छोटे बच्चों में बोलते समय हकलाने या शब्दों के उच्चारण में रुकावट आने की शिकायत को लेकर अब परिजनों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। मुरादाबाद के जिला अस्पताल में इस विकार के सुधार के लिए विशेष व्यवस्था की गई है, जहां बिना किसी शुल्क के बच्चों की थेरेपी की जा रही है। अस्पताल के ओपीडी वार्ड में प्रतिदिन ऐसे 10 से 12 बच्चे परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं, जो सही ढंग से बोल पाने में असमर्थ हैं। डॉक्टरों की देखरेख में इन बच्चों का नियमित अभ्यास कराया जा रहा है ताकि वे सामान्य रूप से बातचीत करना शुरू कर सकें।
जन्म के समय देर से रोना और धीमा विकास हो सकते हैं मुख्य कारण
हकलाहट और बोलने में रुकावट के पीछे कई चिकित्सीय वजहें हो सकती हैं। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजेन्द्र कुमार के अनुसार जब कोई नवजात शिशु जन्म के तुरंत बाद नहीं रोता अथवा देर से रोता है, तो उसके मस्तिष्क के विकास की गति प्रभावित हो सकती है। मस्तिष्क के धीमे विकास के अलावा सुनने या समझने के तंत्र में कोई शारीरिक विकार होना भी इसका कारण बन सकता है। सामान्य तौर पर बच्चे उम्र बढ़ने के साथ पहले बैठना सीखते हैं और फिर शब्दों का उच्चारण शुरू करते हैं। बोलने की शुरुआती अवस्था में वे मामा, दादा, नाना जैसे एकल शब्द बोलते हैं और इसके बाद बड़े वाक्य बनाते हैं। यदि किसी शारीरिक या मानसिक बाधा की वजह से बच्चा इस प्राकृतिक क्रम में नहीं बोल पाता, तो उसे प्रशिक्षित स्पीच थेरेपिस्ट की सहायता दिलानी पड़ती है।
जांच के लिए कमरा नंबर दो से शुरू होती है प्रक्रिया
अस्पताल प्रशासन ने ऐसे बच्चों की जांच और मार्गदर्शन के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया बनाई है। जिन अभिभावकों के बच्चे स्पष्ट नहीं बोल पाते, उन्हें सबसे पहले कमरा नंबर 2 में स्थित बाल रोग विशेषज्ञ के पास ले जाना होता है। बाल रोग विशेषज्ञ बच्चे की प्रारंभिक जांच कर यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चे के शारीरिक अथवा मानसिक विकास में क्या रुकावट है। इसके बाद बच्चे को कान, नाक एवं गला विशेषज्ञ यानी ईएनटी सर्जन के पास भेजा जाता है, जो कमरा नंबर 6 और कमरा नंबर 15 में बैठते हैं। यह जांच इसलिए जरूरी है क्योंकि कई बार सुनने की क्षमता कमजोर होने के कारण भी बच्चा दूसरों के शब्द सुनकर दोहरा नहीं पाता और बोलना सीखने में पिछड़ जाता है। बाल रोग और ईएनटी जांच पूरी होने के उपरांत आवश्यकतानुसार बच्चे को अस्पताल में मौजूद स्पीच थेरेपिस्ट के पास भेजा जाता है, जो बच्चे की समस्या को समझकर उसे शब्दों के सही उच्चारण का अभ्यास कराते हैं।
विशेषज्ञ सुविधाओं के चलते बढ़ी अस्पताल आने वालों की संख्या
चिकित्सा अधीक्षक ने स्पष्ट किया कि जन्मजात विकार या देर से रोने के कारण विकास संबंधी चुनौतियों से जूझने वाले बच्चों की कुल आबादी में संख्या अमूमन एक से दो प्रतिशत ही होती है। हालांकि, अस्पताल की बाल रोग ओपीडी और ईएनटी ओपीडी में प्रतिदिन 10 से 15 ऐसे बच्चे पहुंच रहे हैं। मामलों में अचानक कोई असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई है, बल्कि पहले जिला अस्पताल में स्पीच थेरेपिस्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, इसलिए लोग इलाज के लिए नहीं आ पाते थे। अब एक ही छत के नीचे बाल रोग विशेषज्ञ, ईएनटी सर्जन और स्पीच थेरेपिस्ट तीनों मौजूद हैं। डॉक्टरों का परामर्श है कि जैसे ही माता-पिता को यह महसूस हो कि उनका बच्चा बोलने में अटक रहा है या उसकी समझ का विकास उम्र के अनुसार नहीं हो पा रहा है, वे बिना समय गंवाए विशेषज्ञ जांच करवाएं ताकि समय रहते विकार को सुधारा जा सके।



















