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असम के कार्बी आंगलोंग में महिलाओं ने सीखी मशीनी एरी सिल्क रीलिंग, परंपरा को मिला आजीविका का संबलअसम
5 अक्तू॰ 2026, 4:35 pm (51 मिनट पहले)· 0

असम के कार्बी आंगलोंग में महिलाओं ने सीखी मशीनी एरी सिल्क रीलिंग, परंपरा को मिला आजीविका का संबल

कार्बी आंगलोंग के चंद्रसिंग रोंगपी गांव में चार दिवसीय कार्यशाला में आदिवासी महिलाओं को सौर ऊर्जा संचालित मशीनों से एरी सिल्क धागा तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।

असम के कार्बी आंगलोंग जिले के रोंगमोन्गवे ब्लॉक स्थित चंद्रसिंग रोंगपी गांव के कम्युनिटी रिसोर्स सेंटर में आठ स्थानीय कार्बी महिलाओं के लिए चार दिवसीय तकनीकी प्रशिक्षण कार्यशाला संपन्न हुई। 30 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चले इस विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य अहिंसा सिल्क के नाम से मशहूर एरी रेशम उत्पादन को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर ग्रामीण महिलाओं के लिए टिकाऊ आजीविका और सूक्ष्म उद्यम के नए रास्ते तैयार करना था। कार्बी समुदाय के लिए एरी सिल्क केवल कपड़ा बनाने का काम नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही उनकी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान का अहम हिस्सा रहा है। हालांकि, हाल के समय में पारंपरिक रूप से कोकून पालन, कताई और बुनाई का यह चलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

तकनीकी कौशल और गुणवत्ता पर रहा विशेष जोर

इस चार दिवसीय प्रशिक्षण का संचालन दीफू की एरी रीलिंग विशेषज्ञ मिरबोन तेरोंपी और माधुरी तेरोंपी ने किया, जिनके पास कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद (KAAC) के रेशम कीट पालन विभाग से व्यापक अनुभव और तकनीकी दक्षता प्राप्त है। कार्यशाला में शामिल प्रतिभागियों को एरी कोकून की प्राथमिक तैयारी से लेकर स्वचालित मशीनों द्वारा रीलिंग करने, धागा जोड़ने, वाइंडिंग, धागे के सुरक्षित रख-रखाव और गुणवत्ता जांच की बारीकियां सिखाई गईं। इस दौरान धागे की मोटाई में एकरूपता बनाए रखने, उत्पादन की गति बढ़ाने और बर्बादी रोकने पर खास ध्यान दिया गया।

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सूक्ष्म उद्यम और बाजार आधारित मूल्य निर्धारण

प्रशिक्षण सत्रों में केवल धागा निकालने की तकनीकी जानकारी ही नहीं दी गई, बल्कि उत्पाद विकास, लागत निकालने और बाजार के अनुकूल मूल्य तय करने की समझ भी विकसित की गई। इस पहल का मकसद कोकून उत्पादन से लेकर तैयार कपड़ों तक एक मजबूत बाजार शृंखला तैयार करना है, ताकि ग्रामीण कारीगर सीधे बाजार से जुड़ सकें। व्यावहारिक सत्रों के दौरान स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और जैव विविधता संरक्षण के सीधे संबंधों पर भी विस्तार से चर्चा हुई, ताकि प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना टिकाऊ आय सुनिश्चित हो सके।

पारंपरिक दिक्कतों का मशीनी समाधान

बकरिंग एंगती गांव की प्रतिभागी काचे रोंगपीपी ने बताया कि इस व्यावहारिक प्रशिक्षण से मशीनों के संचालन को लेकर उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ा है और अब वे इसे नियमित आजीविका के रूप में अपनाने के प्रति आश्वस्त हैं। वहीं खाइलुन तेरंग गांव की काकू रोंगपीपी ने पारंपरिक तरीकों की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए बताया कि हाथ से धागा निकालने की पुरानी प्रक्रिया बेहद धीमी और श्रमसाध्य थी, जिसमें धागे की गुणवत्ता और मोटाई एक जैसी रख पाना मुश्किल होता था। उन्होंने कहा कि मशीनी रीलिंग से ये सारी समस्याएं आसानी से हल हो रही हैं और कम समय में बेहतर गुणवत्ता का धागा तैयार हो रहा है।

पर्यावरण संरक्षण और सौर ऊर्जा की भूमिका

आरण्यक की प्रोजेक्ट ऑफिसर जोशना तेरंगपी ने कहा, "विलुप्त होने की कगार पर खड़ी इस जलवायु अनुकूल कपड़ा परंपरा को बचाने के लिए समय पर हस्तक्षेप की जरूरत है।" उन्होंने रेखांकित किया कि यह शिल्प समुदाय के ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर का संवाहक है। इस कार्यशाला में सेल्को फाउंडेशन के सहयोग से सौर ऊर्जा संचालित एरी रीलिंग मशीनें उपलब्ध कराई गईं। पूरे कार्यक्रम को फील्ड वालंटियर प्रेसिला तेरंगपी का सहयोग मिला, जबकि मर्गराथ तेरंगपी और अंजोना रोंगफारपी जैसी स्थानीय महिलाओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। यह पहल आरण्यक के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत आयोजित की गई, जिसे IUCN-KfW का समर्थन प्राप्त है और जो पूर्वोत्तर भारत में वैकल्पिक आजीविका के जरिए जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

सवाल-जवाब

यह एरी सिल्क रीलिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम कहां आयोजित किया गया था?
यह चार दिवसीय प्रशिक्षण असम के कार्बी आंगलोंग जिले के रोंगमोन्गवे ब्लॉक स्थित चंद्रसिंग रोंगपी गांव के कम्युनिटी रिसोर्स सेंटर में आयोजित किया गया था।
कार्यशाला में कितनी महिलाओं ने भाग लिया और यह कब आयोजित हुई?
कार्यशाला 30 सितंबर से 3 अक्टूबर तक आयोजित की गई, जिसमें स्थानीय समुदाय की 8 महिलाओं ने हिस्सा लिया।
एरी सिल्क को अहिंसा सिल्क क्यों कहा जाता है?
एरी सिल्क को अहिंसा सिल्क इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें रेशम का कीड़ा कोकून को छोड़कर प्राकृतिक रूप से तितली बनकर बाहर निकल जाता है, जिससे कीड़े को मारे बिना रेशम प्राप्त होता है।
कार्यशाला में प्रशिक्षक कौन थे?
दीफू की विशेषज्ञ मिरबोन तेरोंपी और माधुरी तेरोंपी ने प्रशिक्षण दिया, जिन्हें KAAC के सेरीकल्चर विभाग से व्यापक अनुभव प्राप्त है।
पारंपरिक रीलिंग के मुकाबले मशीनी रीलिंग का क्या लाभ है?
मशीनी रीलिंग से धागे की मोटाई एक समान रहती है, उत्पादन की गति बढ़ती है और समय तथा शारीरिक श्रम की भारी बचत होती है।
रीलिंग मशीनों को चलाने के लिए किस ऊर्जा स्रोत का उपयोग किया जा रहा है?
इन मशीनों को चलाने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है, जिन्हें सेल्को फाउंडेशन के सहयोग से उपलब्ध कराया गया है।
इस पहल को किन प्रमुख संगठनों का समर्थन प्राप्त है?
यह पहल आरण्यक के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत आयोजित हुई, जिसे IUCN-KfW और सेल्को फाउंडेशन का सहयोग प्राप्त है।
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