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किताबों पर अंगूठे के निशान वाला ठप्पा तय करेगा कि कहानी इंसान ने लिखी है या मशीन नेएआई
7 अक्तू॰ 2026, 2:05 pm (1 घंटे पहले)· 0

किताबों पर अंगूठे के निशान वाला ठप्पा तय करेगा कि कहानी इंसान ने लिखी है या मशीन ने

साहित्यिक जगत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते विवादों के बीच ब्रिटिश संस्था बुक्स बाय पीपल को इंसानी लेखन प्रमाणित करने वाले लोगो की कानूनी मंजूरी मिल गई है।

साहित्य और प्रकाशन जगत में मशीनी लेखनी को लेकर बढ़ते संदेह के बीच पाठकों को असली इंसानी रचनाओं की पहचान कराने के लिए एक नई व्यवस्था शुरू की गई है। ब्रिटेन की एक नई संस्था बुक्स बाय पीपल ने ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसके जरिए प्रकाशक अपनी किताबों को आधिकारिक रूप से प्रमाणित करा सकेंगे। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य यह पुख्ता करना है कि जो किताब पाठक के हाथ में है, उसे किसी सॉफ्टवेयर ने नहीं बल्कि एक असली इंसान ने अपने हाथों और दिमाग से लिखा है। इस संबंध में ब्रिटिश बौद्धिक संपदा कार्यालय से जरूरी औपचारिक स्वीकृति मिल चुकी है, जिसके बाद अब किताबों के मुख्य कवर पर अंगूठे के निशान जैसा दिखने वाला एक खास प्रतीक चिन्ह छापने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है।

प्रकाशन जगत में नए भरोसे की तलाश

पाठकों की पसंद और लेखक की असली मेहनत को रेखांकित करते हुए बुक्स बाय पीपल की सह संस्थापक एस्मे डेनिस ने स्पष्ट किया कि यदि लोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार साहित्य पढ़ना या लिखना चाहते हैं तो यह उनका अपना निर्णय है। संस्था का मुख्य लक्ष्य ऐसे पाठकों को स्पष्ट विकल्प उपलब्ध कराना है जो केवल इंसानी संवेदनाओं से लिखी गई रचनाएं तलाश रहे हैं। इससे पहले भी ह्यूमन ऑथर्ड जैसी कुछ पहल शुरू हुई थीं, लेकिन वे पूरी तरह केवल लेखक के इस मौखिक या लिखित वादे पर टिकी थीं कि उसने किसी तकनीकी टूल का सहारा नहीं लिया है।

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बुक्स बाय पीपल ने केवल लेखक के वादे पर निर्भर रहने के बजाय बहुस्तरीय जांच का रास्ता चुना है। इसके तहत लेखक से आधिकारिक घोषणा पत्र लेने के साथ-साथ पांडुलिपि को खास सॉफ्टवेयर से गुजारा जाता है। इसके अलावा संपादक और लेखक द्वारा उपलब्ध कराए गए शुरुआती ड्राफ्ट, हाथ से लिखे नोट्स और शोध सामग्री की बारीकी से पड़ताल की जाती है ताकि यह साबित हो सके कि रचना का निर्माण प्राकृतिक मानवीय प्रक्रिया से हुआ है। एस्मे डेनिस के अनुसार, जांच दल उन तमाम पहलुओं को देखता है जो यह साबित करते हैं कि रचना कई चरणों में बार-बार संपादन और पुनर्लेखन की स्वाभाविक इंसानी प्रक्रिया से गुजरी है।

जांच का ढांचा और प्रकाशकों की भागीदारी

इस पूरी जांच प्रक्रिया में प्रकाशकों को एक निश्चित सदस्यता शुल्क देना होगा। इसके साथ ही प्रमाणीकरण के लिए भेजी जाने वाली प्रत्येक अलग किताब के लिए अतिरिक्त जांच राशि भी तय की गई है। शुरुआत में ही पांच प्रकाशक इस पूरी प्रणाली के साथ जुड़ चुके हैं। योजना के मुताबिक चालू वर्ष के खत्म होने से पहले ही इस नए लोगो के साथ पहली मुद्रित किताब बाजार में आने की पूरी उम्मीद है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब किताबों की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कथित उपयोग को लेकर कई बड़े विवाद सामने आ चुके हैं।

