पशुपालन उद्योग के विस्तार के साथ ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में अपशिष्ट जल का सुरक्षित निपटान एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। इसी समस्या का व्यावहारिक समाधान निकालते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने एक अनोखी प्रकृति-आधारित तकनीक तैयार की है। यह कॉम्पैक्ट और कम ऊर्जा खपत वाला सिस्टम सूअर फार्मों से निकलने वाले अत्यधिक दूषित गंदे पानी को शुद्ध करने में सक्षम है। इस नवाचार में स्थानीय रूप से मिलने वाले अरबी के पौधों (कोलोकेशिया एस्कुलेंटा) और एक विशेष ज़िग-ज़ैग बहाव प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है, जिससे पारंपरिक सीवेज नेटवर्क से कटे दूरदराज के पशुपालकों को बड़ा सहारा मिल सकता है।
प्रदूषण रोकने के लिए नया इको-फ्रेंडली मॉडल
पशुपालन गतिविधियों से निकलने वाला अपशिष्ट जल सामान्य सीवेज की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक माना जाता है। इसमें भारी मात्रा में पोषक तत्व, रोगाणु, जानवरों का मल-मूत्र, बाड़ों की धुलाई में इस्तेमाल हुआ पानी, बचा हुआ चारा और फार्म कर्मियों का घरेलू अपशिष्ट शामिल होता है। अगर इस पानी को बिना उपचारित किए सीधे प्राकृतिक जल स्रोतों में बहा दिया जाए, तो यह नदियों, झीलों और कृषि भूमि के पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचाता है। आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अजय एस. कलमधाड के अनुसार, इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य बढ़ते पशुधन उत्पादन के कारण नदियों और झीलों में पहुंचने वाले इसी पैथोजन और पोषक तत्वों से भरे अपशिष्ट का सुरक्षित प्रबंधन करना है।
ज़िग-ज़ैग बहाव और आंतरिक विभाजन की अनूठी कार्यप्रणाली
पारंपरिक रूप से बनाए जाने वाले कृत्रिम वेटलैंड्स में दूषित पानी सीधे ट्रीटमेंट बेड से होकर गुजर जाता है, जिससे सफाई की प्रक्रिया सीमित रह जाती है। संस्थान के पीएचडी शोधार्थी मोनिश गोस्वामी ने बताया कि नई प्रणाली में आंतरिक विभाजन (इंटरनल बैफल्स) लगाए गए हैं। ये विभाजन गंदे पानी को सीधे बहने के बजाय एक लंबे ज़िग-ज़ैग रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे पानी को एरोबिक और एनोक्सिक चरणों से गुजरने का मौका मिलता है।
"इस व्यवस्था से गंदे पानी, पौधों की जड़ों, लाभकारी सूक्ष्मजीवों और बजरी के बीच संपर्क समय बढ़ जाता है, जिससे जैविक और रासायनिक प्रक्रियाएं बेहतर तरीके से पूरी होती हैं।"
मोनिश गोस्वामी के अनुसार, यह तकनीक विशेष रूप से उन छोटे और मध्यम स्तर के सुअर फार्मों के लिए अत्यधिक उपयोगी है जो केंद्रीय सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों से दूर स्थित हैं।
अनुसंधान सहयोग और भविष्य की योजनाएं
इस शोध कार्य के लिए जरूरी अपशिष्ट जल असम स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय सुअर अनुसंधान केंद्र (आईसीएआर-एनआरसीपी) से जुटाया गया था। यह परीक्षण संस्थान और आईआईटी गुवाहाटी के बीच हुए अनुसंधान एवं विकास सहयोग के तहत संपन्न हुआ। इस संपूर्ण अध्ययन के नतीजे एल्सेवियर द्वारा प्रकाशित सहकर्मी-समीक्षित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका 'जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल मैनेजमेंट' में प्रकाशित किए गए हैं, जो पर्यावरण स्थिरता और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर केंद्रित है।
ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में बड़े स्तर पर उपयोग की संभावना
प्रोफेसर अजय एस. कलमधाड ने रेखांकित किया कि यह अध्ययन दिखाता है कि कैसे इंजीनियरिंग सोच प्राकृतिक वेटलैंड सिस्टम की क्षमता को कई गुना बढ़ा सकती है। यह डिज़ाइन केवल सुअर फार्मों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका दायरा अन्य कृषि और ग्रामीण विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल प्रणालियों तक बढ़ाया जा सकता है। इससे प्राकृतिक जलस्रोतों को साफ रखने, पोषक तत्वों से होने वाले प्रदूषण को घटाने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। प्रयोगशाला स्तर पर मिली इस सफलता के बाद अब वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य इस मॉडल को खेतों में दीर्घकालिक परीक्षणों के लिए उतारना है, ताकि पूरे देश में विकेंद्रीकृत पशुपालन करने वाले किसानों को एक किफायती और टिकाऊ तकनीक उपलब्ध कराई जा सके।



















