। इस संकरे समुद्री रास्ते पर यदि कोई बड़ी सैन्य झड़प होती है, तो इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक बाजार में बड़ी मंदी का खतरा पैदा हो सकता है।



