हाल के महीनों में ऐसे ही एक विवाद के चलते लगभग 20 लाख डॉलर का एक बड़ा पुस्तक समझौता रद्द कर दिया गया था। एक अन्य मामले में प्रकाशक को अपनी उपन्यास की प्रतियां दुकानों से वापस मंगवानी पड़ीं, जबकि एक पुरस्कार विजेता लघु कथा पर भी मशीनी औजारों के इस्तेमाल के गंभीर आरोप लगे। इन घटनाओं ने पाठकों और प्रकाशकों के बीच उस पारंपरिक विश्वास को हिला दिया है जो दशकों से बिना किसी लिखित शर्त के कायम था।

मशीनी लेखन और मानवीय अहसास का अंतर

प्रकाशन उद्योग के जानकारों का मानना है कि लेखक या प्रकाशक सीधे तौर पर तकनीक से अपनी आजीविका छिनने को लेकर आशंकित नहीं हैं, क्योंकि उनका भरोसा है कि पाठक मशीनों द्वारा तैयार किए गए निर्जीव साहित्य को लंबे समय तक नहीं अपनाएंगे। मशहूर विज्ञान कथा लेखक टेड च्यांग, जिनकी 1998 की कहानी स्टोरी ऑफ योर लाइफ पर हॉलीवुड फिल्म अराइवल बनी थी, ने इस अनुभव की तुलना एक कन्वेयर बेल्ट से की है जहां उत्पाद लगातार नीचे गिरते रहते हैं। टेड च्यांग के अनुसार, जब पाठक को यह पता होता है कि कोई रचना कैसे तैयार की गई है, तो उस जानकारी को रचना के व्यक्तिगत अनुभव से अलग नहीं किया जा सकता।

स्वतंत्र प्रकाशक गैली बेगर प्रेस के सह निदेशक सैम जोर्डिसन ने भी इस नई पहल को अपनाने की इच्छा जताई है। सैम जोर्डिसन का कहना है कि प्रकाशन हमेशा लेखक, प्रकाशक और पाठकों के आपसी भरोसे पर टिका रहा है। जब इस भरोसे के साथ खिलवाड़ होता है, तो पाठक खुद को ठगा हुआ महसूस करता है और किसी मशीन द्वारा लिखी गई बात को इंसानी मानकर पढ़ने से मन में स्वाभाविक अरुचि पैदा होती है। इस दिशा में पेंगुइन रैंडम हाउस के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्कस डोहले ने भी इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि मानवीय किस्सागोई ही पूरे पुस्तक उद्योग की असली जीवनधारा है।

जांच सॉफ्टवेयर के खतरे और लेखकों की चिंताएं

किताबों पर इस तरह का ठप्पा लगाने की व्यवस्था के जहां कई समर्थक हैं, वहीं इसके संभावित खतरों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा जोखिम गलत पहचान यानी फॉल्स पॉजिटिव का है, जिससे किसी निर्दोष लेखक की साख पल भर में मिट्टी में मिल सकती है। पब्लिशर्स लाइसेंसिंग सर्विसेज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी टॉम वेस्ट ने आगाह किया है कि यह जांच अभियान किसी अंधानुकरण या शक के माहौल में नहीं बदलना चाहिए क्योंकि सूक्ष्म बारीकियों में ही सबसे बड़ा संकट छिपा होता है।

