भारतीय कूटनीति के मोर्चे पर एक दिलचस्प वाकया सामने आया जब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपनी यात्रा के दौरान अजरबैजान में एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्थल का रुख किया। यह आठ साल के अंतराल के बाद किसी भारतीय विदेश मंत्री की पहली स्वतंत्र द्विपक्षीय यात्रा है, जिसने कूटनीतिक गलियारों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी खासी सुर्खियां बटोरी हैं। बाकू शहर में स्थित यह खास परिसर दोनों राष्ट्रों के बीच मजबूत होते राजनीतिक और आर्थिक तालमेल के साथ-साथ आपसी इतिहास की अनकही कहानियों को भी जीवंत करता है।
अपनी इस यात्रा के दौरान एस जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स के जरिए इस पवित्र स्थल की तस्वीरें साझा कीं। उन्होंने अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया कि यह जगह दोनों देशों के बीच प्राचीन काल से चले आ रहे सांस्कृतिक जुड़ाव का एक जीवंत प्रतीक है। गौरतलब है कि अजरबैजान को अक्सर आग की धरती के रूप में जाना जाता है, जहां अग्नि का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व सदियों पुराना रहा है और इसका इतिहास काफी समृद्ध है।
यह पूरा अनूठा परिसर प्राकृतिक गैस के रिसाव वाले क्षेत्र पर खड़ा हुआ है, जहां जमीन के भीतर से आने वाली गैस स्वतः ही जलती रहती थी। अब्शेरोन का यह इलाका प्राचीन काल से ही प्राकृतिक ज्वालाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पांचवीं शताब्दी के कई स्रोतों में बाकू के नजदीक चट्टानों से भभकती आग का जिक्र मिलता है। जानकारों के अनुसार सासानी काल में पारसी धर्म के प्रभाव के चलते यहां अग्नि को पूजने के कई स्थल विकसित हुए होंगे। इसके अलावा दसवीं शताब्दी के मशहूर अरब भूगोलवेत्ता अल-इस्ताखरी ने भी अपनी रचनाओं में बाकू के आसपास अग्नि-पूजकों की मौजूदगी का स्पष्ट उल्लेख किया है। हालांकि बाद के दौर में इस्लामी विजय के बाद कई अग्नि मंदिर काल के गाल में समा गए और खंडहर बन गए, लेकिन प्राकृतिक रूप से सुलगने वाली आग का महत्व कम नहीं हुआ।
पत्थरों से बने इस वर्तमान परिसर का निर्माण मुख्य रूप से सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के दौरान हुआ था। इस ढांचे को मुख्य रूप से भारतीय व्यापारियों और तीर्थयात्रियों ने मिलकर तैयार करवाया था, जिनमें विशेष तौर पर पंजाब और मुल्तान क्षेत्र के हिंदू तथा सिख समुदाय के लोग शामिल थे। ये कारोबारी ऐतिहासिक सिल्क रूट और कैस्पियन सागर के समुद्री और थल मार्गों से होते हुए बाकू तक पहुंचते थे और इस प्राकृतिक अग्नि को अपनी आस्था के केंद्र के रूप में ज्वाला जी मानकर नमन करते थे।
यह पूरा वास्तुकला परिसर पंचकोण के आकार का है जिसके ठीक केंद्र में एक मुख्य वेदी स्थापित की गई है। इस वेदी के आसपास साधु-संतों और तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए छोटे कमरे यानी कोशिकाएं बनाई गई हैं, और पूरे परिसर को एक सराय जैसी मजबूत दीवार ने घेर रखा है। इसके सबसे ऊपरी हिस्से पर सनातन धर्म का प्रमुख प्रतीक त्रिशूल भी शान से सुसज्जित है। इस प्राचीन स्थल की दीवारों पर लगभग इक्कीस शिलालेख उकेरे गए हैं, जिनमें से ज्यादातर संस्कृत और गुरुमुखी लिपि में लिखे गए हैं, जबकि एक शिलालेख फारसी भाषा में भी मौजूद है। इन सभी शिलालेखों पर गणेश, ज्वाला जी और भगवान शिव की वंदना से जुड़े श्लोक अंकित हैं।
इतिहास इस बात की गवाही देता है कि सत्रहवीं शताब्दी यानी वर्ष 1683 में एक जर्मन यात्री एंगेलबर्ट कैम्फर ने इस स्थान पर सात अलग-अलग बिंदुओं से लगातार जलती हुई आग का सूक्ष्म वर्णन किया था। इसके बाद अठारहवीं सदी में एक अन्य अंग्रेज व्यापारी जोनास हनवे ने भी अपनी यात्रा वृत्तांत में यहां आने वाले भारतीय श्रद्धालुओं और भक्तों का विशेष रूप से जिक्र किया था। यह स्थान मूल रूप से हिंदू, सिख और कुछ हद तक पारसी यानी जोरोस्ट्रियन यात्रियों का एक साझा और पवित्र केंद्र हुआ करता था। यहां आने वाले भारतीय व्यापारी अपने व्यापारिक कार्यों के साथ-साथ नियमित रूप से पूजा-पाठ और अनुष्ठान भी संपन्न करते थे। हालांकि कुछ ऐतिहासिक स्रोत यह भी मानते हैं कि यह प्राचीन स्थान शुरुआत में पारसी धर्म से जुड़ा रहा होगा, लेकिन आज यहां जो ठोस इमारत और शिलालेख मौजूद हैं, वे पूरी तरह से हिंदू और सिख प्रभाव की स्पष्ट कहानी बयां करते हैं।



