इस पूरे मामले में न्यूयॉर्क स्थित स्टार्टअप पैनग्राम प्रमुखता से उभरा है, जिसका दावा है कि उसका सॉफ्टवेयर 99.7 प्रतिशत सटीकता के साथ मशीनी भाषा की पहचान कर सकता है। हालांकि लेखक इस तरह के सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठा रहे हैं क्योंकि वे टूल स्वयं जटिल एल्गोरिदम पर काम करते हैं। हाल ही में जेरी फलाडे नामक नए लेखक की पुस्तक का 20 लाख डॉलर का अनुबंध रद्द होने के पीछे भी इसी तरह के एक टूल की भूमिका बताई गई। जेरी फलाडे ने आरोप लगाया कि पहचान करने वाले सॉफ्टवेयर ने उनकी नाइजीरियाई अंग्रेजी बोली को मशीनी भाषा समझ लिया और पांडुलिपि को 97 प्रतिशत तक तकनीकी रूप से तैयार घोषित कर दिया। जेरी फलाडे ने अपने एक लेख में पीड़ा व्यक्त करते हुए लिखा कि एक किताब तैयार करने में महीनों और वर्षों का समय लग जाता है, लेकिन एक सॉफ्टवेयर दो मिनट के भीतर पूरी जिंदगी की मेहनत को बर्बाद कर सकता है।

मूल्यांकन की चुनौतियां और भविष्य की राह

कई विशेषज्ञों का मत है कि हर लेखक को अपनी रचना की सत्यता साबित करने के कठघरे में खड़ा करना अनुचित है। उनका मानना है कि सामान्य नियम यही होना चाहिए कि हर किताब इंसान द्वारा ही लिखी गई है, जब तक कि इसके विपरीत कोई ठोस प्रमाण न हो। टॉम वेस्ट ने जोर देकर कहा कि लेखकों से उनके विचारों और काम की उत्पत्ति को लेकर लगातार सवाल पूछे जाने की प्रवृत्ति का विरोध होना चाहिए।

बुक्स बाय पीपल का कहना है कि उनकी व्यवस्था पैनग्राम की तरह केवल एल्गोरिदम पर आधारित नहीं है, बल्कि वे लिखित दस्तावेजों और संवादों के सिलसिलेवार मानवीय प्रमाणों को अधिक महत्व देते हैं। एस्मे डेनिस के शब्दों में, जैसे-जैसे तकनीकी मॉडल अधिक सक्षम होंगे, केवल सॉफ्टवेयर की दौड़ में बने रहना संभव नहीं होगा। किसी भी संशय की स्थिति में संस्था लेखक के पक्ष में खड़ी रहने का दावा करती है ताकि किसी पर झूठा आरोप न लगे। वहीं टेड च्यांग का मानना है कि नियम लागू करने के तरीके कितने भी अपूर्ण क्यों न हों, प्रकाशकों के लिए बेईमानी न करने की स्पष्ट नीति तय करना नैतिक मूल्यों का प्रतीक है।

सवाल-जवाब

बुक्स बाय पीपल का नया मार्क दिखने में कैसा है?
यह नया प्रमाणन चिन्ह एक अंगूठे के निशान जैसा दिखता है, जिसे प्रमाणित किताबों के मुख्य कवर पर छापा जाएगा।
संस्था किसी किताब में मानवीय लेखन की जांच कैसे करती है?
संस्था लेखक से शपथ पत्र लेने के अलावा शुरुआती ड्राफ्ट, नोट्स और पत्राचार की मानवीय स्तर पर जांच करती है और सॉफ्टवेयर से भी पाठ को परखती है।
इस नई प्रणाली से अब तक कितने प्रकाशक जुड़ चुके हैं?
अब तक पांच प्रकाशकों ने इस प्रमाणन प्रणाली को अपनाने के लिए सदस्यता ली है।
जेरी फलाडे के मामले में क्या विवाद हुआ था?
सॉफ्टवेयर ने जेरी फलाडे की नाइजीरियाई अंग्रेजी बोली को मशीनी भाषा मानकर 97 प्रतिशत एआई बता दिया, जिससे उनका 20 लाख डॉलर का करार रद्द हो गया था।
संस्था संशय होने पर किसके पक्ष में निर्णय लेती है?
जब किसी सबूत पर पूरा भरोसा नहीं होता, तो संस्था लेखक के पक्ष में फैसला करती है ताकि किसी लेखक पर झूठा आरोप न लगे।
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